वल्ली 2 अनुवाक 2 - मन्त्र 1

अन्नाद्वै प्रजाः प्रजायन्ते ।
याः काश्च पृथिवीग्ँश्रिताः ।
अथो अन्नेनैव जीवन्ति ।
अथैनदपि यन्त्यन्ततः ।
अन्नग्ँहि भूतानां ज्येष्ठम् ।
तस्मात्सर्वौषधमुच्यते ।
सर्वं वै तेऽन्नमाप्नुवन्ति येऽन्नं ब्रह्मोपासते ।
अन्नग्ँहि भूतानां ज्येष्ठम् ।
तस्मात्सर्वौषधमुच्यते ।
अन्नाद्भूतानि जायन्ते ।
जातान्यन्नेन वर्धन्ते ।
अद्यतेऽत्ति च भूतानि ।
तस्मादन्नं तदुच्यत इति ।
तस्माद्वा एतस्मादन्नरसमयादन्योऽन्तर आत्मा प्राणमयः ।
तेनैष पूर्णः ।
स वा एष पुरुषविध एव ।
तस्य पुरुषविधतामन्वयं पुरुषविधः ।
तस्य प्राण एव शिरः ।
व्यानो दक्षिणः पक्षः ।
अपान उत्तरः पक्षः ।
आकाश आत्मा ।
पृथिवी पुच्छं प्रतिष्ठा ।
तदप्येष श्लोको भवति ॥ १ ॥

annādvai prajāḥ prajāyante .
yāḥ kāśca pṛthivīg̐śritāḥ .
atho annenaiva jīvanti .
athainadapi yantyantataḥ .
annag̐hi bhūtānāṃ jyeṣṭham .
tasmātsarvauṣadhamucyate .
sarvaṃ vai te’nnamāpnuvanti ye’nnaṃ brahmopāsate .
annag̐hi bhūtānāṃ jyeṣṭham .
tasmātsarvauṣadhamucyate .
annādbhūtāni jāyante .
jātānyannena vardhante .
adyate’tti ca bhūtāni .
tasmādannaṃ taducyata iti .
tasmādvā etasmādannarasamayādanyo’ntara ātmā prāṇamayaḥ .
tenaiṣa pūrṇaḥ .
sa vā eṣa puruṣavidha eva .
tasya puruṣavidhatāmanvayaṃ puruṣavidhaḥ .
tasya prāṇa eva śiraḥ .
vyāno dakṣiṇaḥ pakṣaḥ .
apāna uttaraḥ pakṣaḥ .
ākāśa ātmā .
pṛthivī pucchaṃ pratiṣṭhā .
tadapyeṣa śloko bhavati .. 1 ..


अन्नसे ही प्रजा उत्पन्न होती है । जो कुछ प्रजा पृथिवीको आश्रित करके स्थित है वह सब अन्नसे ही उत्पन्न होती है; फिर वह अन्नसे ही जीवित रहती है और अन्तमें उसीमें लीन हो जाती है, क्योंकि अन्न ही प्राणियोंका ज्येष्ठ (अग्रज—पहले उत्पन्न होनेवाला) है । इसीसे वह सर्वौषध कहा जाता है । जो लोग ‘अन्न ही ब्रह्म है’ इस प्रकार उपासना करते हैं वे निश्चय ही सम्पूर्ण अन्न प्राप्त करते हैं । अन्न ही प्राणियोंमें बड़ा है; इसलिये वह सर्वौषध कहलाता है । अन्नसे ही प्राणी उत्पन्न होते हैं, उत्पन्न होकर अन्नसे ही वृद्धिको प्राप्त होते हैं । अन्न प्राणियोंद्वारा खाया जाता है और वह भी उन्हींको खाता है । इसीसे वह ‘अन्न’ कहा जाता है । उस इस अन्नरसमय पिण्डसे, उसके भीतर रहनेवाला दूसरा शरीर प्राणमय है । उसके द्वारा यह (अन्नमय कोश) परिपूर्ण है । वह यह (प्राणमय कोश) भी पुरुषाकार ही है । उस (अन्नमय कोश)-की पुरुषाकारताके अनुसार ही यह भी पुरुषाकार है । उसका प्राण ही सिर है । व्यान दक्षिण पक्ष है । अपान उत्तर पक्ष है । आकाश आत्मा (मध्यभाग) है और पृथिवी पुच्छ—प्रतिष्ठा है । उसके विषयमें ही यह श्लोक है ॥ १ ॥

रसादिरूप में परिणत हुए अन्न से ही स्थावर-जङ्गमरूप प्रजा उत्पन्न होती है । ‘वै’ यह निपात स्मरण के अर्थ में है । जो कुछ प्रजा अविशेषभाव से पृथिवी को आश्रित किये हुए है वह सब अन्न से ही उत्पन्न होती है और फिर उत्पन्न होने पर वह अन्न से ही जीवित रहती—प्राण धारण करती अर्थात् वृद्धि को प्राप्त होती है तथा अन्त में—जीवनरूप वृत्ति की समाप्ति होने पर वह अन्न में ही लीन हो जाती है । [‘अपियन्ति’ इसमें] ‘अपि’ शब्द ‘प्रति’ के अर्थ में है अर्थात् वह अन्न के प्रति ही लीन हो जाती है ।

इसका कारण क्या है? क्योंकि अन्न ही प्राणियों का ज्येष्ठ यानी अग्रज है । अन्नमय आदि जो इतर प्राणी हैं उनका कारण अन्न ही है । इसलिये सम्पूर्ण प्रजा अन्न से उत्पन्न होनेवाली, अन्न के द्वारा जीवित रहनेवाली और अन्न में ही लीन हो जानेवाली है । क्योंकि ऐसी बात है, इसलिये अन्न सर्वौषध—सम्पूर्ण प्राणियों के देह के सन्ताप को शान्त करनेवाला कहा जाता है ।

अन्नरूप ब्रह्म की उपासना करनेवाले का [प्राप्तव्य] फल बतलाया जाता है—वे निश्चय ही सम्पूर्ण अन्नसमूह को प्राप्त कर लेते हैं । कौन? जो उपर्युक्त अन्न की ही ब्रह्मरूप से उपासना करते हैं । किस प्रकार [उपासना करते हैं]? इस तरह कि मैं अन्न से उत्पन्न अन्नस्वरूप और अन्न में ही लीन हो जानेवाला हूँ; इसलिये अन्न ब्रह्म है ।

‘अन्न ही आत्मा है’ इस प्रकार की उपासना किस प्रकार सम्पूर्ण अन्न की प्राप्तिरूप फलवाली है, सो बतलाते हैं—अन्न ही प्राणियों का ज्येष्ठ है—प्राणियों से पहले उत्पन्न होने के कारण, क्योंकि वह उनसे ज्येष्ठ है, इसलिये वह सर्वौषध कहा जाता है । अतः सम्पूर्ण अन्न की आत्मारूप से उपासना करनेवाले के लिये सम्पूर्ण अन्न की प्राप्ति उचित ही है । अन्न से प्राणी उत्पन्न होते हैं और उत्पन्न होने पर अन्न से ही वृद्धि को प्राप्त होते हैं—यह पुनरुक्ति उपासना के उपसंहार के लिये है ।

अब ‘अन्न’ शब्द की व्युत्पत्ति कही जाती है—जो प्राणियों द्वारा ‘अद्यते’—खाया जाता है और जो स्वयं भी प्राणियों को ‘अत्ति’ खाता है, इसलिये सम्पूर्ण प्राणियों का भोज्य और उनका भोक्ता होने के कारण भी वह ‘अन्न’ कहा जाता है । इस वाक्य में ‘इति’ शब्द प्रथम कोश के विवरण की परिसमाप्ति के लिये है ।

अनेक तुषाओंवाले धानों को तुषरहित करके जिस प्रकार चावल निकाल लिये जाते हैं उसी प्रकार अन्नमय से लेकर आनन्दमय कोशपर्यन्त सम्पूर्ण शरीरों की अपेक्षा आन्तरतम ब्रह्म को विद्या के द्वारा अपने प्रत्यगात्मरूप से दिखलाने की इच्छावाला शास्त्र अविद्याकल्पित पाँच कोशों का बाध करता हुआ ‘तस्माद्वा एतस्मादन्नरसमयात्’ इत्यादि वाक्य से आरम्भ करता है—

उस इस पूर्वोक्त अन्नरसमय पिण्ड से अन्य यानी पृथक् और उसके भीतर रहनेवाला आत्मा, जो अन्नरसमय पिण्ड के समान मिथ्या ही आत्मारूप से कल्पना किया हुआ है, प्राणमय है । प्राण—वायु उससे युक्त अर्थात् तत्प्राय [यानी उसमें प्राण की ही प्रधानता है] । जिस प्रकार वायु से धौंकनी भरी रहती है उसी प्रकार उस प्राणमय से यह अन्नरसमय शरीर भरा हुआ है । वह यह प्राणमय आत्मा पुरुषविध अर्थात् सिर और पक्षादि के कारण पुरुषाकार ही है ।

क्या वह स्वतः ही पुरुषाकार है? इसपर कहते हैं— ‘नहीं, अन्नरसमय शरीर की पुरुषाकारता तो प्रसिद्ध ही है; उस अन्नरसमय की पुरुषविधता— पुरुषाकारता के अनुसार साँचे में ढली हुई प्रतिमा के समान यह प्राणमय कोश भी पुरुषाकार है—स्वतः ही पुरुषाकार नहीं है । इसी प्रकार पूर्व-पूर्व की पुरुषाकारता है और उसके अनुसार पीछे-पीछे का कोश भी पुरुषाकार है; तथा पूर्व-पूर्व कोश पीछे-पीछे के कोश से पूर्ण (भरा हुआ) है ।

इसकी पुरुषाकारता किस प्रकार है? सो बतलायी जाती है—उस प्राणमय का प्राण ही सिर है । वायु के विकाररूप प्राणमय कोश का मुख और नासिका से निकलनेवाला प्राण, जो मुख्य प्राण की वृत्तिविशेष है, श्रुति के वचनानुसार सिररूप से ही कल्पना किया जाता है । इसके सिवा आगे भी श्रुति के वचनानुसार ही पक्ष आदि की कल्पना की गयी है । व्यान अर्थात् व्यान नाम की वृत्ति दक्षिण पक्ष है, अपान उत्तर पक्ष है, आकाश आत्मा है । यहाँ प्राणवृत्ति का अधिकार होने के कारण [‘आकाश’ शब्द से] आकाश में स्थित जो समानसंज्ञक प्राण की वृत्ति है वही आत्मा है । अपने आस-पास की अन्य सब वृत्तियों की अपेक्षा मध्यवर्तिनी होने के कारण वह आत्मा है । “इन अंगों का मध्य आत्मा है” इस श्रुति से मध्यवर्ती अंग का आत्मत्व प्रसिद्ध ही है ।

पृथिवी पुच्छ-प्रतिष्ठा है । ‘पृथिवी’ इस शब्द से पृथिवी की अधिष्ठात्री देवी समझनी चाहिये, क्योंकि स्थिति की हेतुभूत होने से वही आध्यात्मिक प्राण को भी धारण करनेवाली है । इस विषय में ”वह पृथिवी-देवता पुरुष के अपान को आश्रय करके” इत्यादि एक दूसरी श्रुति भी है । अन्यथा प्राण की उदानवृत्ति से या तो शरीर ऊपर को उड़ जाता अथवा गुरुतावश गिर पड़ता । अतः पृथिवी-देवता ही प्राणमय शरीर की पुच्छ—प्रतिष्ठा है । उसी अर्थ में अर्थात् प्राणमय आत्मा के विषय में ही यह श्लोक प्रसिद्ध है ॥ १ ॥

संस्कृत भाष्य पढ़ें

अन्नाद्रसादिभावपरिणतात्, अन्नमयोपासन- वै इति स्मरणार्थः, फलम् प्रजाः स्थावरजङ्गमाः प्रजायन्ते । याः काश्चाविशिष्टाः पृथिवीं श्रिताः पृथिवीमाश्रितास्ताः सर्वा अन्नादेव प्रजायन्ते । अथो अपि जाता अन्नेनैव जीवन्ति प्राणान्धारयन्ति वर्धन्त इत्यर्थः । अथाप्येनदन्नमपियन्त्यपिगच्छन्ति । अपिशब्दः प्रतिशब्दार्थे । अन्नं प्रति प्रलीयन्त इत्यर्थः । अन्ततोऽन्ते जीवनलक्षणाया वृत्तेः परिसमाप्तौ ।

कस्मात्? अन्नं हि यस्माद् भूतानां प्राणिनां ज्येष्ठं प्रथमजम् । अन्नमयादीनां हीतरेषां भूतानां कारणमन्नमतोऽन्नप्रभवा अन्नजीवना अन्नप्रलयाश्च सर्वाः प्रजाः । यस्माच्चैवं तस्मात्सर्वौषधं सर्वप्राणिनां देहदाहप्रशमनमन्नमुच्यते ।

अन्नब्रह्मविदः फलमुच्यते—सर्वं वै ते समस्तमन्नजातमाप्नुवन्ति । के? येऽन्नं ब्रह्म यथोक्तमुपासते ।

कथम्? अन्नजोऽन्नात्मान्नप्रलयोऽहं तस्मादन्नं ब्रह्मेति ।

कुतः पुनः सर्वान्नप्राप्तिफलमन्नात्मोपासनमित्युच्यते । अन्नं हि भूतानां ज्येष्ठम् । भूतेभ्यः पूर्वं निष्पन्नत्वाज्ज्येष्ठं हि यस्मात्तस्मात्सर्वौषधमुच्यते । तस्मादुपपन्ना सर्वान्नात्मोपासकस्य सर्वान्नप्राप्तिः । अन्नाद्भूतानि जायन्ते । जातान्यन्नेन वर्धन्त इत्युपसंहारार्थं पुनर्वचनम् ।

इदानीमन्ननिर्वचनमुच्यते—

अन्नशब्द- अद्यते भुज्यते चैव निर्वचनम् यद्भूतैरन्नमत्ति च भूतानि स्वयं तस्माद्भूतैर्भुज्यमानत्वाद्भूतभोक्तृत्वाच्चान्नं तदुच्यते । इतिशब्दः प्रथमकोशपरिसमाप्त्यर्थः ।

अन्नमयादिभ्य आनन्दमयाअन्नमयकोश- न्तेभ्य आत्मभ्योनिरासः ऽभ्यन्तरतमं ब्रह्म विद्यया प्रत्यगात्मत्वेन दिदर्शयिषुः शास्त्रमविद्याकृतपञ्चकोशापनयनेनानेकतुषकोद्रववितुषीकरणेनेव तदन्तर्गततण्डुलान् प्रस्तौति तस्माद्वा एतस्मादन्नरसमयादित्यादि ।

तस्मादेतस्माद्यथोक्तादन्नरसप्राणमयकोश- मयात्पिण्डादन्यो निर्वचनम् व्यतिरिक्तोऽन्तरोऽभ्यन्तर आत्मा पिण्डवदेव मिथ्या परिकल्पित आत्मत्वेन प्राणमयः प्राणो वायुस्तन्मयस्तत्प्रायः । तेन प्राणमयेनान्नरसमय आत्मैष पूर्णो वायुनेव दृतिः । स वा एषः प्राणमय आत्मा पुरुषविध एव पुरुषाकार एव, शिरःपक्षादिभिः ।

किं स्वत एव, नेत्याह । प्राणमयस्य प्रसिद्धं तावदन्नरसपुरुषविधत्वम् मयस्यात्मनः पुरुषविधत्वम् । तस्यान्नरसमयस्य पुरुषविधतां पुरुषाकारतामनु अयं प्राणमयः पुरुषविधो मूषानिषिक्तप्रतिमावन्न स्वत एव । एवं पूर्वस्य पूर्वस्य पुरुषविधतामनूत्तरोत्तरः पुरुषविधो भवति पूर्वः पूर्वश्चोत्तरोत्तरेण पूर्णः ।

कथं पुनः पुरुषविधतास्य इत्युच्यते । तस्य प्राणमयस्य प्राण एव शिरः । प्राणमयस्य वायुविकारस्य प्राणो मुखनासिकानिःसरणो वृत्तिविशेषः शिर एव परिकल्प्यते वचनात् । सर्वत्र वचनादेव पक्षादिकल्पना । व्यानो व्यानवृत्तिर्दक्षिणः पक्षः । अपान उत्तरः पक्षः । आकाश आत्मा । य आकाशस्थो वृत्तिविशेषः समानाख्यः स आत्मेवात्मा; प्राणवृत्त्यधिकारात् । मध्यस्थत्वादितराः पर्यन्ता वृत्तीरपेक्ष्यात्मा । “मध्यं ह्येषामङ्गानामात्मा” इति श्रुतिप्रसिद्धं मध्यमस्थस्यात्मत्वम् ।

पृथिवी पुच्छं प्रतिष्ठा । पृथिवीति पृथिवीदेवताध्यात्मिकस्य प्राणस्य धारयित्री स्थितिहेतुत्वात् । ”सैषा पुरुषस्यापानमवष्टभ्य” (बृ० उ० ३ ।८) इति हि श्रुत्यन्तरम् । अन्यथोदानवृत्त्योर्ध्वगमनं गुरुत्वाच्च पतनं वा स्याच्छरीरस्य । तस्मात्पृथिवी देवता पुच्छं प्रतिष्ठा प्राणमयस्यात्मनः । तत्तस्मिन्नेवार्थे प्राणमयात्मविषय एष श्लोको भवति ॥ १ ॥

इति ब्रह्मानन्दवल्ल्यां द्वितीयोऽनुवाकः ॥ २ ॥


तृतीय अनुवाक