अप्राप्य मनसा सह ।
आनन्दं ब्रह्मणो विद्वान् ।
न बिभेति कदाचनेति ।
तस्यैष एव शारीर आत्मा यः पूर्वस्य ।
तस्माद्वा एतस्मान्मनोमयादन्योऽन्तर आत्मा विज्ञानमयस्तेनैष पूर्णः ।
स वा एष पुरुषविध एव ।
तस्य पुरुषविधतामन्वयं पुरुषविधः ।
तस्य श्रद्धैव शिरः ।
ऋतं दक्षिणः पक्षः ।
सत्यमुत्तरः पक्षः ।
योग आत्मा ।
महः पुच्छं प्रतिष्ठा ।
तदप्येष श्लोको भवति ॥ १ ॥
yato vāco nivartante .
aprāpya manasā saha .
ānandaṃ brahmaṇo vidvān .
na bibheti kadācaneti .
tasyaiṣa eva śārīra ātmā yaḥ pūrvasya .
tasmādvā etasmānmanomayādanyo’ntara ātmā vijñānamayastenaiṣa pūrṇaḥ .
sa vā eṣa puruṣavidha eva .
tasya puruṣavidhatāmanvayaṃ puruṣavidhaḥ .
tasya śraddhaiva śiraḥ .
ṛtaṃ dakṣiṇaḥ pakṣaḥ .
satyamuttaraḥ pakṣaḥ .
yoga ātmā .
mahaḥ pucchaṃ pratiṣṭhā .
tadapyeṣa śloko bhavati .. 1 ..
जहाँ से मन के सहित वाणी उसे न पाकर लौट आती है—इत्यादि [अर्थ स्पष्ट ही है] उस पूर्वकथित प्राणमय का यही शारीर अर्थात् प्राणमय शरीर में रहनेवाला आत्मा है । कौन? यह जो मनोमय है । ‘तस्माद्वा एतस्मात्’ इत्यादि वाक्य का अर्थ पूर्ववत् समझना चाहिये । उस इस मनोमय से दूसरा इसका अन्तर आत्मा विज्ञानमय है अर्थात् मनोमय कोश के भीतर विज्ञानमय कोश है ।
मनोमय कोश वेदरूप बतलाया गया था । वेदों के अर्थ के विषय में जो निश्चयात्मिका बुद्धि है उसी का नाम विज्ञान है और वह अन्तःकरण का अध्यवसायरूप धर्म है । तन्मय अर्थात् प्रमाणस्वरूप निश्चय विज्ञान से (निश्चयात्मिका बुद्धि से) निष्पन्न होनेवाला आत्मा विज्ञानमय है, क्योंकि प्रमाण के विज्ञानपूर्वक ही यज्ञादि का विस्तार किया जाता है । विज्ञान यज्ञादि का हेतु है—यह बात श्रुति आगे चलकर मन्त्रद्वारा बतलायेगी ।
निश्चयात्मिका बुद्धिसम्पन्न पुरुष को सबसे पहले कर्तव्य कर्म में श्रद्धा ही उत्पन्न होती है । अतः सम्पूर्ण कर्मों में प्रथम होने के कारण वह सिर के समान उस विज्ञानमय का सिर है । ऋत और सत्य का अर्थ पहले (शीक्षावल्ली नवम अनुवाक में)-की हुई व्याख्या के ही समान है । योग—युक्ति अर्थात् समाधान ही आत्मा के समान उसका आत्मा है । युक्त अर्थात् समाधानसम्पन्न आत्मवान् पुरुष के ही अङ्गादि के समान श्रद्धा आदि साधन यथार्थ ज्ञान की प्राप्ति में समर्थ होते हैं । अतः समाधान यानी योग ही विज्ञानमय कोश का आत्मा है और महः उसकी पुच्छ—प्रतिष्ठा है ।
“प्रथम उत्पन्न हुए महान् यक्ष (पूजनीय)-को जानता है” इस एक अन्य श्रुति के अनुसार ‘महः’ यह महत्तत्त्व का नाम है । वही [विज्ञानमय का] कारण होने से उसकी पुच्छ—प्रतिष्ठा है, क्योंकि कारण ही कार्यवर्ग की प्रतिष्ठा (आश्रय) हुआ करता है, जैसे कि वृक्ष और लता-गुल्मादि की प्रतिष्ठा पृथिवी है । महत्तत्त्व ही बुद्धि के सम्पूर्ण विज्ञानों का कारण है । इसलिये वह विज्ञानमय आत्मा की प्रतिष्ठा है । पूर्ववत् उसके विषय में ही यह श्लोक है अर्थात् जैसे पहले श्लोक ब्राह्मणोक्त अन्नमय आदि के प्रकाशक हैं उसी प्रकार यह विज्ञानमय का भी प्रकाशक श्लोक है ॥ १ ॥
संस्कृत भाष्य पढ़ें
यतो वाचो निवर्तन्ते । अप्राप्य मनसा सहेत्यादि । तस्य पूर्वस्य प्राणमयस्यैष एवात्मा शारीरः शरीरे प्राणमये भवः शारीरः । कः? य एष मनोमयः । तस्माद्वा एतस्मादित्यादि पूर्ववत् । अन्योऽन्तर आत्मा विज्ञानमयो मनोमयस्याभ्यन्तरो विज्ञानमयः ।
मनोमयो वेदात्मोक्तः । वेदार्थविषया बुद्धिनिश्चयात्मिका विज्ञानं तच्चाध्यवसायलक्षणमन्तःकरणस्य धर्मः । तन्मयो निश्चयविज्ञानैः प्रमाणस्वरूपैर्निर्वर्तित आत्मा विज्ञानमयः । प्रमाणविज्ञानपूर्वको हि यज्ञादिस्तायते । यज्ञादिहेतुत्वं च वक्ष्यति श्लोकेन ।
निश्चयविज्ञानवतो हि कर्तव्येष्वर्थेषु पूर्वं श्रद्धोत्पद्यते । सा सर्वकर्तव्यानां प्राथम्याच्छिर इव शिरः । ऋतसत्ये यथाव्याख्याते एव । योगो युक्तिः समाधानम्, आत्मेवात्मा । आत्मवतो हि युक्तस्य समाधानवतोऽङ्गानीव श्रद्धादीनि यथार्थप्रतिपत्तिक्षमाणि भवन्ति । तस्मात्समाधानं योग आत्मा विज्ञानमयस्य । महः पुच्छं प्रतिष्ठा ।
मह इति महत्तत्त्वं प्रथमजम् । “महद्यक्षं प्रथमजं वेद” (बृ० उ० ५ । ४ । १) इति श्रुत्यन्तरात् । पुच्छं प्रतिष्ठा कारणत्वात् । कारणं हि कार्याणां प्रतिष्ठा । यथा वृक्षवीरुधां पृथिवी । सर्वबुद्धिविज्ञानानां च महत्तत्त्वं कारणम् । तेन तद्विज्ञानमयस्यात्मनः प्रतिष्ठा । तदप्येष श्लोको भवति पूर्ववत् । यथान्नमयादीनां ब्राह्मणोक्तानां प्रकाशकाः श्लोका एवं विज्ञानमयस्यापि ॥ १ ॥
इति ब्रह्मानन्दवल्ल्यां चतुर्थोऽनुवाकः ॥ ४ ॥