वल्ली 2 अनुवाक 1 - मन्त्र 1

वायोरग्निः ।
अग्नेरापः ।
अद्भ्यः पृथिवी ।
पृथिव्या ओषधयः ।
ओषधीभ्योऽन्नम् ।
अन्नात्पुरुषः ।
स वा एष पुरुषोऽन्नरसमयः ।
तस्येदमेव शिरः ।
अयं दक्षिणः पक्षः ।
अयमुत्तरः पक्षः ।
अयमात्मा ।
इदं पुच्छं प्रतिष्ठा ।
तदप्येष श्लोको भवति ॥ १ ॥

vāyoragniḥ .
agnerāpaḥ .
adbhyaḥ pṛthivī .
pṛthivyā oṣadhayaḥ .
oṣadhībhyo’nnam .
annātpuruṣaḥ .
sa vā eṣa puruṣo’nnarasamayaḥ .
tasyedameva śiraḥ .
ayaṃ dakṣiṇaḥ pakṣaḥ .
ayamuttaraḥ pakṣaḥ .
ayamātmā .
idaṃ pucchaṃ pratiṣṭhā .
tadapyeṣa śloko bhavati .. 1 ..


ब्रह्मवेत्ता परमात्मा को प्राप्त कर लेता है । उसके विषय में यह [श्रुति] कही गयी है—‘ब्रह्म सत्य, ज्ञान और अनन्त है ।’ जो पुरुष उसे बुद्धिरूप परम आकाश में निहित जानता है, वह सर्वज्ञ ब्रह्मरूप से एक साथ ही सम्पूर्ण भोगों को प्राप्त कर लेता है । उस इस आत्मा से ही आकाश उत्पन्न हुआ । आकाश से वायु, वायु से अग्नि, अग्नि से जल, जल से पृथिवी, पृथिवी से ओषधियाँ, ओषधियों से अन्न और अन्न से पुरुष उत्पन्न हुआ । वह यह पुरुष अन्न एवं रसमय ही है । उसका यह [शिर] ही शिर है, यह [दक्षिण बाहु] ही दक्षिण पक्ष है, यह [वाम बाहु] वामपक्ष है, यह [शरीर का मध्यभाग] आत्मा है और यह [नीचे का भाग] पुच्छ प्रतिष्ठा है । उसके विषय में ही यह श्लोक है ॥ १ ॥

‘ब्रह्मवित्’—ब्रह्म, जिसका लक्षण आगे कहा जायगा और जो सबसे बड़ा होने के कारण ‘ब्रह्म’ कहलाता है, उसे जो जानता है उसका नाम ‘ब्रह्मवित्’ है; वह ब्रह्मवित् उस परम—निरतिशय ब्रह्म को ही ‘आप्नोति’—प्राप्त कर लेता है; क्योंकि अन्य के विज्ञान से किसी अन्य की प्राप्ति नहीं हुआ करती । “वह, जो कि निश्चय ही उस परब्रह्म को जानता है, ब्रह्म ही हो जाता है” यह एक दूसरी श्रुति ब्रह्मवेत्ता को स्पष्टतया ब्रह्म की ही प्राप्ति होना प्रदर्शित करती है ।

शंका—ब्रह्म सर्वगत और सबका आत्मा है—ऐसा आगे कहेंगे; इसलिये वह प्राप्तव्य नहीं हो सकता । प्राप्ति तो अन्य परिच्छिन्न पदार्थ की किसी अन्य परिच्छिन्न पदार्थ द्वारा ही होती देखी गयी है । किन्तु ब्रह्म तो अपरिच्छिन्न और सर्वात्मक है; इसलिये परिच्छिन्न और अनात्मपदार्थ के समान उसकी प्राप्ति होनी असम्भव है ।

समाधान—यह कोई दोष की बात नहीं है; किस प्रकार नहीं है? क्योंकि ब्रह्म की प्राप्ति और अप्राप्ति तो उसके साक्षात्कार और असाक्षात्कार की अपेक्षा से है । जिस प्रकार [दशम पुरुष के लिये] प्रकृत (दशम) संख्या की पूर्ति करनेवाला अपना-आप सर्वथा अव्यवहित होने पर भी संख्या करने योग्य बाह्य विषयों में आसक्तचित्त रहने के कारण वह अपने स्वरूप का अभाव देखता है उसी प्रकार पञ्चभूत तन्मात्राओं से उत्पन्न हुए बाह्य परिच्छिन्न अन्नमय कोशादिमें आत्मभाव देखनेवाला यह जीव परमार्थतः ब्रह्मस्वरूप होनेपर भी उनमें आसक्त हो जाता है और अपने परमार्थ ब्रह्मस्वरूपका अभाव देखनेरूप अविद्यासे अन्नमय कोश आदि बाह्य अनात्माओंको आत्मस्वरूपसे देखनेके कारण ‘मैं अन्नमय आदि अनात्माओंसे भिन्न नहीं हूँ’ ऐसा अभिमान करने लगता है । इसी प्रकार अपना आत्मा होनेपर भी अविद्यावश ब्रह्म अप्राप्त ही है ।

जिस प्रकार प्रकृत (दशम) संख्याको पूर्ण करनेवाला अपना-आप अविद्यावश अप्राप्त रहता है और फिर किसीके द्वारा स्मरण करा दिये जानेपर विद्याद्वारा उसकी प्राप्ति हो जाती है उसी प्रकार अविद्यावश जिसके ब्रह्मस्वरूपकी उपलब्धि नहीं होती उस सबके आत्मभूत श्रुत्युपदिष्ट ब्रह्मकी आत्मदर्शनरूप विद्याके द्वारा प्राप्ति होनी उचित ही है ।

‘ब्रह्मविदाप्नोति परम्’ यह वाक्य सूत्रभूत है । जो सम्पूर्ण वल्लीके अर्थका विषय है, जिसका ‘ब्रह्मविदाप्नोति परम्’ इस वाक्यद्वारा ज्ञातव्यरूपसे सूत्रतः उल्लेख किया गया है, उस ब्रह्मके ऐसे लक्षणका—जिसके विशेष रूपका निश्चय नहीं किया गया है और जो सम्पूर्ण वस्तुओंसे व्यावृत्त स्वरूपविशेषका ज्ञान करानेमें समर्थ है—वर्णन करते हुए स्वरूपका निश्चय करानेके लिये तथा जिसके ज्ञानका सामान्यरूपसे वर्णन कर दिया गया है उस आगे कहे जानेवाले लक्षणोंसे युक्त ब्रह्मको विशेषतः ‘अपना अन्तरात्मा होनेसे अनन्यरूपसे जाननेयोग्य है’ ऐसा प्रतिपादन करनेके लिये और यह दिखलानेके लिये कि—ब्रह्मवेत्ताको जो परमात्माकी प्राप्तिरूप ब्रह्मविद्याका फल बतलाया गया है वह सर्वात्मभाव सम्पूर्ण सांसारिक धर्मोंसे अतीत ब्रह्मस्वरूपता ही है—और कुछ नहीं है—‘तदेषाभ्युक्ता’ यह ऋचा कही जाती है ।

तत्—उस ब्राह्मणवाक्यद्वारा बतलाये हुए अर्थमें ही [‘सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म’] यह ऋचा कही गयी है । ‘सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म’ यह वाक्य ब्रह्मका लक्षण करनेके लिये है । ‘सत्य’ आदि तीन पद विशेष्य ब्रह्मके विशेषण बतलानेके लिये हैं । वेद्यरूपसे विवक्षित (बतलाये जानेको इष्ट) होनेके कारण ब्रह्म विशेष्य है । क्योंकि ब्रह्म प्रधानतया वेद्यरूपसे (ज्ञानके विषयरूपसे) विवक्षित है; इसलिये उसे विशेष्य समझना चाहिये । अतः इस विशेषण-विशेष्यभावके कारण एक ही विभक्तिवाले ‘सत्य’ आदि तीनों पद समानाधिकरण हैं । सत्य आदि तीन विशेषणोंसे विशेषित होनेवाला ब्रह्म अन्य विशेष्योंसे पृथग्रूपसे निश्चय किया जाता है । जिसका अन्य पदार्थोंसे पृथग्रूपसे निश्चय किया गया है उसका इसी प्रकार ज्ञान हुआ करता है; जैसे लोकमें ‘नील’ विशाल और सुगन्धित कमल [—ऐसा कहकर ऐसे कमलका अन्य कमलोंसे पृथग्रूपसे निश्चय किया जाता है] ।

शंका—अन्य विशेषणोंका व्यावर्तन करनेपर ही कोई विशेष विशेषित हुआ करता है; जैसे—नीला अथवा लाल कमल । जिस समय अनेक द्रव्य एक ही जातिके और अनेक विशेषणोंकी योग्यतावाले होते हैं तभी विशेषणोंकी सार्थकता होती है । एक ही वस्तुमें, किसी अन्य विशेषणका सम्बन्ध न हो सकनेके कारण, विशेषणकी सार्थकता नहीं होती । जिस प्रकार यह सूर्य एक है उसी प्रकार ब्रह्म भी एक ही है; उसके सिवा अन्य ब्रह्म हैं ही नहीं, जिनसे कि नील कमलके समान उसकी विशेषता बतलायी जाय ।

समाधान—ऐसा कहना ठीक नहीं है, क्योंकि ये विशेषण लक्षणके लिये हैं । [अब इस सूत्ररूप वाक्यकी ही व्याख्या करते हैं—] यह दोष नहीं हो सकता; क्यों नहीं हो सकता? क्योंकि ये विशेषण लक्षणार्थप्रधान हैं, केवल विशेषणप्रधान ही नहीं हैं । किन्तु लक्षण-लक्ष्य तथा विशेषण-विशेष्यमें विशेषता (अन्तर) क्या है? सो बतलाते हैं—विशेषण तो अपने विशेष्यका उसके सजातीय पदार्थोंसे ही व्यावर्तन करनेवाले होते हैं, किन्तु लक्षण उसे सभीसे व्यावृत्त कर देता है; जिस प्रकार अवकाश देनेवाला ‘आकाश’ होता है—इस वाक्यमें है । यह हम पहले ही कह चुके हैं कि यह वाक्य [आत्माका] लक्षण करनेके लिये है ।

सत्यादि शब्द परार्थ (दूसरेके लिये) होनेके कारण परस्पर सम्बन्धित नहीं हैं । वे तो विशेष्यके ही लिये हैं । अतः उनमेंसे प्रत्येक विशेषणशब्द परस्पर एक-दूसरेकी अपेक्षा न रखकर ही ‘सत्यं ब्रह्म, ज्ञानं ब्रह्म, अनन्तं ब्रह्म’ इस प्रकार ‘ब्रह्म’ शब्दसे सम्बन्धित है ।

सत्यम्—जो पदार्थ जिस रूपसे निश्चय किया गया है उससे व्यभिचरित न होनेके कारण वह सत्य कहलाता है । जो पदार्थ जिस रूपसे निश्चित किया गया है उस रूपसे व्यभिचरित होनेपर वह मिथ्या कहा जाता है । इसलिये विकार मिथ्या है । “विकार केवल वाणीसे आरम्भ होनेवाला और नाममात्र है, बस, मृत्तिका ही सत्य है” इस प्रकार निश्चय किया जानेके कारण सत् ही सत्य है । अतः ‘सत्यं ब्रह्म’ यह वाक्य ब्रह्मको विकारमात्रसे निवृत्त करता है ।

इससे ब्रह्मका कारणत्व प्राप्त होता है और वस्तुरूप होनेसे कारणमें कारकत्व रहा करता है । अतः मृत्तिकाके समान उसकी जडरूपताका प्रसङ्ग उपस्थित हो जाता है । इसीसे ‘ज्ञानं ब्रह्म’ ऐसा कहा है । ‘ज्ञान’ ज्ञप्ति यानी अवबोधको कहते हैं । ‘ज्ञान’ शब्द भाववाचक है; ‘सत्य’ और ‘अनन्त’ के साथ ब्रह्मका विशेषण होनेके कारण उसका अर्थ ‘ज्ञानकर्ता’ नहीं हो सकता । उसका ज्ञानकर्तृत्व स्वीकार करनेपर ब्रह्मकी सत्यता और अनन्तता सम्भव नहीं है । ज्ञानकर्तारूपसे विकारको प्राप्त होनेवाला होकर ब्रह्म सत्य और अनन्त कैसे हो सकता है? जो किसीसे भी विभक्त नहीं होता वही अनन्त हो सकता है । ज्ञानकर्ता होनेपर तो वह ज्ञेय और ज्ञानसे विभक्त होगा; इसलिये उसकी अनन्तता सिद्ध नहीं हो सकेगी । “जहाँ किसी दूसरेको नहीं जानता वह भूमा है और जहाँ किसी दूसरेको जानता है वह अल्प है” इस एक दूसरी श्रुतिसे यही सिद्ध होता है ।

इस श्रुति में ‘दूसरे को नहीं जानता’ इस प्रकार विशेष का प्रतिषेध होने के कारण वह स्वयं अपने को ही जानता है—ऐसी यदि कोई शङ्का करे तो ठीक नहीं, क्योंकि यह वाक्य भूमा के लक्षण का विधान करने में प्रवृत्त है । ‘यत्र नान्यत्पश्यति’ इत्यादि वाक्य भूमा के लक्षण का विधान करने में तत्पर है । अन्य अन्य को देखता है—इस लोकप्रसिद्ध वस्तुस्थिति को स्वीकार कर ‘जहाँ ऐसा नहीं है वह भूमा है’—इस प्रकार उसके द्वारा भूमा के स्वरूप का बोध कराया जाता है । ‘अन्य’ शब्द का ग्रहण तो यथाप्राप्त द्वैत का प्रतिषेध करने के लिये है; अतः यह वाक्य अपने में क्रिया का अस्तित्व प्रतिपादन करने के लिये नहीं है और स्वात्मा में तो भेद का अभाव होने के कारण उसका विज्ञान होना सम्भव ही नहीं है । आत्मा का विज्ञेयत्व स्वीकार करने पर तो ज्ञाता के अभाव का प्रसङ्ग उपस्थित हो जाता है, क्योंकि वह तो विज्ञेयरूप से ही विनियुक्त (प्रयुक्त) हो चुका है । [अब उसे ज्ञाता कैसे माना जाय? ]

शंका—एक ही आत्मा ज्ञेय और ज्ञाता दोनों प्रकार से हो सकता है—ऐसा माने तो?

समाधान—नहीं, वह अंशरहित होने के कारण एक साथ उभयरूप नहीं हो सकता । निरवयव ब्रह्म का एक साथ ज्ञेय और ज्ञाता होना सम्भव नहीं है । इसके सिवा यदि आत्मा घटादि के समान विज्ञेय हो तो ज्ञान के उपदेश की व्यर्थता हो जायगी । जो वस्तु घटादि के समान प्रसिद्ध है उसके ज्ञान का उपदेश सार्थक नहीं हो सकता । अतः उसका ज्ञातृत्व मानने पर उसकी अनन्तता नहीं रह सकती । ज्ञानकर्तृत्वादि विशेष से युक्त होने पर उसका सन्मात्रत्व भी सम्भव नहीं है । और “वह सत्य है” इस एक अन्य श्रुति से उसका सत्यरूप होना ही सन्मात्रत्व है । अतः ‘सत्य’ और ‘अनन्त’ शब्दों के साथ विशेषणरूप से ‘ज्ञान’ शब्द का प्रयोग किया जाने के कारण वह भाववाचक है । अतः ‘ज्ञानं ब्रह्म’ इस विशेषण का उसके कर्तृत्वादि कारकों की निवृत्ति के लिये तथा मृत्तिका आदि के समान उसकी जडरूपता की निवृत्ति के लिये प्रयोग किया जाता है ।

‘ज्ञानं ब्रह्म’ ऐसा कहने से ब्रह्म का अन्तवत्त्व प्राप्त होता है, क्योंकि लौकिक ज्ञान अन्तवान् ही देखा गया है । अतः उसकी निवृत्ति के लिये ‘अनन्तम्’ ऐसा कहा है ।

शंका—सत्यादि शब्द तो अनृतादि धर्मों की निवृत्ति के लिये हैं और उनका विशेष्य ब्रह्म कमल आदि के समान प्रसिद्ध नहीं है; अतः “मृगतृष्णा के जल में स्नान करके सिर पर आकाशकुसुम का मुकुट धारण किये तथा हाथ में शशशृङ्ग का धनुष लिये यह वन्ध्या का पुत्र जा रहा है” इस उक्ति के समान इस ‘सत्यं ज्ञानम्’ इत्यादि वाक्य की शून्यार्थता ही प्राप्त होती है ।

समाधान—नहीं, क्योंकि वे [सत्यादि] लक्षण करने के लिये हैं । सत्यादि शब्द विशेषण होने पर भी उनका प्रधान प्रयोजन लक्षण के लिये होना ही है—यह हम पहले ही कह चुके हैं । यदि लक्ष्य शून्य हो तब तो उसका लक्षण बतलाना भी व्यर्थ ही होगा । अतः लक्षणार्थ होने के कारण उनकी शून्यार्थता नहीं है—ऐसा हम मानते हैं । विशेषण के लिये होने पर भी सत्यादि शब्द के अपने अर्थ का त्याग तो होता ही नहीं है । यदि सत्यादि शब्दों की शून्यार्थता हो तो वे अपने विशेष्य के नियन्ता हैं—ऐसा नहीं माना जा सकता । सत्यादि अर्थों से अर्थवान् होने पर ही उनके द्वारा अपनेसे विपरीत धर्मवाले विशेष्यों से अपने विशेष्य ब्रह्म का नियन्तृत्व बन सकता है । ‘ब्रह्म’ शब्द भी अपने अर्थ से अर्थवान् ही है । उन [सत्यादि तीन शब्दों] में ‘अनन्त’ शब्द उसके अन्तवत्त्व का प्रतिषेध करने के द्वारा उसका विशेषण होता है तथा ‘सत्य’ और ‘ज्ञान’ शब्द तो अपने अर्थों के समर्पण द्वारा ही उसके विशेषण होते हैं ।

शंका—“उस इस आत्मा से आकाश उत्पन्न हुआ” इस श्रुति में ‘आत्मा’ शब्द का प्रयोग ब्रह्म के ही लिये किया जाने के कारण ब्रह्म जाननेवाले का आत्मा ही है । “इस आनन्दमय आत्मा को प्राप्त हो जाता है” इस वाक्य से श्रुति उसकी आत्मता दिखलाती है तथा उसके प्रवेश करने से भी [उसका आत्मत्व सिद्ध होता है] । “उसे रचकर वह उसीमें प्रविष्ट हो गया” ऐसा कहकर श्रुति उसीका जीवरूप से शरीर में प्रवेश होना दिखलाती है । अतः ब्रह्म जाननेवाले का स्वरूप ही है ।

इस प्रकार आत्मा होने से तो उसे ज्ञान का कर्तृत्व सिद्ध होता है । ‘आत्मा ज्ञाता है’ यह बात तो प्रसिद्ध ही है । “उसने कामना की” इस श्रुति से कामना करनेवाले के ज्ञानकर्तृत्व की सिद्धि होती है । अतः ब्रह्म का ज्ञानकर्तृत्व निश्चित होने के कारण ‘ब्रह्म ज्ञप्तिमात्र है’ ऐसा कहना अनुचित है ।

इसके सिवा ऐसा मानने से अनित्यत्व का प्रसङ्ग भी उपस्थित होता है । यदि ‘ज्ञान ज्ञप्ति को कहते हैं’ इस व्युत्पत्ति के अनुसार ब्रह्म की भावरूपता मानी जाय तो भी उसके अनित्यत्व और पारतन्त्र्य का प्रसङ्ग उपस्थित हो जाता है, क्योंकि धातुओं के अर्थ कारकों की अपेक्षावाले हुआ करते हैं । ज्ञान भी धातु का अर्थ है; अतः इसकी भी अनित्यता और परतन्त्रता सिद्ध होती है ।

समाधान—ऐसी बात नहीं है; क्योंकि ज्ञान ब्रह्म के स्वरूप से अभिन्न है, इस कारण उसका कार्यत्व केवल उपचार से है । आत्मा का स्वरूप जो ‘ज्ञप्ति’ है वह उससे व्यतिरिक्त नहीं है । अतः वह (ज्ञप्ति) नित्या ही है । तथापि चक्षु आदि के द्वारा विषयरूप में परिणत होनेवाली उपाधिरूप बुद्धि की जो शब्दादिरूप प्रतीतियाँ हैं वे आत्मविज्ञान की विषयभूत होकर उत्पन्न होती हुई आत्मविज्ञान से व्याप्त ही उत्पन्न होती हैं [अर्थात् अपनी उत्पत्ति के समय उन प्रतीतियों में तो आत्मविज्ञान से प्रकाशित होने की योग्यता रहती है और आत्मविज्ञान उन्हें प्रकाशित करता रहता है] । अतः वे धातुओं की अर्थभूत एवं ‘विज्ञान’ शब्दवाच्य आत्मविज्ञान की प्रतीतियाँ आत्मा का ही विकाररूप धर्म हैं—ऐसी अविवेकियों द्वारा कल्पना की जाती है ।

किन्तु उस ब्रह्म का जो विज्ञान है वह सूर्य के प्रकाश तथा अग्नि की उष्णता के समान ब्रह्म के स्वरूप से भिन्न नहीं है, बल्कि उसका स्वरूप ही है; उसे किसी अन्य कारण की अपेक्षा नहीं है, क्योंकि वह नित्यस्वरूप है । तथा उस ब्रह्म से सम्पूर्ण भावपदार्थों के देश-काल अभिन्न हैं, और वह काल तथा आकाशादि का भी कारण एवं निरतिशय सूक्ष्म है; अतः ऐसी कोई सूक्ष्म, व्यवहित (व्यवधानवाली), विप्रकृष्ट (दूर) तथा भूत, भविष्यत् या वर्तमान वस्तु नहीं है जो उसके द्वारा जानी न जाती हो; इसलिये वह ब्रह्म सर्वज्ञ है ।

“वह बिना हाथ-पाँव के ही वेग से चलने और ग्रहण करनेवाला है, बिना नेत्र के ही देखता है और बिना कान के ही सुनता है । वह सम्पूर्ण वेद्यमात्र को जानता है, उसे जाननेवाला और कोई नहीं है, उसे सर्वप्रथम परमपुरुष कहा गया है ।” इस मन्त्रवर्ण से तथा “अविनाशी होने के कारण विज्ञाता के ज्ञान का कभी लोप नहीं होता और उससे भिन्न कोई दूसरा भी नहीं है [जो उसे देखे]” इत्यादि श्रुतियों से भी यही सिद्ध होता है । अपने विज्ञातृस्वरूप से अभिन्न तथा इन्द्रियादि साधनों की अपेक्षा से रहित होने के कारण ज्ञानस्वरूप होने पर भी ब्रह्म का नित्यत्व भली प्रकार सिद्ध ही है । अतः क्रियारूप न होने के कारण वह (ज्ञान) धातु का अर्थ भी नहीं है ।

इसीलिये वह ज्ञानकर्ता भी नहीं है और इसीसे वह ब्रह्म ‘ज्ञान’ शब्द का वाच्य भी नहीं है । तो भी ज्ञानाभास के वाचक तथा बुद्धि के धर्मविषयक ‘ज्ञान’ शब्द से वह लक्षित होता है—कहा नहीं जाता; क्योंकि वह शब्द की प्रवृत्ति के हेतुभूत जाति आदि धर्मों से रहित है । इसी प्रकार ‘सत्य’ शब्द से भी [उसको लक्षित ही किया जा सकता है] ब्रह्म का स्वरूप सम्पूर्ण विशेषणों से शून्य है; अतः वह सामान्यतः सत्ता ही जिसका विषय—अर्थ है ऐसे ‘सत्य’ शब्द से ‘सत्यं ब्रह्म’ इस प्रकार केवल लक्षित होता है—ब्रह्म ‘सत्य’ शब्द का वाच्य ही नहीं है ।

इस प्रकार ये सत्यादि शब्द एक-दूसरे की सन्निधि से एक-दूसरे के नियम्य और नियामक होकर सत्यादि शब्दों के वाच्यार्थ से ब्रह्म को अलग रखनेवाले और उसका लक्षण करने में उपयोगी होते हैं । अतः “जहाँसे मन के सहित वाणी उसे न पाकर लौट आती है” “न कहने योग्य और अनाश्रित में” इत्यादि श्रुतियों के अनुसार ब्रह्म का सत्यादि शब्दों का अवाच्यत्व और नीलकमल के समान अवाक्यार्थत्व सिद्ध होता है ।

उपर्युक्त प्रकार से व्याख्या किये हुए उस ब्रह्म को जो पुरुष गुहा में निहित (छिपा हुआ) जानता है । संवरण अर्थात् आच्छादन अर्थवाले ‘गुह’ धातु से ‘गुहा’ शब्द निष्पन्न होता है; इस (गुहा)-में ज्ञान, ज्ञेय और ज्ञातृ पदार्थ निगूढ (छिपे हुए) हैं इसलिये ‘गुहा’ बुद्धि का नाम है । अथवा उसमें भोग और अपवर्ग—ये पुरुषार्थ निगूढ अवस्था में स्थित हैं; अतः गुहा है । उसके भीतर परम-प्रकृष्ट व्योम—आकाश में अर्थात् अव्याकृताकाश में, क्योंकि “हे गार्गि! निश्चय इस अक्षर में ही आकाश [ओतप्रोत है]” इस श्रुति के अनुसार अक्षर की सन्निधि में होने से यह अव्याकृताकाश ही परमाकाश है । अथवा ‘गुहायां व्योम्नि’ इस प्रकार इन दोनों पदों का सामानाधिकरण्य होने के कारण आकाश को ही गुहा कहा गया है, क्योंकि सबका कारण और सूक्ष्मतर होने के कारण उसमें भी तीनों कालों में सारे पदार्थ छिपे हुए हैं । उसीके भीतर ब्रह्म भी स्थित है ।

परन्तु युक्तियुक्त तो यही है कि हृदयाकाश ही परमाकाश है, क्योंकि उस आकाश को विज्ञानाङ्ग यानी उपासना के अंगरूप से बतलाना यहाँ इष्ट है । “जो आकाश इस [शरीर संज्ञक] पुरुष से बाहर है” “जो आकाश इस पुरुष के भीतर है” “जो यह आकाश हृदय के भीतर है” इस प्रकार एक अन्य श्रुति से हृदयाकाश का परमत्व प्रसिद्ध है । उस हृदयाकाश में जो बुद्धिरूप गुहा है उसमें ब्रह्म निहित है; अर्थात् उस (बुद्धिवृत्ति)- से वह व्यावृत्त (पृथक्)-रूप से स्पष्टतया उपलब्ध होता है; अन्यथा ब्रह्म का किसी भी विशेष देश या काल से सम्बन्ध नहीं है, क्योंकि वह सर्वगत और निर्विशेष है ।

वह इस प्रकार ब्रह्म को जाननेवाला क्या करता है? इसपर श्रुति कहती है—वह सम्पूर्ण अर्थात् निःशेष कामनाओं यानी इच्छित भोगों को प्राप्त कर लेता है अर्थात् उन्हें भोगता है । तो क्या वह हमारे-तुम्हारे समान पुत्र एवं स्वर्गादि भोगों को क्रम से भोगता है? इसपर श्रुति कहती है—नहीं, उन्हें एक साथ भोगता है । वह एक ही क्षण में बुद्धिवृत्ति पर आरूढ़ हुए सम्पूर्ण भोगों को सूर्य के प्रकाश के समान नित्य तथा ब्रह्मस्वरूप से अभिन्न एक ही उपलब्धि के द्वारा, जिसका हमने ‘सत्यं ज्ञानमनन्तम्’ ऐसा निरूपण किया है, भोगता है । ‘ब्रह्मणा सह सर्वान्कामानश्नुते’ इस वाक्य से यही अर्थ कहा गया है ।

ब्रह्मभूत विद्वान् ब्रह्मस्वरूप से ही एक साथ सम्पूर्ण भोगों को प्राप्त कर लेता है । अर्थात् दूसरे लोग जिस प्रकार जल में प्रतिबिम्बित सूर्य के समान अपने औपाधिक और संसारी आत्मा के द्वारा धर्मादि निमित्त की अपेक्षावाले तथा चक्षु आदि इन्द्रियों की अपेक्षा से युक्त सम्पूर्ण भोगों को क्रमशः भोगते हैं उस प्रकार उन्हें नहीं भोगता । तो फिर कैसे भोगता है? वह उपर्युक्त प्रकार से सर्वज्ञ, सर्वगत, सर्वात्मक एवं नित्यब्रह्मात्मस्वरूप से, धर्मादि निमित्त की अपेक्षा से रहित तथा चक्षु आदि इन्द्रियों से भी निरपेक्ष सम्पूर्ण भोगों को एक साथ ही प्राप्त कर लेता है—यह इसका तात्पर्य है । विपश्चित्—मेधावी अर्थात् सर्वज्ञ ब्रह्मरूप से । ब्रह्म का जो सर्वज्ञत्व है वही उसकी विपश्चित्ता (विद्वत्ता) है । उस सर्वज्ञस्वरूप ब्रह्मरूप से ही वह उन्हें भोगता है । मूल में ‘इति’ शब्द मन्त्र की समाप्ति सूचित करने के लिये है ।

‘ब्रह्मविदाप्नोति परम्’ इस ब्राह्मणवाक्य द्वारा इस सम्पूर्ण वल्ली का अर्थ सूत्ररूप से कह दिया है । उस सूत्रभूत अर्थ की ही मन्त्र द्वारा संक्षेप से व्याख्या कर दी गयी है । अब फिर उसीका अर्थ विस्तार से निर्णय करना है—इसीलिये उसका वृत्तिरूप ‘तस्माद्वा एतस्मात्’ इत्यादि आगे का ग्रन्थ आरम्भ किया जाता है ।

उस मन्त्र में सबसे पहले ‘सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म’ ऐसा कहा है । वह सत्य, ज्ञान और अनन्त किस प्रकार है? सो बतलाते हैं—अनन्तता तीन प्रकार की है—देश से, काल से और वस्तु से । उनमें जैसे आकाश देशतः अनन्त है । उसका देश से परिच्छेद नहीं है । किन्तु काल से और वस्तु से आकाश की अनन्तता नहीं है । क्यों नहीं है? क्योंकि वह कार्य है । किन्तु आकाश के समान किसीका कार्य न होने के कारण ब्रह्म का इस प्रकार काल से भी अन्तवत्त्व नहीं है । जो वस्तु किसीका कार्य होती है वही काल से परिच्छिन्न होती है । और ब्रह्म किसीका कार्य नहीं है, इसलिये उसकी काल से अनन्तता है ।

इसी प्रकार वह वस्तु से भी अनन्त है । वस्तु से उसकी अनन्तता किस प्रकार है? क्योंकि वह सबसे अभिन्न है । भिन्न वस्तु ही किसी अन्य भिन्न वस्तु का अन्त हुआ करती है, क्योंकि किसी भिन्न वस्तु में गयी हुई बुद्धि ही किसी अन्य प्रसक्त वस्तु से निवृत्त की जाती है । जिस [पदार्थसम्बन्धिनी] बुद्धि की जिस पदार्थ से निवृत्ति होती है वही उस पदार्थ का अन्त है । जिस प्रकार गोत्वबुद्धि अश्वत्वबुद्धि से निवृत्त होती है, अतः गोत्व का अन्त अश्वत्व हुआ, इसलिये वह अन्तवान् ही है और उसका वह अन्त भिन्न पदार्थों में ही देखा जाता है । किन्तु ब्रह्म का ऐसा कोई भेद नहीं है । अतः वस्तु से भी उसकी अनन्तता है ।

किन्तु ब्रह्म की सबसे अभिन्नता किस प्रकार है? सो बतलाते हैं—क्योंकि वह सम्पूर्ण वस्तुओं का कारण है—ब्रह्म काल-आकाश आदि सभी वस्तुओं का कारण है । यदि कहो कि अपने कार्य की अपेक्षा से तो उसका वस्तु से अन्तवत्त्व हो ही जायगा, तो ऐसा कहना ठीक नहीं; क्योंकि कार्यरूप वस्तु तो मिथ्या है—वस्तुतः कारण से भिन्न कार्य है ही नहीं जिससे कि कारणबुद्धि की निवृत्ति हो “वाणी से आरम्भ होनेवाला विकार केवल नाममात्र है, मृत्तिका ही सत्य है” इसी प्रकार “सत् ही सत्य है”—ऐसा एक अन्य श्रुति से भी सिद्ध होता है ।

अतः आकाशादि का कारण होने से ब्रह्म देश से भी अनन्त है । आकाश देशतः अनन्त है—यह तो प्रसिद्ध ही है, और यह उसका कारण है; अतः आत्मा का देशतः अनन्तत्व सिद्ध ही है, क्योंकि लोक में असर्वगत वस्तु से कोई सर्वगत वस्तु उत्पन्न होती नहीं देखी जाती । इसलिये आत्मा का देशतः अनन्तत्व निरतिशय है [अर्थात् उससे बड़ा और कोई नहीं है] । इसी प्रकार किसीका कार्य न होने के कारण वह कालतः और उससे भिन्न पदार्थ का सर्वथा अभाव होने के कारण वस्तुतः भी अनन्त है । इसलिये आत्मा का सबसे बढ़कर सत्यत्व है ।

[मन्त्र में] ‘तस्मात्’ (उससे) इस पदद्वारा मूलवाक्य में से सूत्ररूप से कहे हुए ‘ब्रह्म’ पद का परामर्श किया जाता है । तथा इसके अनन्तर ‘एतस्मात्’ इत्यादि मन्त्रवाक्य से भी पूर्वनिर्दिष्ट ब्रह्म का ही उल्लेख किया गया है । [तात्पर्य यह है—] जिस ब्रह्म का पहले ब्राह्मणवाक्यद्वारा सूत्ररूप से उल्लेख किया गया है और जो उसके पश्चात् ‘सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म’ इस प्रकार लक्षित किया गया है उस इस ब्रह्म—आत्मा से, अर्थात् ‘आत्मा’ शब्दवाच्य ब्रह्म से—क्योंकि “तत् सत्यं स आत्मा” इत्यादि एक अन्य श्रुति के अनुसार वह सबका आत्मा है; अतः यहाँ ब्रह्म ही आत्मा है—उस इस आत्मस्वरूप ब्रह्म से आकाश सम्भूत—उत्पन्न हुआ ।

जो शब्द गुणवाला और समस्त मूर्त पदार्थों को अवकाश देनेवाला है उसे ‘आकाश’ कहते हैं । उस आकाश से अपने गुण ‘स्पर्श’ और अपने पूर्ववर्ती आकाश के गुण ‘शब्द’ से युक्त दो गुणवाला वायु उत्पन्न हुआ । यहाँ प्रथम वाक्य के ‘सम्भूतः’ (उत्पन्न हुआ) इस क्रिया पद की [सर्वत्र] अनुवृत्ति की जाती है । वायु से अपने गुण ‘रूप’ और पहले दो गुणों के सहित तीन गुणवाला अग्नि उत्पन्न हुआ । तथा अग्नि से अपने गुण ‘रस’ और पहले तीन गुणों के सहित चार गुणवाला जल हुआ । और जल से अपने गुण ‘गन्ध’ और पहले चार गुणों के सहित पाँच गुणवाली पृथिवी उत्पन्न हुई । पृथिवी से ओषधियाँ, ओषधियों से अन्न और वीर्यरूप में परिणत हुए अन्न से सिर तथा हाथ-पाँवरूप आकृतिवाला पुरुष उत्पन्न हुआ ।

वह यह पुरुष अन्नरसमय अर्थात् अन्न और रस का विकार है । पुरुषाकार से भावित [अर्थात् पुरुष के आकार की वासना से युक्त] तथा उसके सम्पूर्ण अङ्गों से उत्पन्न हुआ तेजोरूप जो शुक्र है वह उसका बीज है । उससे जो उत्पन्न होता है वह भी उसी के समान पुरुषाकार ही होता है, क्योंकि सभी जातियों में उत्पन्न होनेवाले देहों में पिता के समान आकृति होने का नियम देखा जाता है ।

शंका—सृष्टि में सभी शरीर समानरूप से अन्न और रस के विकार तथा ब्रह्मा के वंश में उत्पन्न हुए हैं; फिर यहाँ पुरुष को ही क्यों ग्रहण किया गया है?

समाधान—प्रधानता के कारण ।

शंका—उसकी प्रधानता क्या है?

समाधान—कर्म और ज्ञान का अधिकार ही उसकी प्रधानता है । [कर्म और ज्ञान के साधन में] समर्थ, [उनके फल की] इच्छावाला और उससे उदासीन न होने के कारण पुरुष ही कर्म और ज्ञान का अधिकारी है । “पुरुष में ही आत्मा का पूर्णतया आविर्भाव हुआ है; वही प्रकृष्ट ज्ञान से सबसे अधिक सम्पन्न है । वह जानी-बूझी बात कहता है, जाने-बूझे पदार्थों को देखता है, वह कल होनेवाली बात भी जान सकता है, उसे उत्तम और अधम लोकों का ज्ञान है तथा वह कर्म-ज्ञानरूप नश्वर साधन के द्वारा अमर पद की इच्छा करता है—इस प्रकार वह विवेकसम्पन्न है । उसके सिवा अन्य पशुओं को तो केवल भूख-प्यास का ही विशेष ज्ञान होता है” ऐसी एक दूसरी श्रुति देखने से भी [पुरुष की प्रधानता सिद्ध होती है] ।

उस पुरुष को ही यहाँ (इस वल्ली में) विद्या के द्वारा सबकी अपेक्षा अन्तरतम ब्रह्म के पास ले जाना अभीष्ट है । किन्तु उसकी बुद्धि, जो बाह्याकार विशेषरूप अनात्म पदार्थों में आत्मभावना किये हुए है, किसी विशेष आलम्बन के बिना एकाएक सबसे अन्तरतम प्रत्यगात्मसम्बन्धिनी तथा निरालम्बना की जानी असम्भव है; अतः इस दिखलायी देनेवाले शरीररूप आत्मा की समानता की कल्पना से शाखाचन्द्र दृष्टान्त के समान उसका भीतर की ओर प्रवेश कराकर श्रुति कहती है—

उसका यह [सिर] ही सिर है । उस इस अन्नरसमय पुरुष का यह प्रसिद्ध सिर ही [सिर है] । [अगले अनुवाक में] प्राणमय आदि सिररहित कोशों में भी शिरस्त्व देखा जाने के कारण यहाँ भी वही बात न समझी जाय [अर्थात् इस अन्नमय कोश को भी वस्तुतः सिररहित न समझा जाय] इसलिये ‘यह प्रसिद्ध सिर ही उसका सिर है’—ऐसा कहा जाता है । इसी प्रकार पक्षादि के विषय में लगा लेना चाहिये । पूर्वाभिमुख व्यक्ति का यह दक्षिण [दक्षिण दिशा की ओर का] बाहु दक्षिण पक्ष है, यह वाम बाहु उत्तर पक्ष है तथा यह देह का मध्यभाग अङ्गों का आत्मा है; जैसा कि “मध्यभाग ही इन अङ्गों का आत्मा है” इस श्रुति से प्रमाणित होता है और यह जो नाभि से नीचे का अङ्ग है वही पुच्छ—प्रतिष्ठा है । इसके द्वारा वह स्थित होता है, इसलिये यह उसकी प्रतिष्ठा है । नीचे की ओर लटकने में समानता होने के कारण वह पुच्छ के समान पुच्छ है; जैसे कि गौ की पूँछ ।

इस अन्नमय कोश से आरम्भ करके ही साँचे में डाले हुए पिघले ताँबे की प्रतिमा के समान आगे के प्राणमय आदि कोशों के रूपकत्व की सिद्धि होती है । उसके विषय में ही यह श्लोक है; अर्थात् अन्नमय आत्मा को प्रकाशित करनेवाले उस ब्राह्मणोक्त अर्थ में ही यह श्लोक अर्थात् मन्त्र है ॥ १ ॥

संस्कृत भाष्य पढ़ें

ब्रह्मविद्ब्रह्मेति वक्ष्यमाणलक्षणं ब्रह्मविदो बृहत्तमत्वाद्वह्म ब्रह्मप्राप्तिनिरूपणम् तद्वेत्ति विजानातीति ब्रह्मविदाप्नोति परं निरतिशयं तदेव ब्रह्म परम् । न ह्यन्यस्य विज्ञानादन्यस्य प्राप्तिः । स्पष्टं च श्रुत्यन्तरं ब्रह्मप्राप्तिमेव ब्रह्मविदो दर्शयति “स यो ह वै तत्परमं ब्रह्म वेद ब्रह्मैव भवति” (मु० उ० ३ ।२ ।९) इत्यादि ।

ननु सर्वगतं सर्वस्यात्मभूतं ब्रह्म वक्ष्यति । अतो नाप्यम् । प्राप्तिश्चान्यस्यान्येन परिच्छिन्नस्य च परिच्छिन्नेन दृष्टा । अपरिच्छिन्नं सर्वात्मकं च ब्रह्मेत्यतः परिच्छिन्नवदनात्मवच्च तस्याप्तिरनुपपन्ना ।

नायं दोषः; कथम्? दर्शनादर्शनापेक्षत्वाब्रह्मण आप्त्यनाप्त्योः । परमार्थतो ब्रह्मरूपस्यापि सतोऽस्य जीवस्य भूतमात्राकृतबाह्यपरिच्छिन्नान्नमयाद्यात्मदर्शिनस्तदासक्तचेतसः प्रकृतसंख्यापूरणस्यात्मनोऽव्यवहितस्यापि बाह्यसंख्येयविषयासक्त चित्ततया स्वरूपाभावदर्शन-वत्परमार्थब्रह्मस्वरूपाभावदर्शन-लक्षणयाविद्ययान्नमयादीन्बाह्याननात्मन आत्मत्वेन प्रतिपन्नत्वादन्नमयाद्यनात्मभ्यो नान्योऽहमस्मीत्यभिमन्यते । एवमविद्ययात्मभूतमपि ब्रह्मानाप्तं स्यात् ।

तस्यैवमविद्ययानाप्तब्रह्मस्वरूपस्य प्रकृतसंख्यापूरणस्यात्मनोऽविद्ययानाप्तस्य सतः केनचित्स्मारितस्य पुनस्तस्यैव विद्ययाप्तिर्यथा तथा श्रुत्युपदिष्टस्य सर्वात्मब्रह्मण आत्मत्वदर्शनेन विद्यया तदाप्तिरुपपद्यत एव ।

ब्रह्मविदाप्नोति परमिति वाक्यं उत्तरग्रन्थाव- सूत्रभूतम् । सर्वस्य तरणिका वल्ल्यर्थस्य ब्रह्म-विदाप्नोति परमित्यनेन वाक्येन वेद्यतया सूत्रितस्य ब्रह्मणोऽनिर्धारितस्वरूपविशेषस्य सर्वतो व्यावृत्तस्वरूपविशेषसमर्पण-समर्थस्य लक्षणस्याविशेषेण चोक्तवेदनस्य ब्रह्मणो वक्ष्यमाणलक्षणस्य विशेषेण प्रत्यगात्मतयानन्यरूपेण विज्ञेयत्वाय, ब्रह्मविद्याफलं च ब्रह्मविदो यत्परब्रह्मप्राप्तिलक्षणमुक्तं स सर्वात्मभावः सर्वसंसार-धर्मातीतब्रह्मस्वरूपत्वमेव नान्य-दित्येतत्प्रदर्शनायैषर्गुदाह्रियते—तदेषाभ्युक्तेति ।

तत्तस्मिन्नेव ब्राह्मणवाक्योक्तेऽर्थ एषर्गभ्युक्ताम्नाता । सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्मेति ब्रह्मणो लक्षणार्थं वाक्यम् । सत्यादीनि हि त्रीणि विशेषणार्थानि पदानि विशेष्यस्य ब्रह्मणः । विशेष्यं ब्रह्म विवक्षितत्वाद्वेद्यतया । वेद्यत्वेन यतो ब्रह्म प्राधान्येन विवक्षितं तस्माद्विशेष्यं विज्ञेयम् । अतः अस्माद् विशेषणविशेष्यत्वादेव सत्यादीनि एकविभक्त्यन्तानि पदानि समानाधिकरणानि ।

सत्यादिभिस्त्रिभिर्विशेषणैर्विशेष्यमाणं ब्रह्म विशेष्यान्तरेभ्यो निर्धार्यते । एवं हि तज्ज्ञानं भवति यदन्येभ्यो निर्धारितम् । यथा लोके नीलं महत्सुगन्ध्युत्पलमिति ।

ननु विशेष्यं विशेषणान्तरं निर्विशेषस्य व्यभिचरद्विशेष्यते । विशेषणत्वे आक्षेपः यथा नीलं रक्तं चोत्पलमिति । यदा ह्यनेकानि द्रव्याण्येकजातीयान्यनेकविशेषणयोगीनि च तदा विशेषणस्यार्थवत्त्वम् । न ह्येकस्मिन्नेव वस्तुनि विशेषणान्तरायोगाद् । यथासावेक आदित्य इति, तथैकमेव च ब्रह्म न ब्रह्मान्तराणि येभ्यो विशेष्येत नीलोत्पलवत् ।

न; लक्षणार्थत्वाद्विशेषणा-ब्रह्मविशेषणानां नाम् । नायं दोषः; तल्लक्षणार्थत्वम् कस्मात्? यस्मा-ल्लक्षणार्थप्रधानानि विशेषणानि न विशेषणप्रधानान्येव । कः पुनर्लक्षणलक्ष्ययोर्विशेषणविशेष्ययोर्वा विशेष इति? उच्यते; समानजातीयेभ्य एव निवर्तकानि विशेषणानि विशेष्यस्य । लक्षणं तु सर्वत एव यथावकाशप्रदात्राकाशमिति । लक्षणार्थं च वाक्यमित्यवोचाम ।

सत्यादिशब्दा न परस्परं सत्यमित्यस्य सम्बध्यन्ते परार्थ-व्याख्यानम् त्वात् । विशेष्यार्था हि ते । अत एकैको विशेषण-शब्दः परस्परं निरपेक्षो ब्रह्मशब्देन सम्बध्यते सत्यं ब्रह्म ज्ञानं ब्रह्मानन्तं ब्रह्मेति ।

सत्यमिति यद्रूपेण यन्निश्चितं तद्रूपं न व्यभिचरति तत्सत्यम् । यद्रूपेण निश्चितं यत्तद्रूपं व्यभिचरदनृतमित्युच्यते । अतो विकारोऽनृतम् । “वाचारम्भणं विकारो नामधेयं मृत्तिकेत्येव सत्यम्” (छा० उ० ६ ।१ ।४) एवं सदेव सत्यमित्यवधारणात् । अतः सत्यं ब्रह्मेति ब्रह्म विकारात्रिवर्तयति ।

अतः कारणत्वं प्राप्तं ब्रह्मणः । ज्ञानमित्यस्य कारणस्य च तात्पर्यम् कारकत्वं वस्तुत्वान्मृद्व-ज्ञानकर्तृत्वाभाव- दचिद्रूपता च निरूपणं च प्राप्तात् इदमुच्यते ज्ञानं ब्रह्मेति । ज्ञानं ज्ञप्तिरवबोधः, भावसाधनो ज्ञानशब्दो न तु ज्ञानकर्तृ ब्रह्मविशेषणत्वात्सत्यानन्ताभ्यां सह । न हि सत्यतानन्तता च ज्ञानकर्तृत्वे सत्युपपद्यते । ज्ञानकर्तृत्वेन हि विक्रियमाणं कथं सत्यं भवेदनन्तं च । यद्धि न कुतश्चित्प्रविभज्यते तदनन्तम् । ज्ञानकर्तृत्वे च ज्ञेयज्ञानाभ्यां प्रविभक्तमित्यनन्तता न स्यात् । “यत्र नान्यद्विजानाति स भूमा अथ यत्रान्यद्विजानाति तदल्पम्” (छा० उ० ७ ।२४ ।१) इति श्रुत्यन्तरात् ।

नान्यद्विजानातीति विशेषप्रतिषेधादात्मानं विजानातीति चेन्न; भूमलक्षणविधिपरत्वाद्वाक्यस्य । यत्र नान्यत्पश्यतीत्यादि भूम्नो लक्षणविधिपरं वाक्यम् । यथा प्रसिद्धमेवान्योऽन्यत्पश्यतीत्येतदुपादाय यत्र तन्नास्ति स भूमेति भूमस्वरूपं तत्र ज्ञाप्यते । अन्यग्रहणस्य प्राप्तप्रतिषेधार्थत्वान्न स्वात्मनि क्रियास्तित्वपरं वाक्यम् । स्वात्मनि च भेदाभावाद्विज्ञानानुपपत्तिः । आत्मनश्च विज्ञेयत्वे ज्ञातृभावप्रसङ्गः, ज्ञेयत्वेनैव विनियुक्तत्वात् ।

एक एवात्मा ज्ञेयत्वेन ज्ञातृत्वेन चोभयथा भवतीति चेत्?

न युगपदनंशत्वात् । न हि निरवयवस्य युगपज्ज्ञेयज्ञातृत्वोपपत्तिः । आत्मनश्च घटादिवद्विज्ञेयत्वे ज्ञानोपदेशानर्थक्यम् । न हि घटादिवत्प्रसिद्धस्य ज्ञानोपदेशोऽर्थवान् । तस्माज्ज्ञातृत्वे सति आनन्त्यानुपपत्तिः । सन्मात्रत्वं चानुपपन्नं ज्ञानकर्तृत्वादिविशेषवत्त्वे सति । सन्मात्रत्वं च सत्यत्वम् “तत्सत्यम्” (छा० उ० ६ । ८ । १६) इति श्रुत्यन्तरात् । तस्मात्सत्यानन्तशब्दाभ्यां सह विशेषणत्वेन ज्ञानशब्दस्य प्रयोगाद्भावसाधनो ज्ञानशब्दः । ज्ञानं ब्रह्मेति कर्तृत्वादिकारकनिवृत्त्यर्थं मृदादिवदचिद्रूपतानिवृत्त्यर्थं च प्रयुज्यते ।

ज्ञानं ब्रह्मेतिवचनात्प्राप्तमन्तवत्त्वम् ।

अनन्तमित्यस्य लौकिकस्य ज्ञाननिरुक्तिः स्यान्तवत्त्वदर्शनात् । अतस्तन्निवृत्त्यर्थमाह—अनन्तमिति ।

सत्यादीनामनृतादिधर्मनिवृत्तिब्रह्मणः शून्यार्थपरत्वाद्विशेष्यस्य त्वमाशङ्क्यते ब्रह्मण उत्पलादिवदप्रसिद्धत्वात् “मृगतृष्णाम्भसि स्नातः खपुष्पकृतशेखरः । एष वन्ध्यासुतो याति शशशृङ्गधनुर्धरः” इतिवच्छून्यार्थतैव प्राप्ता सत्यादिवाक्यस्येति चेत्?

न; लक्षणार्थत्वात् । विशेषणत्वेऽपि सत्यादीनां लक्षणार्थप्राधान्यमित्यवोचाम । शून्ये हि लक्ष्येऽनर्थकं लक्षणवचनं लक्षणार्थत्वान्मन्यामहे न शून्यार्थतेति । विशेषणार्थत्वेऽपि च सत्यादीनां स्वार्थापरित्याग एव । शून्यार्थत्वे हि सत्यादिशब्दानां विशेष्यनियन्तृत्वानुपपत्तिः । सत्याद्यर्थैरर्थवत्त्वे तु तद्विपरीतधर्मवद्भ्यो विशेष्येभ्यो ब्रह्मणो विशेष्यस्य नियन्तृत्वमुपपद्यते । ब्रह्मशब्दोऽपि स्वार्थे- नार्थवानेव । तत्रानन्तशब्दोऽन्तवत्त्वप्रतिषेधद्वारेण विशेषणम् । सत्यज्ञानशब्दौ तु स्वार्थसमर्पणेनैव विशेषणे भवतः ।

“तस्माद्वा एतस्मादात्मनः” इति ब्रह्मण्येवात्मशब्दप्रयोगाद्वेदितुरात्मैव ब्रह्म । “एतमानन्दमयमात्मानमुपसंक्रामति” (तै० उ० २ । ८ । ५) इति चात्मतां दर्शयति । तत्प्रवेशाच्च; “तत्सृष्ट्वा तदेवानुप्राविशत्” (तै० उ० २ । ६ । १) इति च तस्यैव जीवरूपेण शरीरप्रवेशं दर्शयति । अतो वेदितुः स्वरूपं ब्रह्म ।

एवं तर्ह्यात्मत्वाज्ज्ञानकर्तृत्वम् । आत्मा ज्ञातेति हि प्रसिद्धम् । “सोऽकामयत” (तै० उ० २ । ६ । १) इति च कामिनो ज्ञानकर्तृत्वाज्ज्ञप्तिर्ब्रह्मेत्ययुक्तम् ।

अनित्यत्वप्रसङ्गाच्च । यदि नाम ज्ञप्तिर्ज्ञानमिति भावरूपता ब्रह्मणस्तथाप्यनित्यत्वं प्रसज्येत पारतन्त्र्यं च । धात्वर्थानां कारकापेक्षत्वात् । ज्ञानं च धात्वर्थोऽतोऽस्यानित्यत्वं परतन्त्रता च ।

न, स्वरूपाव्यतिरेकेण कार्यतन्निरसनम् त्वोपचारात् । आत्मनः स्वरूपं ज्ञप्तिर्न ततो व्यतिरिच्यतेऽतो नित्यैव । तथापि बुद्धेरुपाधिलक्षणायाश्चक्षुरादिद्वारैर्विषयाकारेण परिणामिन्या ये शब्दाद्याकारावभासाः त आत्मविज्ञानस्य विषयभूता उत्पद्यमाना एवात्मविज्ञानेन व्याप्ता उत्पद्यन्ते । तस्मादात्मविज्ञानावभासाश्च ते विज्ञानशब्दवाच्याश्च धात्वर्थभूता आत्मन एव धर्मा विक्रियारूपा इत्यविवेकिभिः परिकल्प्यन्ते ।

यत्तु यद्ब्रह्मणो विज्ञानं तत् सवितृप्रकाशवदग्न्युष्णवच्च ब्रह्मस्वरूपाव्यतिरिक्तं स्वरूपमेव तत्; न तत्कारणान्तरसव्यपेक्षम् । नित्यस्वरूपत्वात् । सर्वभावानां च तेनाविभक्तदेशकालत्वात् कालाकाशादिकारणत्वाच्च निरतिशयसूक्ष्मत्वाच्च । न तस्यान्यदविज्ञेयं सूक्ष्मं व्यवहितं विप्रकृष्टं भूतं भवद्भविष्यद्वास्ति । तस्मात्सर्वज्ञं तद्ब्रह्म ।

मन्त्रवर्णाच्च—“अपाणिपादो जवनो ग्रहीता पश्यत्यचक्षुः स शृणोत्यकर्णः । स वेत्ति वेद्यं न च तस्यास्ति वेत्ता तमाहुरग्र्यं पुरुषं महान्तम्” (श्वे० उ० ३ । १९) इति । “न हि विज्ञातुर्विज्ञातेर्विपरिलोपो विद्यतेऽविनाशित्वान्न तु तद्द्वितीयमस्ति” (बृ० उ० ४ । ३ । ३०) इत्यादि श्रुतेश्च । विज्ञातृस्वरूपाव्यतिरेकात्करणादिनिमित्तानपेक्षत्वाच्च ब्रह्मणो ज्ञानस्वरूपत्वेऽपि नित्यत्वप्रसिद्धिरतो नैव धात्वर्थस्तदक्रियारूपत्वात् ।

अत एव च न ज्ञानकर्तृ, तस्मादेव च न ज्ञानशब्दवाच्यमपि तद्ब्रह्म । तथापि तदाभासवाचकेन बुद्धिधर्मविषयेण ज्ञानशब्देन तल्लक्ष्यते न तूच्यते । शब्दप्रवृत्तिहेतुजात्यादिधर्मरहितत्वात् । तथा सत्यशब्देनापि । सर्वविशेषप्रत्यस्तमितस्वरूपत्वाद्ब्रह्मणो बाह्यसत्तासामान्यविषयेण सत्यशब्देन लक्ष्यते सत्यं ब्रह्मेति न तु सत्यशब्दवाच्यमेव ब्रह्म ।

एवं सत्यादिशब्दा इतरेतरसंनिधावन्योन्यनियम्यनियामकाः सन्तः सत्यादिशब्दवाच्यात्तन्निवर्तका ब्रह्मणो लक्षणार्थाश्च भवन्तीत्यतः सिद्धम् “यतो वाचो निवर्तन्ते अप्राप्य मनसा सह” (तै० उ० २ । ४ । १) “अनिरुक्तेऽनिलयने” (तै० उ० २ ।

७ । १) इति चावाच्यत्वं नीलोत्पलवदवाक्यार्थत्वं च ब्रह्मणः ।

तद्यथाव्याख्यातं ब्रह्म यो वेद गुहाशब्दार्थ- विजानाति निहितं निर्वचनम् स्थितं गुहायाम् । गूहतेः संवरणार्थस्य निगूढा अस्यां ज्ञानज्ञेयज्ञातृपदार्था इति गुहा बुद्धिः । गूढावस्थां भोगापवर्गौ पुरुषार्थाविति वा तस्यां परमे प्रकृष्टे व्योमन्व्योम्न्याकाशेऽव्याकृताख्ये । तद्धि परमं व्योम “एतस्मिन्नु खल्वक्षरे गार्ग्याकाशः (बृ० उ० ३ । ८ । ११) इत्यक्षरसंनिकर्षात् । गुहायां व्योम्नीति वा सामानाधिकरण्यादव्याकृताकाशमेव गुहा । तत्रापि निगूढाः सर्वे पदार्थास्त्रिषु कालेषु कारणत्वात्सूक्ष्मतरत्वाच्च । तस्मिन्नन्तर्निहितं ब्रह्म ।

हार्दमेव तु परमं व्योमेति न्याय्यं विज्ञानाङ्गत्वेनोपासनाङ्गत्वेन व्योम्नो विवक्षितत्वात् । “यो वै स बहिर्धा पुरुषादाकाशः” (छा० उ० ३ । १२ । ७) “यो वै सोऽन्तःपुरुष आकाशः” (छा० उ० ३ । १२ । ८) “योऽयमन्तर्हृदय आकाशः” (छा० उ० ३ । १२ । ९) इति श्रुत्यन्तरात्प्रसिद्धं हार्दस्य व्योम्नः परमत्वम् । तस्मिन्हार्दे व्योम्नि या बुद्धिर्गुहा तस्यां निहितं ब्रह्म तद्वृत्त्या विविक्ततयोपलभ्यत इति । न ह्यन्यथा विशिष्टदेशकालसम्बन्धोऽस्ति ब्रह्मणः सर्वगतत्वान्निर्विशेषत्वाच्च ।

स एवं ब्रह्म विजानन्किब्रह्मविद मित्याह—अश्नुते भुङ्क्ते ऐश्वर्यम् सर्वान्निरवशिष्टान्कामान्भोगानित्यर्थः । किमस्मदादिवत्पुत्रस्वर्गादीन्पर्यायेण नेत्याह । सह युगपदेकक्षणोपारूढानेव एकयोपलब्ध्या सवितृप्रकाशवत् नित्यया ब्रह्मस्वरूपाव्यतिरिक्तया यामवोचाम सत्यं ज्ञानमनन्तमिति । एतदुच्यते—ब्रह्मणा सहेति ।

ब्रह्मभूतो विद्वान्ब्रह्मस्वरूपेणैव सर्वान्कामान्सहाश्नुते, न यथोपाधिकृतेन स्वरूपेणात्मना जलसूर्यकादिवत्प्रतिबिम्बभूतेन सांसारिकेण धर्मादिनिमित्तापेक्षांश्चक्षुरादिकरणापेक्षांश्च कामान् पर्यायेणाश्नुते लोकः, कथं तर्हि? यथोक्तेन प्रकारेण सर्वज्ञेन सर्वगतेन सर्वात्मना नित्यब्रह्मात्मस्वरूपेण धर्मादिनिमित्तानपेक्षांश्चक्षुरादिकरणनिरपेक्षांश्च सर्वान्कामान्सहैवाश्नुत इत्यर्थः । विपश्चिता मेधाविना सर्वज्ञेन । तद्धि वैपश्चित्यं यत्सर्वज्ञत्वं तेन सर्वज्ञस्वरूपेण ब्रह्मणाश्नुत इति । इतिशब्दो मन्त्रपरिसमाप्त्यर्थः ।

सर्व एव वल्ल्यर्थो ब्रह्मविदाप्नोति परमिति ब्राह्मणवाक्येन सूत्रितः । स च सूत्रितोऽर्थः संक्षेपतो मन्त्रेण व्याख्यातः । पुनस्तस्यैव विस्तरेणार्थनिर्णयः कर्तव्य इत्युत्तरस्तद्वृत्तिस्थानीयो ग्रन्थ आरभ्यते तस्माद्वा एतस्मादित्यादिः ।

तत्र च सत्यं ज्ञानमनन्तं सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्मेत्युक्तं मन्त्रादौ ब्रह्मेति मीमांस्यते तत्कथं सत्यं ज्ञानमनन्तं चेत्यत आह । तत्र त्रिविधं ह्यानन्त्यं देशतः कालतो वस्तुतश्चेति । तद्यथा देशतोऽनन्त आकाशः । न हि देशतस्तस्य परिच्छेदोऽस्ति । न तु कालतश्चानन्त्यं वस्तुतश्चाकाशस्य । कस्मात्कार्यत्वात् । नैवं ब्रह्मण आकाशवत्कालतोऽप्यन्तवत्त्वमकार्यत्वात् । कार्यं हि वस्तु कालेन परिच्छिद्यते । अकार्यं च ब्रह्म । तस्मात्कालतोऽस्यानन्त्यम् ।

तथा वस्तुतः । कथं पुनर्वस्तुत आनन्त्यं सर्वानन्यत्वात् । भिन्नं हि वस्तु वस्त्वन्तरस्यान्तो भवति, वस्त्वन्तरबुद्धिर्हि प्रसक्ताद्वस्त्वन्तरान्निवर्तते । यतो यस्य बुद्धेर्विनिवृत्तिः स तस्यान्तः । तद्यथा गोत्वबुद्धिरश्वत्वान्निवर्तत इति अश्वत्वान्तं गोत्वमित्यन्तवदेव भवति । स चान्तो भिन्नेषु वस्तुषु दृष्टः । नैवं ब्रह्मणो भेदः । अतो वस्तुतोऽप्यानन्त्यम् ।

कथं पुनः सर्वानन्यत्वं ब्रह्मण ब्रह्मणः सार्वात्म्यं इत्युच्यते—सर्वनिरूप्यते वस्तुकारणत्वात् । सर्वेषां हि वस्तूनां कालाकाशादीनां कारणं ब्रह्म । कार्यापेक्षया वस्तुतोऽन्तवत्त्वमिति चेन्न; अनृतत्वात्कार्यवस्तुनः । न हि कारणव्यतिरेकेण कार्यं नाम वस्तुतोऽस्ति यतः कारणबुद्धिर्विनिवर्तेत । “वाचारम्भणं विकारो नामधेयं मृत्तिकेत्येव सत्यम्” (छा० उ० ६ । १ । ४) एवं सदेव सत्यमिति श्रुत्यन्तरात् ।

तस्मादाकाशादिकारणत्वाद्देशतस्तावदनन्तं ब्रह्म । आकाशो ह्यनन्त इति प्रसिद्धं देशतः, तस्येदं कारणं तस्मात्सिद्धं देशत आत्मन आनन्त्यम् । न ह्यसर्वगतात्सर्वगतमुत्पद्यमानं लोके किंचिद्दृश्यते । अतो निरतिशयमात्मन आनन्त्यं देशतस्तथाकार्यत्वात्कालतः, तद्भिन्नवस्त्वन्तराभावाच्च वस्तुतः । अत एव निरतिशयसत्यत्वम् ।

तस्मादिति मूलवाक्यसूत्रितं सृष्टिक्रमः ब्रह्म परामृश्यते । एतस्मादितिमन्त्रवाक्येनानन्तरं यथा लक्षितम् । यद्ब्रह्मादौ ब्राह्मणवाक्येन सूत्रितं यच्च सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्मेत्यनन्तरमेव लक्षितं तस्मादेतस्माद्ब्रह्मण आत्मन आत्मशब्दवाच्यात् । आत्मा हि तत्सर्वस्य “तत्सत्यं स आत्मा” (छा० उ० ६ । ८—१६) इति श्रुत्यन्तरादतो ब्रह्मात्मा । तस्मादेतस्माद्ब्रह्मण आत्मस्वरूपादाकाशः सम्भूतः समुत्पन्नः ।

आकाशो नाम शब्दगुणोऽवकाशकरो मूर्तद्रव्याणाम् । तस्माद् आकाशात्स्वेन स्पर्शगुणेन पूर्वेण च कारणगुणेन शब्देन द्विगुणो वायुः सम्भूत इत्यनुवर्तते । वायोश्च स्वेन रूपगुणेन पूर्वाभ्यां च त्रिगुणोऽग्निः सम्भूतः । अग्नेः स्वेन रसगुणेन पूर्वैश्च त्रिभिश्चतुर्गुणा आपः सम्भूताः । अद्भ्यः स्वेन गन्धगुणेन पूर्वैश्चतुर्भिः पञ्चगुणा पृथिवी सम्भूता । पृथिव्या ओषधयः । ओषधीभ्योऽन्नम् । अन्नाद्रेतोरूपेण परिणतात् पुरुषः शिरःपाण्याद्याकृतिमान् ।

स वा एष पुरुषोऽन्नरसमयोऽन्नरसविकारः । पुरुषाकृतिभावितं हि सर्वेभ्योऽङ्गेभ्यस्तेजः सम्भूतं रेतो बीजम्; तस्माद्यो जायते सोऽपि तथा पुरुषाकृतिरेव स्यात् । सर्वजातिषु जायमानानां जनकाकृतिनियमदर्शनात् ।

सर्वेषामप्यन्नरसविकारत्वे ब्रह्मवंश्यत्वे चाविशिष्टे कस्मात्पुरुष एव गृह्यते?

प्राधान्यात् ।

किं पुनः प्राधान्यम् ।

कर्मज्ञानाधिकारः । पुरुष एव कथं पुरुषस्य हि शक्तत्वादर्थिप्राधान्यम् त्वादपर्युदस्तत्वाच्च कर्मज्ञानयोरधिक्रियते—“पुरुषे त्वेवाविस्तरामात्मा स हि प्रज्ञानेन सम्पन्नतमो विज्ञातं वदति विज्ञातं पश्यति वेद श्वस्तनं वेद लोकालोकौ मर्त्येनामृतमीक्षतीत्येवं सम्पन्नः । अथेतरेषां पशूनामशनायापिपासे एवाभिविज्ञानम् ।” इत्यादिश्रुत्यन्तरदर्शनात् ।

स हि पुरुष इह विद्यान्तरतमं ब्रह्म संक्रामयितुमिष्टः । तस्य च बाह्याकारविशेषेष्वनात्मस्वात्मभाविता बुद्धिर्नालम्ब्य विशेषं कंचित्सहसान्तरतमप्रत्यगात्मविषया निरालम्बना च कर्तुमशक्येति दृष्टशरीरात्मसामान्यकल्पनया शाखाचन्द्रनिदर्शनवदन्तः प्रवेशयन्नाह—

तस्येदमेव शिरः । तस्यास्य पक्ष्यात्मनान्नपुरुषस्यान्नरसमयमयस्य निरूपणम् स्येदमेव शिरः प्रसिद्धम् । प्राणमयादिष्वशिरसां शिरस्त्वदर्शनादिहापि तत्प्रसङ्गो मा भूदितीदमेव शिर इत्युच्यते । एवं पक्षादिषु योजना । अयं दक्षिणो बाहुः पूर्वाभिमुखस्य दक्षिणः पक्षः । अयं सव्यो बाहुरुत्तरः पक्षः । अयं मध्यमो देहभाग आत्माङ्गानाम् । “मध्यं ह्येषामङ्गानामात्मा” इति श्रुतेः । इदमिति नाभेरधस्ताद्यदङ्गं तत्पुच्छं प्रतिष्ठा । प्रतितिष्ठत्यनयेति प्रतिष्ठा पुच्छमिव पुच्छम् अधोलम्बनसामान्याद्यथा गोः पुच्छम् ।

एतत्प्रकृत्योत्तरेषां प्राणमयादीनां रूपकत्वसिद्धिः; मूषानिषिक्तद्रुतताम्रप्रतिमावत् । तदप्येष श्लोको भवति । तत्तस्मिन्नेवार्थे ब्राह्मणोक्तेऽन्नमयात्मप्रकाशक एष श्लोको मन्त्रो भवति ॥ १ ॥

इति ब्रह्मानन्दवल्ल्यां प्रथमोऽनुवाकः ॥ १ ॥


द्वितीय अनुवाक