ब्रह्मणा वाव सर्वे वेदा महीयन्ते ।
भूरिति वै प्राणः ।
भुव इत्यपानः ।
सुवरिति व्यानः ।
मह इत्यन्नम् ।
अन्नेन वाव सर्वे प्राणा महीयन्ते ।
ता वा एताश्चतस्रश्चतुर्धा ।
चतस्रश्चतस्रो व्याहृतयः ।
ता यो वेद ।
स वेद ब्रह्म ।
सर्वेऽस्मै देवा बलिमावहन्ति ॥ ३ ॥
maha iti brahma .
brahmaṇā vāva sarve vedā mahīyante .
bhūriti vai prāṇaḥ .
bhuva ityapānaḥ .
suvariti vyānaḥ .
maha ityannam .
annena vāva sarve prāṇā mahīyante .
tā vā etāścatasraścaturdhā .
catasraścatasro vyāhṛtayaḥ .
tā yo veda .
sa veda brahma .
sarve’smai devā balimāvahanti .. 3 ..
‘भूर्भुवः सुवरिति’ इसमें ‘इति’ शब्द पूर्वकथित [व्याहृतियों]- को ही प्रदर्शित करने के लिये है; ‘एतास्तिस्रः’ ये शब्द भी पूर्वप्रदर्शित [व्याहृतियों] के ही परामर्श के लिये हैं । ‘वै’ इस अव्यय से परामृष्ट व्याहृतियों का स्मरण कराया जाता है । अर्थात् [इन शब्दों से] ये तीन प्रसिद्ध व्याहृतियाँ स्मरण दिलायी जाती हैं । उनमें ‘महः’ यह चौथी व्याहृति है । उस इस चौथी व्याहृति को महाचमस का पुत्र माहाचमस्य जानता है । किन्तु ‘उ ह स्म’ ये तीन निपात अतीत घटना का अनुकथन करने के लिये होने के कारण इसका अर्थ ‘जानता था, देखा था’ इस प्रकार होगा । [व्याहृति के द्रष्टा] ऋषि का अनुस्मरण करने के लिये ‘माहाचमस्य’ यह नाम लिया गया है । इस प्रकार यहाँ उपदेश होने के कारण यह जाना जाता है कि ऋषि का अनुस्मरण भी उपासना का एक अङ्ग है ।
जिस ‘महः’ नामक व्याहृति को माहाचमस्य ने देखा था वह ब्रह्म है । ब्रह्म भी महान् है और व्याहृति भी महः है । और वह क्या है? वही आत्मा है । ‘व्याप्ति’ अर्थवाले ‘आप्’ धातु से ‘आत्मा’ शब्द निष्पन्न होता है । क्योंकि लोक, देव, वेद और प्राणरूप अन्य व्याहृतियाँ आदित्य, चन्द्र, ब्रह्म एवं अन्नस्वरूप व्याहृत्यात्मक महः से व्याप्त हैं, इसलिये वे अन्य देवता इसके अंग—अवयव हैं । यहाँ लोकादि का उपलक्षण कराने के लिये ‘देवता’ शब्द का ग्रहण किया गया है । क्योंकि देव और लोक आदि सभी ‘महः’ इस व्याहृत्यात्मा के अवयवस्वरूप हैं, इसीलिये ऐसा कहा है कि आदित्यादि के योग से लोकादि महत्ता को प्राप्त होते हैं । आत्मा से ही अङ्ग महत्ता को प्राप्त हुआ करते हैं । ‘महन’ शब्द का अर्थ वृद्धि—उपचय है । अतः ‘महीयन्ते’ इसका ‘वृद्धि को प्राप्त होते हैं’ यह अर्थ है ।
यह लोक, अग्नि, ऋग्वेद और प्राण—ये पहली व्याहृति भूः हैं; इसी प्रकार उत्तरोत्तर प्रत्येक व्याहृति चार-चार प्रकार की है । ‘महः’ ब्रह्म है; ब्रह्म का अर्थ ओंकार है, क्योंकि शब्द के प्रकरण में अन्य किसी ब्रह्म का होना असम्भव है । शेष सबका अर्थ पहले कहा जा चुका है ।
वे ये चारों व्याहृतियाँ चार प्रकार की हैं । अर्थात् वे ये भूः, भुवः, सुवः और महः चार व्याहृतियाँ प्रत्येक चार-चार प्रकार की हैं । ‘धा’ शब्द ‘प्रकार’ का वाचक है । अर्थात् वे चार-चार होती हुई चार प्रकार की हैं । उनकी जिस प्रकार पहले कल्पना की गयी है उसी प्रकार उपासना करने का नियम करने के लिये उनका पुनः उपदेश किया गया है । उन उपर्युक्त व्याहृतियों को जो पुरुष जानता है वही जानता है । किसे जानता है? ब्रह्म को ।
शंका—“वह ब्रह्म है, वह आत्मा है” इस वाक्य द्वारा [महःरूप से] ब्रह्म को जान लेने पर भी उसे न जानने के समान ‘[उसे जो जानता है] वह ब्रह्म को जानता है’ ऐसा कहना तो ठीक नहीं है ।
समाधान—ऐसी शंका नहीं करनी चाहिये; क्योंकि उस [ब्रह्मविषयक ज्ञान] के विषय में विशेष कहना अभीष्ट होने के कारण इस प्रकार कहने में कोई दोष नहीं है । यह ठीक है कि इतना तो जान लिया कि चतुर्थ व्याहृतिरूप ब्रह्म है; किन्तु हृदय के भीतर उपलब्ध होना तथा मनोमयत्वादिरूप उसकी विशेषताओं का तो ज्ञान नहीं हुआ । [अगले अनुवाक में] ‘शान्तिसमृद्धम्’ इस वाक्य तक कहा हुआ विशेषण-विशेष्यरूप धर्मसमूह ज्ञात नहीं है; उसे बतलाने की इच्छा से ही शास्त्र ने ब्रह्म को न जाने हुए के समान मानकर ‘वह ब्रह्म को जानता है’ ऐसा कहा है । इसलिये इसमें कोई दोष नहीं है । इसका अभिप्राय यह है कि जो पुरुष आगे बतलाये जानेवाले धर्मसमूह से विशिष्ट ब्रह्म को जानता है वही ब्रह्म को जानता है । अतः आगे कहे जानेवाले अनुवाक से इसकी एकवाक्यता है, क्योंकि इन दोनों अनुवाकों की एक ही उपासना है ।
[ज्ञापक] लिङ्ग होने से भी यही बात सिद्ध होती है । [छठे अनुवाक में] ‘भूरित्यग्नौ प्रतितिष्ठति’ इत्यादि फलश्रुति इन दोनों अनुवाकों में एक ही उपासना होने का लिङ्ग है । कोई विधान करनेवाला शब्द न होने के कारण भी ऐसा ही समझा जाता है । [छठे अनुवाक में] ‘वेद’ ‘उपासितव्यः’ ऐसा कोई [उपासना का] विधान करनेवाला शब्द नहीं है । व्याहृति-अनुवाक में जो ‘उन (व्याहृतियों)- को जो जानता है’ ऐसा वाक्य है वह आगे बतलायी जानेवाली उपासना के लिये होने के कारण [पूर्वोक्त उपासना से] उसका भेद करनेवाला नहीं है । उसी उपासना को आगे बतलाना क्यों इष्ट है यह बात ‘उसकी विशेषता बतलाने की इच्छा होने के कारण’ आदि हेतुओं से पहले कह ही चुके हैं । ऐसा जाननेवाले उपासक को उसके अङ्गभूत समस्त देवगण बलि (उपहार) समर्पण करते हैं अर्थात् स्वाराज्य की प्राप्ति हो जाने पर उसके लिये उपहार लाते हैं— यह इसका तात्पर्य है ॥ १—३ ॥
संस्कृत भाष्य पढ़ें
भूर्भुवः सुवरिति; इतीत्युक्तोपप्रदर्शनार्थः । एताव्याहृतिचतुष्टयम् स्तिस्र इति च प्रदर्शितानां परामर्शार्थः । परामृष्टाः स्मार्यन्ते वा इत्यनेन । तिस्र एताः प्रसिद्धा व्याहृतयः स्मार्यन्ते तावत् । तासामियं चतुर्थी व्याहृतिर्मह इति । तामेतां चतुर्थीं महाचमसस्यापत्यं माहाचमस्यः प्रवेदयते । उ ह स्म इत्येतेषां वृत्तानुक्थनार्थत्वाद्विदितवान्ददर्शेत्यर्थः । माहाचमस्यग्रहणमार्षानुस्मरणार्थम् । ऋषिस्मरणमप्युपासनाङ्गमिति गम्यत इहोपदेशात् ।
येयं माहाचमस्येन दृष्टा व्याहृतिषु महसः व्याहृतिर्मह इति तद्ब्रह्म । प्राधान्यम् महद्धि ब्रह्म महश्च व्याहृतिः । किं पुनस्तत्? स आत्मा । आप्नोतेर्व्याप्तिकर्मणः आत्मा । इतराश्च व्याहृतयो लोका देवा वेदाः प्राणाश्च मह इत्यनेन व्याहृत्यात्मनादित्यचन्द्रब्रह्मान्नभूतेन व्याप्यन्ते यतः अतोऽङ्गान्यवयवा अन्या देवताः । देवताग्रहणमुपलक्षणार्थं लोकादीनाम् । मह इत्येतस्य व्याहृत्यात्मनो देवलोकादयः सर्वेऽवयवभूता यतोऽत आहादित्यादिभिर्लोकादयो महीयन्ते इति । आत्मनो ह्यङ्गानि महीयन्ते, महनं वृद्धिरुपचयः । महीयन्ते वर्धन्त इत्यर्थः ।
अयं लोकोऽग्निर्ऋग्वेदः प्राण प्रतिव्याहृति- इति प्रथमा चत्वारो भेदाः व्याहृतिर्भूरिति । एवमुत्तरोत्तरैकैका चतुर्धा भवति ।
मह इति ब्रह्म । ब्रह्मेत्योङ्कारः, शब्दाधिकारेऽन्यस्यासंभवात् । उक्तार्थमन्यत् ।
ता वा एताश्चतस्रश्चतुर्धेति । ता वा एता भूर्भुवः सुवर्मह इति चतस्र एकैकशश्चतुर्धा चतुष्प्रकाराः । धाशब्दः प्रकारवचनः । चतस्रश्चतस्रः सत्यश्चतुर्धा भवन्तीत्यर्थः । तासां यथाक्लृप्तानां पुनरुपदेशस्तथैवोपासननियमार्थः । ता यथोक्तव्याहृतीर्यो वेद स वेद विजानाति । किम्? ब्रह्म ।
ननु “तद्ब्रह्म स आत्मा” इति ज्ञाते ब्रह्मणि न वक्तव्यमविज्ञातवत्स वेद ब्रह्मेति ।
न; तद्विशेषविवक्षुत्वाददोषः । पञ्चमषष्ठानु- सत्यं विज्ञातं वाक्योरेकवाक्यता चतुर्थव्याहृत्यात्मा ब्रह्मेति न तु तद्विशेषो हृदयान्तरुपलभ्यत्वं मनोमयत्वादिश्च । ‘शान्तिसमृद्धम्’ इत्येवमन्तो विशेषणविशेष्यरूपो धर्मपूगो न विज्ञात इति तद्विवक्षु हि शास्त्रमविज्ञातमिव ब्रह्म मत्वा स वेद ब्रह्मेत्याह । अतो न दोषः । यो हि वक्ष्यमाणेन धर्मपूगेन विशिष्टं ब्रह्म वेद स वेद ब्रह्मेत्यभिप्रायः । अतो वक्ष्यमाणानुवाकेनैकवाक्यतास्य; उभयोर्ह्यनुवाकयोरेकमुपासनम् ।
लिङ्गाच्च, भूरित्यग्नौ प्रतितिष्ठतीत्यादिकं लिङ्गमुपासनैकत्वे । विधायकाभावाच्च । न हि ‘वेद’ ‘उपासितव्यः’ इति विधायकः कश्चिच्छब्दोऽस्ति । व्याहृत्यनुवाके ‘ता यो वेद’ इति च वक्ष्यमाणार्थत्वान्नोपासनभेदकः । वक्ष्यमाणार्थत्वं च तद्विशेषविवक्षत्वादित्यादिनोक्तम् । सर्वे देवा अस्मा एवं विदुषेऽङ्गभूता आवहन्त्यानयन्ति बलिं स्वाराज्यप्राप्तौ सत्यामित्यर्थः ॥ १—३ ॥
इति शीक्षावल्ल्यां पञ्चमोऽनुवाकः ॥ ५ ॥