वल्ली 1 अनुवाक 7 - मन्त्र 1

इति शीक्षावल्ल्यां सप्तमोऽनुवाकः ॥ ७ ॥

इत्यधिभूतम् ।
अथाध्यात्मम् ।
प्राणो व्यानोऽपान उदानः समानः ।
चक्षुः श्रोत्रं मनो वाक् त्वक् ।
चर्म माग्ँसग्ँस्नावास्थि मज्जा ।
एतदधिविधाय ऋषिरवोचत् ।
पाङ्क्तं वा इदग्ँसर्वम् ।
पाङ्क्तेनैव पाङ्क्तग्ँस्पृणोतीति ॥ १ ॥

ityadhibhūtam .
athādhyātmam .
prāṇo vyāno’pāna udānaḥ samānaḥ .
cakṣuḥ śrotraṃ mano vāk tvak .
carma māg̐sag̐snāvāsthi majjā .
etadadhividhāya ṛṣiravocat .
pāṅktaṃ vā idag̐sarvam .
pāṅktenaiva pāṅktag̐spṛṇotīti .. 1 ..


पृथिवी, अन्तरिक्ष, द्युलोक, दिशाएँ और अवान्तर दिशाएँ [—यह लोकपाङ्क्त]; अग्नि, वायु, आदित्य, चन्द्रमा और नक्षत्र [—यह देवतापाङ्क्त] तथा आप, ओषधि, वनस्पति, आकाश और आत्मा—ये अधिभूतपाङ्क्त हैं । अब अध्यात्मपाङ्क्त बतलाते हैं—प्राण, व्यान, अपान, उदान और समान [—यह वायुपाङ्क्त]; चक्षु, श्रोत्र, मन, वाक् और त्वचा [—यह इन्द्रियपाङ्क्त] तथा चर्म, मांस, स्नायु, अस्थि और मज्जा [—यह धातुपाङ्क्त—ये सब मिलाकर अध्यात्मपाङ्क्त हैं] । इस प्रकार पाङ्क्तोपासना का विधान कर ऋषि ने कहा—‘यह सब पाङ्क्त ही है; इस [आध्यात्मिक] पाङ्क्त से ही उपासक [बाह्य] पाङ्क्त को पूर्ण करता है ॥ १ ॥

पृथिवी, अन्तरिक्ष, द्युलोक, दिशाएँ और अवान्तर दिशाएँ—ये लोकपाङ्क्त हैं; अग्नि, वायु, आदित्य, चन्द्रमा और नक्षत्र—ये देवतापाङ्क्त हैं; जल, ओषधि, वनस्पति, आकाश और आत्मा—ये भूतपाङ्क्त हैं । यहाँ ‘आत्मा’ विराट् को कहा है, क्योंकि यह भूतों का अधिकरण है । ‘इत्यधिभूतम्’ यह वाक्य अधिलोक और अधिदैवत—इन दो पाङ्क्तों का भी उपलक्षण कराने के लिये है, क्योंकि इनमें लोक और देवतासम्बन्धी दो पाङ्क्तों का भी वर्णन किया गया है ।

अब आगे तीन अध्यात्मपाङ्क्तों का वर्णन किया जाता है—प्राणादि वायुपाङ्क्त, चक्षु आदि इन्द्रियपाङ्क्त और चर्मादि धातुपाङ्क्त—बस ये इतने ही अध्यात्म और बाह्य पाङ्क्त हैं । इनका इस प्रकार विधान अर्थात् कल्पना करके ऋषि—वेद अथवा इस दृष्टि से सम्पन्न किसी ऋषि ने कहा । क्या कहा? सो बतलाते हैं—निश्चय ही यह सब पाङ्क्त ही है । आध्यात्मिक पाङ्क्त से ही, संख्या में समानता होने के कारण उपासक बाह्यपाङ्क्त को बलवान्—पूरित करता है अर्थात् उसके साथ एकरूप से उपलब्ध करता है । इस प्रकार ‘यह सब पाङ्क्त है’ ऐसा जो पुरुष जानता है वह प्रजापतिस्वरूप ही हो जाता है—ऐसा इसका तात्पर्य है ॥ १ ॥

संस्कृत भाष्य पढ़ें

पृथिव्यन्तरिक्षं द्यौर्दिशोऽवात्रिविध- न्तरदिश इति भूतपाङ्क्तम् लोकपाङ्क्तम् । अग्निर्वायुरादित्यश्चन्द्रमा नक्षत्राणीति देवतापाङ्क्तम् । आप ओषधयो वनस्पतय आकाश आत्मेति भूतपाङ्क्तम् । आत्मेति विराड् भूताधिकारात् । इत्यधिभूतमित्यधिलोकाधिदैवतपाङ्क्तद्वयोपलक्षणार्थम् । लोकदेवतापाङ्क्तयोश्चाभिहितत्वात् ।

अथानन्तरमध्यात्मं पाङ्क्तत्रिविधाध्यात्म- त्रयमुच्यते—प्राणादि पाङ्क्तम् वायुपाङ्क्तम् । चक्षुरादीन्द्रियपाङ्क्तम् । चर्मादि धातुपाङ्क्तम् । एतावद्धीदं सर्वमध्यात्मम्, बाह्यं च पाङ्क्तमेवेत्येतदेवमधिविधाय परिकल्प्यर्षिर्वेद एतद्दर्शनसंपन्नो वा कश्चिदृषिरवोचदुक्तवान् । किमित्याह पाङ्क्तं वा इदं सर्वं पाङ्क्तेनैवाध्यात्मिकेन संख्यासामान्यात्पाङ्क्तं बाह्यं स्पृणोति बलयति पूरयति । एकात्मतयोपलभ्यत इत्येतत् । एवं पाङ्क्तमिदं सर्वमिति यो वेद स प्रजापत्यात्मैव भवतीत्यर्थः ॥ १ ॥


अष्टम अनुवाक

ओङ्कारोपासनाका विधान

व्याहृतिरूप ब्रह्म की उपासना का निरूपण किया गया; उसके पश्चात् उसी की उपासना का पाङ्क्तरूप से वर्णन किया । अब सम्पूर्ण उपासनाओं के अङ्गभूत ओंकार की उपासना का विधान करना चाहते हैं । पर एवं अपर ब्रह्मदृष्टि से उपासना किये जाने पर ओंकार—केवल शब्दमात्र होने पर भी पर और अपर ब्रह्म की प्राप्ति का साधन होता है । वही पर और अपर ब्रह्म का आलम्बन है, जिस प्रकार कि विष्णु का आलम्बन प्रतिमा है । “इसी आलम्बन से उपासक [पर या अपर] किसी एक ब्रह्म को प्राप्त हो जाता है” इस श्रुति से यही बात प्रमाणित होती है ।
संस्कृत भाष्य पढ़ें
व्याहृत्यात्मनो ब्रह्मण उपासनमुक्तम् । अनन्तरं च पाङ्क्तस्वरूपेण तस्यैवोपासनमुक्तम् । इदानीं सर्वोपासनाङ्गभूतस्योङ्कारस्योपासनं विधित्स्यते । परापरब्रह्मदृष्ट्या उपास्यमान ओङ्कारः शब्दमात्रोऽपि परापरब्रह्मप्राप्तिसाधनं भवति । स ह्यालम्बनं ब्रह्मणः परस्यापरस्य च, प्रतिमेव विष्णोः । “एतेनैवायतनेनैकतरमन्वेति” (प्र० उ० ५ । २) इति श्रुतेः ।