वल्ली 1 अनुवाक 4 - मन्त्र 3

यशो जनेऽसानि स्वाहा ।
श्रेयान् वस्यसोऽसानि स्वाहा ।
तं त्वा भग प्रविशानि स्वाहा ।
स मा भग प्रविश स्वाहा ।
तस्मिन् सहस्रशाखे निभगाहं त्वयि मृजे स्वाहा ।
यथापः प्रवता यन्ति यथा मासा अहर्जरम् ।
एवं मां ब्रह्मचारिणो धातरायन्तु सर्वतः स्वाहा ।
प्रतिवेशोऽसि प्र मा पाहि प्र मा पद्यस्व ॥ ३ ॥

yaśo jane’sāni svāhā .
śreyān vasyaso’sāni svāhā .
taṃ tvā bhaga praviśāni svāhā .
sa mā bhaga praviśa svāhā .
tasmin sahasraśākhe nibhagāhaṃ tvayi mṛje svāhā .
yathāpaḥ pravatā yanti yathā māsā aharjaram .
evaṃ māṃ brahmacāriṇo dhātarāyantu sarvataḥ svāhā .
prativeśo’si pra mā pāhi pra mā padyasva .. 3 ..


मैं जनता में यशस्वी होऊँ—स्वाहा । मैं अत्यन्त प्रशंसनीय और धनवान् होऊँ—स्वाहा । हे भगवन्! मैं उस ब्रह्मकोशभूत तुझमें प्रवेश कर जाऊँ—स्वाहा । हे भगवन्! वह तू मुझमें प्रवेश कर—स्वाहा । हे भगवन्! उस सहस्रशाखायुक्त [अर्थात् अनेकों भेदवाले] तुझमें मैं अपने पापाचरणों का शोधन करता हूँ—स्वाहा । जिस प्रकार जल निम्न प्रदेश की ओर जाता है तथा महीने अहर्जर—संवत्सर में अन्तर्हित हो जाते हैं, उसी प्रकार हे धातः! ब्रह्मचारीलोग सब ओर से मेरे पास आवें—स्वाहा । तू [शरणागतों का] आश्रयस्थान है अतः मेरे प्रति भासमान हो, तू मुझे प्राप्त हो ॥ ३ ॥

मैं जनता में यशस्वी होऊँ तथा श्रेयान्—प्रशस्यतर और वस्यसः—वसीयसः अर्थात् वसुमान् से भी वसुमान् यानी अत्यन्त धनी पुरुषों से भी विशेष धनवान् होऊँ । तथा हे भग—भगवन्—पूजनीय! ब्रह्म के कोशभूत उस तुझमें मैं प्रवेश करूँ; तात्पर्य यह है कि तुझमें प्रवेश करके तुझसे अनन्य हो मैं तेरा ही रूप हो जाऊँ; तथा तू भी, हे भग—भगवन्! मुझमें प्रवेश कर । अर्थात् हम दोनों की एकता ही हो जाय । हे भगवन्! उस सहस्रशाख—अनेकों शाखाभेदवाले तुझमें मैं अपने पापकर्मों का शोधन करता हूँ ।

लोक में जिस प्रकार जल प्रवणवान्—निम्नतायुक्त देश की ओर जाते हैं और महीने जिस प्रकार अहर्जर में अन्तर्हित होते हैं । अहर्जर संवत्सर को कहते हैं, क्योंकि वह अहः—दिनों के रूप में परिवर्तित होता हुआ लोकों को जीर्ण करता है अथवा उसमें अहः—दिन जीर्ण यानी अन्तर्भूत होते हैं इसलिये वह अहर्जर है । उस संवत्सर में जिस प्रकार महीने जाते हैं उसी प्रकार हे धातः! मेरे पास सब ओर से—सम्पूर्ण दिशाओं से ब्रह्मचारीलोग आवें ।

‘प्रतिवेश’ श्रमनिवृत्ति के स्थान अर्थात् समीपवर्ती गृह को कहते हैं । इस प्रकार तू प्रतिवेश के समान प्रतिवेश यानी अपना अनुशीलन करनेवालों का दुःखनिवृत्ति का स्थान है । अतः तू मेरे प्रति अपने को प्रकाशित कर और मुझे प्राप्त हो; अर्थात् पारदसंयुक्त लोहे के समान तू मुझे अपने से अभिन्न कर ले ।

इस ज्ञान के प्रकरण में जो लक्ष्मी की कामना कही जाती है वह धन के लिये है, धन कर्म के लिये होता है और कर्म प्राप्त हुए पापों के क्षय के लिये है । उनके क्षीण होने पर ही ज्ञान का प्रकाश होता है; जैसा कि यह स्मृति भी कहती है—“पापकर्मों का क्षय हो जाने पर ही पुरुष को ज्ञान होता है । जिस प्रकार दर्पण के स्वच्छ हो जाने पर उसमें मुख देखा जा सकता है उसी प्रकार शुद्ध अन्तःकरण में आत्मा का साक्षात्कार होता है” ॥ ३ ॥

संस्कृत भाष्य पढ़ें

यशो यशस्वी जने जनसमूहेऽसानि भवानि । श्रेयान्प्रशस्यतरो वस्यसो वसीयसो वसुतराद्वसुमत्तराद्वासानीत्यन्वयः । किं च तं ब्रह्मणः कोशभूतं त्वा त्वां हे भग भगवन्पूजावन्प्रविशानि प्रविश्य चानन्यस्त्वदात्मैव भवानीत्यर्थः । स त्वमपि मा मां भग भगवन् प्रविश । आवयोरेकत्वमेवास्तु । तस्मिंस्त्वयि सहस्रशाखे बहुशाखाभेदे हे भगवन्, निमृजे शोधयाम्यहं पापकृत्याम् ।

यथा लोक आपः प्रवता प्रवणवता निम्नवता देशेन यन्ति गच्छन्ति । यथा च मासा अहर्जरं संवत्सरोऽहर्जरः । अहोभिः परिवर्तमानो लोकाञ्जरयतीत्यहानि वास्मिञ्जीर्यन्त्यन्तर्भवन्तीत्यहर्जरः । तं च यथा मासा यन्त्येवं मां ब्रह्मचारिणो हे धातः सर्वस्य विधातः मामायन्त्वागच्छन्तु सर्वतः सर्वदिग्भ्यः ।

प्रतिवेशः—श्रमापनयनस्थानमासन्नगृहमित्यर्थः । एवं त्वं प्रतिवेश इव प्रतिवेशस्त्वच्छीलिनां सर्वपापदुःखापनयनस्थानमसि, अतो मा मां प्रति प्रभाहि प्रकाशयात्मानं प्रपद्यस्व च । मां रसविद्धमिव लोहं त्वन्मयं त्वदात्मानं कुर्वित्यर्थः ।

श्रीकामोऽस्मिन्विद्याप्रकरणेविद्योपलब्धौ ऽभिधीयमानो धनार्थः । धनस्योपयोगः धनं च कर्मार्थम् । कर्म चोपात्तदुरितक्षयाय । तत्क्षये हि विद्या प्रकाशते । तथा च स्मृतिः “ज्ञानमुत्पद्यते पुंसां क्षयात्पापस्य कर्मणः । यथादर्शतले प्रख्ये पश्यन्त्यात्मानमात्मनि” (महा० शा० २०४ । ८, गरुड० १ । २३७ । ६) इति ॥ ३ ॥

इति शीक्षावल्ल्यां चतुर्थोऽनुवाकः ॥ ४ ॥

पञ्चम अनुवाक

व्याहृतिरूप ब्रह्मकी उपासना

पहले संहितासम्बन्धिनी उपासना का वर्णन किया गया । तत्पश्चात् मेधा की कामनावाले तथा श्रीकामी पुरुषों के लिये मन्त्र बतलाये गये । वे भी परम्परा से ज्ञान के उपयोग के लिये ही हैं । उसके पश्चात् अब जिसका फल स्वाराज्य है उस व्याहृतिरूप ब्रह्म की आन्तरिक उपासना का आरम्भ किया जाता है—
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संहिताविषयमुपासनमुक्तं तदनु मेधाकामस्य श्रीकामस्य मन्त्रा अनुक्रान्ताः । ते च पारम्पर्येण विद्योपयोगार्था एव । अनन्तरं व्याहृत्यात्मनो ब्रह्मणोऽन्तरुपासनं स्वाराज्यफलं प्रस्तूयते—