वल्ली 1 अनुवाक 8 - मन्त्र 1

ओमिति ब्रह्म ।
ओमितीदग्ँसर्वम् ।
ओमित्येतदनुकृतिर्ह स्म वा अप्यो श्रावयेत्याश्रावयन्ति ।
ओमिति सामानि गायन्ति ।
ओग्ँशोमिति शस्त्राणि शग्ँसन्ति ।
ओमित्यध्वर्युः प्रतिगरं प्रतिगृणाति ।
ओमिति ब्रह्मा प्रसौति ।
ओमित्यग्निहोत्रमनुजानाति ।
ओमिति ब्राह्मणः प्रवक्ष्यन्नाह ब्रह्मोपाप्नवानीति ।
ब्रह्मैवोपाप्नोति ॥ १ ॥

omiti brahma .
omitīdag̐sarvam .
omityetadanukṛtirha sma vā apyo śrāvayetyāśrāvayanti .
omiti sāmāni gāyanti .
og̐śomiti śastrāṇi śag̐santi .
omityadhvaryuḥ pratigaraṃ pratigṛṇāti .
omiti brahmā prasauti .
omityagnihotramanujānāti .
omiti brāhmaṇaḥ pravakṣyannāha brahmopāpnavānīti .
brahmaivopāpnoti .. 1 ..


‘ॐ’ यह शब्द ब्रह्म है, क्योंकि ‘ॐ’ यह सर्वरूप है; ‘ॐ’ यह अनुकृति (अनुकरण—सम्मतिसूचक संकेत) है—ऐसा प्रसिद्ध है । [याज्ञिकलोग] “ओ श्रावय” ऐसा कहकर श्रवण कराते हैं । ‘ॐ’ ऐसा कहकर सामगान करते हैं । ‘ॐ शोम्’ ऐसा कहकर शस्त्रों (गीतिरहित ऋचाओं)—का पाठ करते हैं । अध्वर्यु प्रतिगर (प्रत्येक कर्म)-के प्रति ॐ ऐसा उच्चारण करता है । ‘ॐ’ ऐसा कहकर ब्रह्मा अनुज्ञा देता है; ‘ॐ’ ऐसा कहकर वह अग्निहोत्र के लिये आज्ञा देता है । वेदाध्ययन करनेवाला ब्राह्मण ‘ॐ’ ऐसा उच्चारण करता हुआ कहता है—‘मैं ब्रह्म (वेद अथवा परब्रह्म)-को प्राप्त करूँ ।’ इससे वह ब्रह्म को ही प्राप्त कर लेता है ॥ १ ॥

‘ओमिति’ इसमें ‘इति’ शब्द ओंकार के स्वरूप का परिच्छेद (निर्देश) करने के लिये है । अर्थात् ‘ॐ’ यह शब्दरूप ब्रह्म है— ऐसा इसका मन से ध्यान—उपासना करे; क्योंकि ‘ॐ’ यही सब कुछ है, कारण, समस्त शब्दरूप प्रपञ्च ओंकार से व्याप्त है, जैसा कि ‘जिस प्रकार शंकु से पत्ते व्याप्त रहते हैं’ इत्यादि एक दूसरी श्रुति से सिद्ध होता है । सम्पूर्ण वाच्य वाचक के ही अधीन होता है, इसलिये यह सब ओंकार ही कहा जाता है ।

आगे का ग्रन्थ ओंकार की स्तुति के लिये है, क्योंकि वह उपासनीय है । ‘ॐ’ यह अनुकृति यानी अनुकरण है । इसी से किसी के द्वारा ‘मैं करता हूँ, मैं जाता हूँ’ इस प्रकार किये हुए कथन को सुनकर दूसरा पुरुष [उसको स्वीकृत करते हुए] ‘ॐ’ ऐसा अनुकरण करता है । इसलिये ओंकार अनुकृति है । ‘ह’ ‘स्म’ और ‘वै’—ये निपात प्रसिद्धि के सूचक हैं, क्योंकि ओंकार का अनुकृतित्व तो प्रसिद्ध ही है ।

इसके सिवा ‘ओ श्रावय’ इस प्रकार प्रेरणापूर्वक याज्ञिकलोग प्रतिश्रवण कराते हैं । तथा ‘ॐ’ ऐसा कहकर सामगान करनेवाले सामका गान करते हैं । शस्त्र शंसन करनेवाले भी ’ॐ शोम्’ ऐसा कहकर शस्त्रोंका पाठ करते हैं । तथा अध्वर्युलोग प्रतिगर के प्रति ’ॐ’ ऐसा उच्चारण करते हैं । ’ॐ’ ऐसा कहकर ब्रह्मा अनुज्ञा देता है अर्थात् प्रेरणापूर्वक आश्रवण करता है; और ’ॐ’ कहकर वह अग्निहोत्र के लिये आज्ञा देता है । अर्थात् यजमान के यों कहनेपर कि ’मैं हवन करता हूँ’ वह ’ॐ’ ऐसा कहकर उ से अनुज्ञा देता है ।

प्रवचन अर्थात् अध्ययन करनेवाला ब्राह्मण ’ॐ’ ऐसा उच्चारण करता है; अर्थात् ’ॐ’ ऐसा कहकर ही वह अध्ययन करने के लिये प्रवृत्त होता है । ’मैं ब्रह्म यानी वेद को प्राप्त करूँ अर्थात् उ से ग्रहण करूँ’ ऐसा कहकर वह ब्रह्म को प्राप्त कर ही लेता है । अथवा [यों समझो कि] ’मैं ब्रह्म—परमात्मा को प्राप्त करूँ’ इस प्रकार आत्मा को प्राप्त करने की इच्छा से वह ’ॐ’ ऐसा ही कहता है और उस ॐकार के द्वारा वह ब्रह्म को प्राप्त कर ही लेता है । इस प्रकार क्योंकि ॐकारपूर्वक प्रवृत्त होनेवाली क्रियाएँ फलवती होती हैं, इसलिये ’ॐकार ब्रह्म है’ इस तरह उसकी उपासना करे—यह इस वाक्यका अर्थ है ॥ १ ॥

संस्कृत भाष्य पढ़ें

ओमिति । इतिशब्दः स्वरूपओङ्कारस्य परिच्छेदार्थः, ओसार्वात्म्यम् मित्येतच्छब्दरूपं ब्रह्मेति मनसा धारयेदुपासीत । यत ओमितीदं सर्वं हि शब्दरूपमोङ्कारेण व्याप्तम् । “तद्यथा शङ्कुना” (छा० उ० २ । २३ । ३) इति श्रुत्यन्तरात् । अभिधानतन्त्रं ह्यभिधेयमित्यत इदं सर्वमोङ्कार इत्युच्यते ।

ओङ्कारस्तुत्यर्थमुत्तरो ग्रन्थः । ओङ्कारमहिमा उपास्यत्वात्तस्य । ओमित्येतदनुकृतिरनुकरणम् । करोमि यास्यामि चेति कृतमुक्तमोमित्यनुकरोत्यन्यः । अत ओङ्कारोऽनुकृतिः । ह स्म वा इति प्रसिद्धार्थद्योतकाः । प्रसिद्धमोङ्कारस्यानुकृतित्वम् ।

अपि च ‘ओ श्रावय’ इति प्रैषपूर्वकमाश्रावयन्ति । तथोमिति सामानि गायन्ति सामगाः । ॐशोमिति शस्त्राणि शंसन्ति शस्त्रशंसितारोऽपि । तथोमित्यध्वर्युः प्रतिगरं प्रतिगृणाति । ओमिति ब्रह्मा प्रसौत्यनुजानाति प्रैषपूर्वकमाश्रावयति । ओमित्यग्निहोत्रमनुजानाति । जुहोमीत्युक्त ओमित्येवानुज्ञां प्रयच्छति ।

ओमित्येव ब्राह्मणः प्रवक्ष्यन् प्रवचनं करिष्यन्नध्येष्यमाण ओमित्येवाह । ओमित्येव प्रतिपद्यतेऽध्येतुमित्यर्थः । ब्रह्म वेदमुपाप्नवानीति प्राप्नुयां ग्रहीष्यामीत्युपाप्नोत्येव ब्रह्म । अथवा ब्रह्म परमात्मा तमुपाप्नवानीत्यात्मानं प्रवक्ष्यन्प्रापयिष्यन्नोमित्येवाह । स च तेनोङ्कारेण ब्रह्म प्राप्नोत्येव । ओङ्कारपूर्वं प्रवृत्तानां क्रियाणां फलवत्त्वं यस्मात्तस्मादोङ्कारं ब्रह्मेत्युपासीतेति वाक्यार्थः ॥ १ ॥

इति शीक्षावल्ल्यामष्टमोऽनुवाकः ॥ ८ ॥

नवम अनुवाक

ऋतादि शुभकर्मोंकी अवश्यकर्तव्यताका विधान

विज्ञान से ही स्वाराज्य प्राप्त कर लेता है—ऐसा [छठे अनुवाक में] कहे जाने के कारण श्रौत और स्मार्त्त कर्मों की व्यर्थता प्राप्त होती है । वह प्राप्त न हो, इसलिये पुरुषार्थ के प्रति कर्मोंका साधनत्व प्रदर्शित करने के लिये यहाँ उनका उल्लेख किया जाता है—
संस्कृत भाष्य पढ़ें
विज्ञानादेवाप्नोति स्वाराज्यमित्युक्तत्वाच्छ्रौतस्मार्तानां कर्मणामानर्थक्यं प्राप्तमित्यतस्तन्मा प्रापदिति कर्मणां पुरुषार्थं प्रति साधनत्वप्रदर्शनार्थमिहोपन्यासः—