वल्ली 2 अनुवाक 6 - मन्त्र 1

असन्नेव स भवति ।
असद्ब्रह्मेति वेद चेत् ।
अस्ति ब्रह्मेति चेद्वेद ।
सन्तमेनं ततो विदुरिति ।
तस्यैष एव शारीर आत्मा यः पूर्वस्य ।
अथातोऽनुप्रश्नाः ।
उताविद्वानमुं लोकं प्रेत्य कश्चन गच्छती ३ ।
आहो विद्वानमुं लोकं प्रेत्य कश्चित्समश्नुता ३ उ ।
सोऽकामयत ।
बहु स्यां प्रजायेयेति ।
स तपोऽतप्यत ।
स तपस्तप्त्वा इदग्ँसर्वमसृजत यदिदं किंच ।
तत्सृष्ट्वा तदेवानुप्राविशत् ।
तदनुप्रविश्य सच्च त्यच्चाभवत् ।
निरुक्तं चानिरुक्तं च ।
निलयनं चानिलयनं च विज्ञानं चाविज्ञानं च ।
सत्यं चानृतं च सत्यमभवत् ।
यदिदं किंच ।
तत्सत्यमित्याचक्षते ।
तदप्येष श्लोको भवति ॥ १ ॥

asanneva sa bhavati .
asadbrahmeti veda cet .
asti brahmeti cedveda .
santamenaṃ tato viduriti .
tasyaiṣa eva śārīra ātmā yaḥ pūrvasya .
athāto’nupraśnāḥ .
utāvidvānamuṃ lokaṃ pretya kaścana gacchatī 3 .
āho vidvānamuṃ lokaṃ pretya kaścitsamaśnutā 3 u .
so’kāmayata .
bahu syāṃ prajāyeyeti .
sa tapo’tapyata .
sa tapastaptvā idag̐sarvamasṛjata yadidaṃ kiṃca .
tatsṛṣṭvā tadevānuprāviśat .
tadanupraviśya sacca tyaccābhavat .
niruktaṃ cāniruktaṃ ca .
nilayanaṃ cānilayanaṃ ca vijñānaṃ cāvijñānaṃ ca .
satyaṃ cānṛtaṃ ca satyamabhavat .
yadidaṃ kiṃca .
tatsatyamityācakṣate .
tadapyeṣa śloko bhavati .. 1 ..


यदि पुरुष ‘ब्रह्म असत् है’ ऐसा जानता है तो वह स्वयं भी असत् ही हो जाता है और यदि ऐसा जानता है कि ‘ब्रह्म है’ तो [ब्रह्मवेत्ताजन] उसे सत् समझते हैं । उस पूर्वकथित (विज्ञानमय)-का यह जो [आनन्दमय] है शरीर-स्थित आत्मा है । अब (आचार्य का ऐसा उपदेश सुनने के अनन्तर शिष्य के) ये अनुप्रश्न हैं—क्या कोई अविद्वान् पुरुष भी इस शरीर को छोड़ने के अनन्तर परमात्मा को प्राप्त हो सकता है? अथवा कोई विद्वान् भी इस शरीर को छोड़ने के अनन्तर परमात्मा को प्राप्त होता है या नहीं? [इन प्रश्नों का उत्तर देने के लिये आचार्य भूमिका बाँधते हैं—] उस परमात्मा ने कामना की ‘मैं बहुत हो जाऊँ अर्थात् मैं उत्पन्न हो जाऊँ ।’ अतः उसने तप किया । उसने तप करके ही यह जो कुछ है इस सब की रचना की । इसे रचकर वह इसी में अनुप्रविष्ट हो गया । इसमें अनुप्रवेश कर वह सत्यस्वरूप परमात्मा मूर्त-अमूर्त, [देशकालादि परिच्छिन्नरूप से] कहे जानेयोग्य और न कहे जानेयोग्य, आश्रय-अनाश्रय, चेतन-अचेतन एवं व्यावहारिक सत्य-असत्यरूप हो गया । यह जो कुछ है उसे ब्रह्मवेत्ता लोग ‘सत्य’ इस नाम से पुकारते हैं । उसके विषय में ही यह श्लोक है ॥ १ ॥

जिस प्रकार असत् (अविद्यमान) पदार्थ पुरुषार्थ से सम्बन्ध रखनेवाला नहीं होता उसी प्रकार वह भी असत्—असत् के समान ही पुरुषार्थ से सम्बन्ध नहीं रखनेवाला हो जाता है—वह कौन? जो ‘ब्रह्म असत्—अविद्यमान है’ ऐसा जानता है । ‘चेत्’ शब्द का अर्थ ‘यदि’ है । इसके विपरीत ‘जो तत्त्व सम्पूर्ण विकल्पों का आश्रय, समस्त प्रवृत्तियों का बीजरूप और सम्पूर्ण विशेषों से रहित भी है वही ब्रह्म है’ ऐसा यदि कोई जानता है [तो उसे ब्रह्मवेत्ता लोग सद्रूप समझते हैं इस प्रकार इसका आगे के वाक्य से सम्बन्ध है] ।

किन्तु ब्रह्म के अस्तित्वाभाव के विषय में शंका क्यों की जाती है? [इसपर] हमारा यह कथन है कि ब्रह्म व्यवहार से परे है । [इसी लिये] व्यवहार के विषयभूत पदार्थों में ही, जो कि केवल वाणी से ही उच्चारण किये जानेवाले हैं, अस्तित्व की भावना से भावित हुई बुद्धि उनसे विपरीत व्यवहारातीत पदार्थों में अस्तित्व का भी अनुभव नहीं करती; जैसे कि [जल लाना आदि] व्यवहार के विषयरूप से उपपन्न हुआ घट आदि पदार्थ ‘सत्’ और उससे विपरीत [वन्ध्यापुत्रादि] ‘असत्’ होता है—इस प्रकार प्रसिद्ध है । उसी प्रकार उसकी समानता के कारण यहाँ भी ब्रह्म के अविद्यमानत्व के विषय में शंका हो सकती है । इसीलिये कहा है—‘ब्रह्म है—ऐसा यदि कोई जानता है’ इत्यादि ।

किन्तु ‘वह (ब्रह्म) है’ ऐसा जाननेवाले पुरुष को क्या फल मिलता है? इस पर कहते हैं—ब्रह्मवेत्ता लोग इस प्रकार जाननेवाले इस पुरुष को सत्—विद्यमान अर्थात् ब्रह्मरूप से परमार्थ सत्स्वरूप को प्राप्त हुआ समझते हैं । तात्पर्य यह है कि इस कारण से ब्रह्म के अस्तित्व को जानने के कारण वह दूसरों के लिये ब्रह्म के समान जाननेयोग्य हो जाता है ।

अथवा जो पुरुष ‘ब्रह्म नहीं है’ ऐसा मानता है वह अश्रद्धालु होने के कारण, वर्णाश्रमादि व्यवस्थारूप सारे ही शुभमार्ग का, असत्त्व प्रतिपादन करता है, क्योंकि वह भी ब्रह्म की प्राप्ति के ही लिये है । अतः वह नास्तिक लोक में असत्—असाधु कहा जाता है । इसके विपरीत जो पुरुष ‘ब्रह्म है’ ऐसा जानता है वह ‘सत्’ है, क्योंकि वह उस ब्रह्म की प्राप्ति के हेतुभूत वर्णाश्रमादि के व्यवस्थारूप सन्मार्ग को श्रद्धापूर्वक ठीक-ठीक जानता है । इसीलिये साधु लोग उसे सत् यानी शुभमार्ग में स्थित जानते हैं । अतः ‘ब्रह्म है’ ऐसा ही जानना चाहिये—यह इस वाक्य का अर्थ है ।

उस विज्ञानमय का यही शारीर—विज्ञानमय शरीर में रहनेवाला आत्मा है । वह कौन? यह जो आनन्दमय है । उसके नास्तित्व में तो कुछ भी शंका नहीं है । किन्तु ब्रह्म सम्पूर्ण विशेषणों से रहित है, इसलिये उसके अस्तित्व के अभाव में शंका होना उचित ही है । इसके सिवा ब्रह्म की सबके साथ समानता होने के कारण भी [ऐसी शंका हो ही सकती है] । क्योंकि ऐसी बात है इसलिये अब—इसके अनन्तर श्रवण करनेवाले शिष्य के अनुप्रश्न हैं । आचार्य की इस उक्ति के पश्चात् किये जानेवाले ये प्रश्न—अनुप्रश्न हैं—

आकाशादि का कारण होने से ब्रह्म विद्वान् और अविद्वान् दोनों ही के लिये समान है । इससे अविद्वान् को भी ब्रह्म की प्राप्ति होती है—ऐसी आशंका की जाती है—क्या कोई अविद्वान् पुरुष भी इस शरीर को छोड़ने के अनन्तर इस लोक अर्थात् परमात्मा को प्राप्त हो जाता है? —‘कश्चन’ में ‘चन’ शब्द ‘अपि (भी)’ के अर्थ में है । ‘अथवा नहीं होता? ’ यह इसके साथ दूसरा प्रश्न भी समझना चाहिये, क्योंकि यहाँ ‘अनुप्रश्नाः’ ऐसा बहुवचन का प्रयोग किया गया है ।

अन्य दो प्रश्न विद्वान् के विषय में हैं—ब्रह्म सब का साधारण कारण है, तब भी यदि अविद्वान् उसे प्राप्त नहीं होता तो विद्वान् के भी ब्रह्म को प्राप्त न होने की आशंका होती है; अतः उसके उद्देश्य से पूछा जाता है—‘क्या विद्वान् भी’ आदि । [मूलमन्त्र में] आगे कहे जानेवाले ‘उ’ को आगे से खींचकर और पूर्वोक्त ‘उत’ शब्द से उसमें ‘त’ जोड़कर ‘आहो’ इस शब्द के पहले ‘उत’ शब्द जोड़कर ‘उताहो विद्वान्’ इत्यादि प्रकार से पूछता है—क्या कोई विद्वान् अर्थात् ब्रह्मवेत्ता भी इस शरीर को छोड़कर इस लोक को प्राप्त कर लेता है? यहाँ मूल में ‘समश्नुते उ’ ऐसा पद था । उसमें ‘अय्’ आदेश करके [‘लोपः शाकल्यस्य’ इस सूत्र के अनुसार] ‘य्’ का लोप करने पर ‘समश्नुत उ’ ऐसा प्रयोग सिद्ध होता है । फिर ‘त’ के अकार को प्लुत करने पर ‘समश्नुता ३ उ’ ऐसा पाठ हुआ है । विद्वान् इस लोक को प्राप्त होता है? अथवा अविद्वान् के समान विद्वान् भी उसे प्राप्त नहीं होता? यह एक अन्य प्रश्न है ।

अथवा विद्वान् और अविद्वान् से सम्बन्धित ये केवल दो ही प्रश्न हैं । इनकी सामर्थ्य से प्राप्त एक और प्रश्न की अपेक्षा से ही बहुवचन हो गया है । ‘ब्रह्म असत् है—यदि ऐसा जानता है’ तथा ‘ब्रह्म है—यदि ऐसा जानता है’ ऐसी श्रुति होने से ‘ब्रह्म है या नहीं’ ऐसा सन्देह होता है । अतः ‘ब्रह्म है या नहीं’ यह अर्थतः प्राप्त पहला अनुप्रश्न है और ब्रह्म पक्षपाती है नहीं, इसलिये ‘अविद्वान् उसे प्राप्त होता है या नहीं? ’ यह दूसरा अनुप्रश्न है तथा ब्रह्म समान है, इसलिये अविद्वान् के समान विद्वान् की भी ब्रह्मप्राप्ति के विषय में ‘विद्वान् उसे प्राप्त होता है या नहीं? ’ ऐसी शंका की जाती है । यह तीसरा अनुप्रश्न है ।

आगे का ग्रन्थ इन प्रश्नों का उत्तर देने के लिये ही आरम्भ किया जाता है । उसमें सबसे पहले ब्रह्म के अस्तित्व का ही वर्णन किया जाता है । ‘ब्रह्म सत्य, ज्ञान और अनन्त है’ ऐसा जो पहले कह चुके हैं सो वह ब्रह्म की सत्यता किस प्रकार है—यह बतलाना चाहिये । इस पर कहते हैं—उसकी सत्ता बतलाने से ही उसके सत्यत्व का भी प्रतिपादन हो जाता है । “सत् ही सत्य है” ऐसा अन्यत्र कहा भी है । अतः उसकी सत्ता बतलाने से ही उसका सत्यत्व भी बतला दिया जाता है । किन्तु इस ग्रन्थ का भी यही तात्पर्य है—यह कैसे जाना गया? इस पर कहते हैं—शब्दों के अनुगमन (अभिप्राय)-से; क्योंकि “वह सत्य है—ऐसा कहते हैं” “यदि यह आनन्दमय आकाश न होता” आदि आगे के वाक्य भी इसी अर्थ से युक्त हैं ।

इसमें यह आशंका की जाती है कि ब्रह्म असत् ही है । ऐसा क्यों है? क्योंकि जो वस्तु होती है वह विशेषरूप से उपलब्ध हुआ करती है; जैसे कि घट आदि और जो नहीं होती उसकी उपलब्धि भी नहीं होती; जैसे—शशशृंगादि । इसी प्रकार ब्रह्म की भी उपलब्धि नहीं होती । अतः विशेषरूप से ग्रहण न किया जाने के कारण वह है ही नहीं ।

ऐसी बात नहीं है, क्योंकि ब्रह्म आकाशादि का कारण है । ब्रह्म नहीं है—ऐसी बात नहीं है । क्यों नहीं है? क्योंकि ब्रह्म से उत्पन्न हुआ आकाशादि सम्पूर्ण कार्यवर्ग देखने में आता है । जिससे किसी वस्तु का जन्म होता है वह पदार्थ होता ही है—ऐसा लोक में देखा गया है; जैसे कि घट और अङ्कुरादि के कारण मृत्तिका एवं बीज आदि । अतः आकाशादि का कारण होने से ब्रह्म है ही ।

लोक में असत् से उत्पन्न हुआ कोई भी पदार्थ नहीं देखा जाता । यदि नाम-रूपादि कार्यवर्ग असत् से उत्पन्न हुआ होता तो वह निराधार होने के कारण ग्रहण ही नहीं किया जा सकता था । किन्तु वह ग्रहण किया ही जाता है; इसलिये ब्रह्म है ही । यदि यह कार्यवर्ग असत् से उत्पन्न हुआ होता तो ग्रहण किये जाने पर भी असदात्मक ही ग्रहण किया जाता । किन्तु ऐसी बात है नहीं । इसलिये ब्रह्म है ही । इसी सम्बन्ध में “असत् से सत् कैसे उत्पन्न हो सकता है” ऐसी एक अन्य श्रुति ने युक्तिपूर्वक असत् से सत् का जन्म होना असम्भव बतलाया है । इसलिये ब्रह्म सत् ही है—यही मत ठीक है ।

शंका—यदि ब्रह्म मृत्तिका और बीज आदि के समान [जगत् का उपादान] कारण है तो वह अचेतन होना चाहिये ।

समाधान—नहीं, क्योंकि वह कामना करनेवाला है । लोक में कोई भी कामना करनेवाला अचेतन नहीं हुआ करता । ब्रह्म सर्वज्ञ है—यह हम पहले कह चुके हैं । अतः उसका कामना करना भी युक्त ही है ।

शंका—कामना करनेवाला होने से तो वह हमारी-तुम्हारी तरह अनाप्त काम (अपूर्ण कामनावाला) सिद्ध होगा ।

समाधान—ऐसी बात नहीं है, क्योंकि वह स्वतन्त्र है । जिस प्रकार काम आदि दोष अन्य जीवों को विवश करके प्रवृत्त करते हैं उस प्रकार वे ब्रह्म के प्रवर्तक नहीं हैं । तो वे कैसे हैं? वे सत्य-ज्ञान-स्वरूप एवं स्वात्मभूत होने के कारण विशुद्ध हैं । उनके द्वारा ब्रह्म प्रवृत्त नहीं किया जाता; बल्कि जीवों के प्रारब्ध-कर्मों की अपेक्षा से वह ब्रह्म ही उनका प्रवर्तक है । अतः कामनाओं के करने में ब्रह्म की स्वतन्त्रता है । इसलिये ब्रह्म अनाप्तकाम नहीं है ।

किन्हीं अन्य साधनों की अपेक्षावाला न होने से भी कामनाओं के विषय में ब्रह्म की स्वतन्त्रता है । जिस प्रकार धर्मादि कारणों की अपेक्षा रखनेवाली अन्य जीवों की अनात्मभूत कामनाएँ अपने आत्मा से अतिरिक्त देह और इन्द्रियरूप अन्य साधनों की अपेक्षावाली होती हैं उस प्रकार ब्रह्म को निमित्त आदि की अपेक्षा नहीं होती । तो ब्रह्म की कामनाएँ कैसी होती हैं? वे स्वात्मा से अभिन्न होती हैं ।

उसी के विषय में श्रुति कहती है—उसने कामना की—उस आत्मा ने जिससे कि आकाश उत्पन्न हुआ है, कामना की । किस प्रकार कामना की? मैं बहुत—अधिक रूप में हो जाऊँ ।

अन्य पदार्थ में प्रवेश किये बिना ही एक वस्तु की बहुलता कैसे हो सकती है? इसपर कहते हैं—‘प्रजायेय’ अर्थात् उत्पन्न होऊँ । यह ब्रह्म का बहुत होना पुत्र की उत्पत्ति के समान अन्य वस्तुविषयक नहीं है । तो फिर कैसा है? अपने में अव्यक्तरूप से स्थित नाम-रूपों की अभिव्यक्ति के द्वारा ही [यह अनेकरूप होना है] । जिस समय आत्मा में स्थित अव्यक्त नाम और रूपों को व्यक्त किया जाता है उस समय वे अपने स्वरूप का त्याग किये बिना ही समस्त अवस्थाओं में ब्रह्म से अभिन्न देश और काल में ही व्यक्त किये जाते हैं । यह नाम-रूप का व्यक्त करना ही ब्रह्म का बहुत होना है । इसके सिवा और किसी प्रकार निरवयव ब्रह्म का बहुत अथवा अल्प होना सम्भव नहीं है, जिस प्रकार कि आकाश का अल्पत्व और बहुत्व भी अन्य वस्तु के ही अधीन है [उसी प्रकार ब्रह्म का भी है] । अतः उन (नाम-रूपों) के द्वारा ही ब्रह्म बहुत हो जाता है ।

आत्मा से भिन्न अनात्मभूत तथा उससे भिन्न देश-काल में रहनेवाली कोई भी सूक्ष्म, व्यवहित (ओटवाली), दूरस्थ, अथवा भूत या भविष्यकालीन वस्तु नहीं है । अतः सम्पूर्ण अवस्थाओं से सम्बन्धित नाम और रूप ब्रह्म से ही आत्मवान् हैं, किन्तु ब्रह्म तद्रूप नहीं है ।

ब्रह्म का निषेध करनेपर वे रह ही नहीं सकते, इसीसे वे तद्रूप कहे जाते हैं । उन उपाधियों से ही ब्रह्म ज्ञाता, ज्ञेय और ज्ञान—इन शब्दों का तथा इनके अर्थ आदि सब प्रकार के व्यवहार का पात्र बनता है ।

उस आत्मा ने ऐसी कामनावाला होकर तप किया । ‘तप’ शब्द से यहाँ ज्ञान कहा जाता है, जैसा कि “जिसका ज्ञानरूप तप है” इस अन्य श्रुति से सिद्ध होता है । आप्तकाम होने के कारण आत्मा के लिये अन्य तप तो असम्भव ही है । ‘उसने तप किया’ इसका तात्पर्य यह है कि आत्मा ने रचे जानेवाले जगत् की रचना आदि के विषय में आलोचना की ।

इस प्रकार आलोचना अर्थात् तप करके उसने प्राणियों के कर्मादि निमित्तों के अनुरूप इस सम्पूर्ण जगत् को रचा, जो देश, काल, नाम और रूप से यथानुभव सारी अवस्थाओं में स्थित सभी प्राणियोंद्वारा अनुभव किया जाता है । यह जो कुछ है अर्थात् सामान्यरूप से यह जो कुछ जगत् है इसे रचकर उसने क्या किया, सो बतलाते हैं—वह उस रचे हुए जगत् में ही अनुप्रविष्ट हो गया ।

अब यहाँ यह विचारना है कि उसने किस प्रकार अनुप्रवेश किया? जो स्रष्टा था, क्या उसने स्वस्वरूप से ही अनुप्रवेश किया अथवा किसी और रूप से? इनमें कौन-सा पक्ष समीचीन है? श्रुति में [‘सृष्ट्वा’ इस क्रिया में] ‘क्त्वा’ प्रत्यय होने से तो यही ठीक जान पड़ता है कि जो स्रष्टा था उसी ने पीछे प्रवेश भी किया ।

पूर्व०—यदि ब्रह्म मृत्तिका के समान जगत् का कारण है तो उसका कार्य तद्रूप होने के कारण उसमें उसका प्रवेश करना सम्भव नहीं है । क्योंकि कारण ही कार्यरूप से परिणत हुआ करता है, अतः किसी अन्य पदार्थ के समान पहले बिना प्रवेश किये कार्य की उत्पत्ति के अनन्तर उसमें कारण का पुनः प्रवेश करना सर्वथा असम्भव है? घटरूप में परिणत होने के सिवा मृत्तिका का घट में और कोई प्रवेश नहीं हुआ करता । हाँ, जिस प्रकार घट में चूर्ण (बालू)-रूप से मृत्तिका का अनुप्रवेश होता है उसी प्रकार किसी अन्य रूप से आत्मा का नाम-रूप कार्य में भी अनुप्रवेश हो सकता है; जैसा कि “इस जीवरूप से अनुप्रवेश करके” इस अन्य श्रुति से प्रमाणित होता है—यदि ऐसा मानें तो?

सिद्धान्ती—ऐसा मानना उचित नहीं है, क्योंकि ब्रह्म तो एक ही है । मृत्तिकारूप कारण तो अनेक और सावयव होने के कारण उसका घट में चूर्णरूप से अनुप्रवेश करना भी सम्भव है, क्योंकि मृत्तिका के चूर्ण का उस देश में प्रवेश नहीं है; किन्तु आत्मा तो एक है, अतः उसके निरवयव और उससे अप्रविष्ट देश का अभाव होने के कारण उसका प्रवेश करना सम्भव नहीं है । तो फिर उसका प्रवेश कैसे होना चाहिये? तथा उसका प्रवेश होना उचित ही है, क्योंकि ‘उसी में अनुप्रविष्ट हो गया’ ऐसी श्रुति है ।

पूर्व०—तब तो ब्रह्म सावयव ही होना चाहिये । उस अवस्था में, सावयव होने के कारण मुख में हाथ का प्रवेश होने के समान उसका नाम-रूप कार्य में जीवरूप से प्रवेश होना ठीक ही होगा— यदि ऐसा कहें तो?

सिद्धान्ती—नहीं; क्योंकि उससे शून्य कोई देश नहीं है । कार्यरूप में परिणत हुए ब्रह्म का नाम-रूप कार्य के देश से अतिरिक्त और कोई अपने से शून्य देश नहीं है, जिसमें उसका जीवरूप से प्रवेश करना सम्भव हो । और यदि यह मानो कि जीवात्मा ने कारण में ही प्रवेश किया तब तो वह अपने जीवत्व को ही त्याग देगा, जिस प्रकार कि घड़ा मृत्तिका में प्रवेश करने पर अपना घटत्व त्याग देता है तथा ‘उसी में अनुप्रविष्ट हो गया’ इस श्रुति से भी कारण में अनुप्रवेश करना सम्भव नहीं है ।

पूर्व०—किसी अन्य कार्य में ही प्रवेश किया—यदि ऐसा मानें तो? अर्थात् ‘तदेवानुप्राविशत्’ इस श्रुति के अनुसार जीवात्मारूप कार्य नाम-रूप में परिणत हुए किसी अन्य कार्य को ही प्राप्त हो जाता है—यदि ऐसी बात हो तो?

सिद्धान्ती—नहीं, क्योंकि इससे विरोध उपस्थित होता है । एक घड़ा किसी दूसरे घड़े में लीन नहीं हो जाता । इसके सिवा [ऐसा मानने से] व्यतिरेक श्रुति से विरोध भी होता है । [यदि ऐसा मानेंगे तो] जीव नाम-रूपात्मक कार्य से व्यतिरिक्त (भिन्न) है—ऐसा अनुवाद करनेवाली श्रुतियों से विरोध हो जायगा और ऐसा होने पर उसका मोक्ष होना भी असम्भव होगा । क्योंकि जो जिससे छूटनेवाला होता है वह उसी को प्राप्त नहीं हुआ करता; जंजीर से बँधे हुए चोर आदि का जंजीररूप हो जाना सम्भव नहीं है ।

पूर्व०—वही बाह्य और आन्तर के भेद से परिणत हो गया अर्थात् वह कारणरूप ब्रह्म ही शरीरादि आधाररूप से बाह्य और आधेय जीवरूप से उसका अन्तर्वर्ती हो गया—यदि ऐसा मानें तो?

सिद्धान्ती—नहीं, क्योंकि प्रवेश बाहर रहनेवाले पदार्थ का ही हो सकता है । जो जिसके भीतर स्थित है वह उसमें प्रविष्ट हुआ नहीं कहा जाता । अनुप्रवेश तो बाहर रहनेवाले पदार्थ का ही हो सकता है, क्योंकि ‘प्रवेश’ शब्द का अर्थ ऐसा ही देखा गया है; जैसे कि ‘घर बनाकर उसमें प्रवेश किया’ इस वाक्य में ।

यदि कहो कि जल में सूर्य के प्रतिविम्ब आदि के समान उसका प्रवेश हो सकता है, तो ऐसा कहना भी ठीक नहीं है, क्योंकि ब्रह्म अपरिच्छिन्न और अमूर्त है । परिच्छिन्न और मूर्तरूप अन्य पदार्थों का ही स्वच्छस्वभाव जल आदि अन्य पदार्थों में सूर्यकादिरूप प्रतिविम्ब पड़ा करता है; किन्तु आत्मा का प्रतिविम्ब नहीं पड़ सकता, क्योंकि वह अमूर्त है तथा आकाशादि का कारणरूप आत्मा व्यापक भी है । उससे दूर देश में स्थित प्रतिविम्ब की आधारभूत अन्य वस्तु का अभाव होने से भी उसका प्रतिविम्ब के समान प्रवेश होना सम्भव नहीं है ।

पूर्व०—तब तो आत्मा का प्रवेश होता ही नहीं—इसके सिवा ‘तदेवानुप्राविशत्’ इस श्रुति की और कोई गति दिखायी नहीं देती । हमारे (मीमांसकों के) सिद्धान्तानुसार इन्द्रियातीत विषयों का ज्ञान होने में श्रुति ही कारण है । किन्तु इस वाक्य से बहुत यत्न करने पर भी किसी प्रकार का ज्ञान उत्पन्न नहीं होता । अतः खेद है कि ‘तत्सृष्ट्वा तदेवानुप्राविशत्’ यह वाक्य अर्थशून्य होने के कारण त्यागने ही योग्य है!

सिद्धान्ती—ऐसी बात नहीं है, क्योंकि इस वाक्य का अर्थ अन्य ही है । इस प्रकार अप्रासङ्गिक चर्चा क्यों करते हो? इस प्रसङ्ग में इस वाक्य को और ही अर्थ कहना अभीष्ट है । उसी को स्मरण करना चाहिये । “ब्रह्मवेत्ता परमात्मा को प्राप्त कर लेता है” “ब्रह्म सत्य, ज्ञान और अनन्त है” “जो उसे बुद्धिरूप गुहा में छिपा हुआ जानता है” इत्यादि वाक्योंद्वारा जिसका निरूपण किया गया है उस ब्रह्म का ही विज्ञान यहाँ बतलाना अभीष्ट है और उसी का यहाँ प्रसङ्ग भी है । ब्रह्म के स्वरूप का ज्ञान प्राप्त करने के लिये ही आकाश से लेकर अन्नमयकोशपर्यन्त सम्पूर्ण कार्यवर्ग दिखलाया गया है तथा ब्रह्मानुभव का प्रसङ्ग भी चल ही रहा है । उसमें अन्नमय आत्मा से भिन्न दूसरा अन्तरात्मा प्राणमय है, उसका अन्तर्वर्ती मनोमय और फिर विज्ञानमय है । इस प्रकार आत्मा का विज्ञानगुहा में प्रवेश करा दिया गया है, और वहाँ आनन्दमय ऐसे विशिष्ट आत्मा को प्रदर्शित किया गया है ।

इसके आगे आनन्दमय—इस लिङ्ग के ज्ञानद्वारा आनन्द के उत्कर्ष का अवसानभूत आत्मा जो सम्पूर्ण विकल्प का आश्रयभूत एवं निर्विकल्प ब्रह्म है तथा [आनन्दमय कोश की] पुच्छ—प्रतिष्ठा है, वह इस गुहा में ही अनुभव किये जाने योग्य है— इसलिये उसके प्रवेश की कल्पना की गयी है । निर्विशेष होने के कारण ब्रह्म [बुद्धिरूप गुहा के सिवा] और कहीं उपलब्ध नहीं होता, क्योंकि विशेष का सम्बन्ध ही उपलब्धि में हेतु देखा गया है, जिस प्रकार कि राहु की उपलब्धि में चन्द्रमा अथवा सूर्यरूप विशेष का सम्बन्ध । इस प्रकार अन्तःकरणरूप गुहा और आत्मा का सम्बन्ध ही ब्रह्म की उपलब्धि का हेतु है, क्योंकि अन्तःकरण उसका समीपवर्ती और प्रकाशस्वरूप है ।

जिस प्रकार कि प्रकाशयुक्त घटादि की उपलब्धि होती है उसी प्रकार बुद्धि के प्रत्ययरूप प्रकाश से युक्त आत्मा का अनुभव होता है । अतः उपलब्धि की हेतुभूत गुहा में वह निहित है—इसी बात का यह प्रसङ्ग है । उसकी वृत्ति-(व्याख्या)-के रूप में ही श्रुतिद्वारा ‘उसे रचकर वह पीछे से उसी में प्रवेश कर गया’ ऐसा कहा गया है ।

इस प्रकार इस कार्यवर्ग को रचकर इसमें अनुप्रविष्ट-सा हुआ आकाशादि का कारणरूप वह ब्रह्म ही बुद्धिरूप गुहा में द्रष्टा, श्रोता, मन्ता और विज्ञाता—ऐसा सविशेषरूप-सा जान पड़ता है । यही उसका प्रवेश करना है । अतः वह ब्रह्म कारण है; इसलिये उसका अस्तित्व होने के कारण उसे ‘है’ इस प्रकार ही ग्रहण करना चाहिये ।

उसने कार्य में अनुप्रवेश करके फिर क्या किया? वह सत्—मूर्त और असत्—अमूर्त हो गया । जिनके नाम और रूप की अभिव्यक्ति नहीं हुई है, वे मूर्त और अमूर्त तो आत्मा में ही रहते हैं । उन ‘मूर्त’ एवं ‘अमूर्त’ शब्दवाच्य पदार्थों को उनका अन्तर्वर्ती आत्मा केवल अभिव्यक्त कर देता है । उनके देश और काल आत्मा से अभिन्न हैं—इसीलिये ‘आत्मा ही मूर्त और अमूर्त हुआ’ ऐसा कहा जाता है ।

तथा वही निरुक्त और अनिरुक्त भी हुआ । निरुक्त उसे कहते हैं जिसे सजातीय और विजातीय पदार्थों से अलग करके देश-कालविशिष्टरूप से ‘वह यह है’ ऐसा कहा जाय । इससे विपरीत लक्षणोंवाले को ‘अनिरुक्त’ कहते हैं । निरुक्त और अनिरुक्त भी मूर्त और अमूर्त के ही विशेषण हैं । जिस प्रकार ‘सत्’ और ‘त्यत्’ क्रमशः ‘प्रत्यक्ष’ और ‘परोक्ष’ को कहते हैं उसी प्रकार ‘निलयन’ और ‘अनिलयन’ भी समझने चाहिये । निलयन—नीड अर्थात् आश्रय मूर्त का ही धर्म है और उससे विपरीत अनिलयन अमूर्त का ही धर्म है ।

त्यत्, अनिरुक्त और अनिलयन—ये अमूर्त के धर्म होने पर भी व्याकृत (व्यक्त)-से ही सम्बन्ध रखनेवाले हैं, क्योंकि इनकी सत्ता सृष्टि के अनन्तर ही सुनी गयी है । त्यत्—यह प्राणादि अनिरुक्त का नाम है; वही अनिलयन भी है । अतः ये अमूर्त के विशेषण व्याकृतविषयक ही हैं ।

विज्ञान यानी चेतन, अविज्ञान—उससे रहित अचेतन पाषाणादि और सत्य—व्यवहारसम्बन्धी सत्य, क्योंकि यहाँ व्यवहार का ही प्रसङ्ग है, परमार्थ सत्य नहीं; परमार्थ सत्य तो एकमात्र ब्रह्म ही है; यहाँ तो केवल व्यवहारविषयक आपेक्षिक सत्य से ही तात्पर्य है, जैसे कि मृगतृष्णा आदि असत्य की अपेक्षा से जल आदि को सत्य कहा जाता है तथा अनृत—उस (व्यावहारिक सत्य)—से विपरीत । सो फिर क्या? ये सब वह सत्य—परमार्थ सत्य ही हो गया । वह परमार्थ सत्य है क्या? वह ब्रह्म है, क्योंकि ‘ब्रह्म सत्य, ज्ञान एवं अनन्त है’ इस प्रकार उसी का प्रकरण है ।

क्योंकि सत्-त्यत् आदि जो कुछ मूर्त-अमूर्त धर्मजात है वह सामान्यरूप से सारा ही विकार एकमात्र ‘सत्’ शब्दवाच्य ब्रह्म ही हुआ है—क्योंकि उससे भिन्न नाम-रूप विकार का सर्वथा अभाव है— इसलिये ब्रह्मवादीलोग उस ब्रह्म को ‘सत्य’ ऐसा कहकर पुकारते हैं ।

‘ब्रह्म है या नहीं’ इस अनुप्रश्न का यहाँ प्रसंग था । उसके उत्तर में यह कहा गया था—‘आत्मा ने कामना की कि मैं बहुत हो जाऊँ’ । वह अपनी कामना के अनुसार सत्, त्यत् आदि लक्षणोंवाले आकाशादि कार्यवर्ग को रचकर उसमें अनुप्रविष्ट हो द्रष्टा, श्रोता, मन्ता और विज्ञातारूप से बहुत हो गया । अतः आकाशादि के कारण, कार्यवर्ग में स्थित, परमाकाश के भीतर बुद्धिरूप गुहा में छिपे हुए और उसके कर्त्ता-भोक्तादिरूप जो प्रत्ययावभास हैं उनके द्वारा विशेषरूप से उपलब्ध होनेवाले उस ब्रह्म को ही ‘वह है’ इस प्रकार जाने—ऐसा कहा गया ।

उस इस ब्राह्मणोक्त अर्थ में ही यह श्लोक यानी मन्त्र है । जिस प्रकार पूर्वोक्त पाँच पर्यायों में अन्नमय आदि कोशों के प्रकाशक श्लोक थे उसी प्रकार सबकी अपेक्षा आन्तरतम आत्मा के अस्तित्व को उसके कार्यद्वारा प्रकाशित करनेवाला भी यह मन्त्र है ॥ १ ॥

संस्कृत भाष्य पढ़ें

असन्नेवासत्सम एव यथासन्न पुरुषार्थसम्बसदसद्वादिनोर्भेदः न्ध्येवं स भवति अपुरुषार्थसम्बन्धी । कोऽसौ? योऽसदविद्यमानं ब्रह्मेति वेद विजानाति चेद्यदि । तद्विपर्ययेण यत्सर्वविकल्पास्पदं सर्वप्रवृत्तिबीजं सर्वविशेषप्रत्यस्तमितमप्यस्ति तद्ब्रह्मेति वेद चेत् ।

कुतः पुनराशङ्का तन्नास्तित्वे? व्यवहारातीतत्वं ब्रह्मण इति ब्रूमः । व्यवहारविषये हि वाचारम्भणमात्रेऽस्तित्वभाविता बुद्धिस्तद्विपरीते व्यवहारातीते नास्तित्वमपि प्रतिपद्यते । यथा घटादिर्व्यवहारविषयतयोपपन्नः संस्तद्विपरीतोऽसन्निति प्रसिद्धम् । एवं तत्सामान्यादिहापि स्याद्ब्रह्मणो नास्तित्वप्रत्याशङ्का । तस्मादुच्यते—

अस्ति ब्रह्मेति चेद्वेदेति ।

किं पुनः स्यात्तदस्तीति विजानतस्तदाह—सन्तं विद्यमानब्रह्मस्वरूपेण परमार्थसदात्मापन्नमेनमेवंविदं विदुर्ब्रह्मविदस्ततः तस्मादस्तित्ववेदनात्सोऽन्येषां ब्रह्मवद्विज्ञेयो भवतीत्यर्थः ।

अथवा यो नास्ति ब्रह्मेति मन्यते स सर्वस्यैव सन्मार्गस्य वर्णाश्रमादिव्यवस्थालक्षणस्याश्रद्दधानतया नास्तित्वं प्रतिपद्यतेऽब्रह्मप्रतिपत्त्यर्थत्वात्तस्य । अतो नास्तिकः सोऽसन्नसाधुरुच्यते लोके । तद्विपरीतः सन्योऽस्ति ब्रह्मेति चेद्वेद स तद्ब्रह्मप्रतिपत्तिहेतुं सन्मार्गं वर्णाश्रमादिव्यवस्थालक्षणं श्रद्दधानतया यथावत्प्रतिपद्यते यस्मात्ततस्तस्मात् सन्तं साधुमार्गस्थमेनं विदुः साधवः तस्मादस्तीत्येव ब्रह्म प्रतिपत्तव्यमिति वाक्यार्थः ।

तस्य पूर्वस्य विज्ञानमयस्यैष एव शरीरे विज्ञानमये भवः शारीर आत्मा । कोऽसौ? य एष आनन्दमयः । तं प्रति नास्त्याशङ्का नास्तित्वे । अपोढसर्वविशेषत्वात्तु ब्रह्मणो नास्तित्वं प्रत्याशङ्का युक्ता । सर्वसामान्याच्च ब्रह्मणः । यस्मादेवमतः तस्मात्, अथानन्तरं श्रोतुः शिष्यस्यानुप्रश्ना आचार्योक्तिमनु एते प्रश्ना अनुप्रश्नाः ।

सामान्यं हि ब्रह्माकाशादिविद्वदविद्वद्भेदेन कारणत्वाद्विदुषोब्रह्मप्राप्तावाक्षेपः ऽविदुषश्च । तस्मादविदुषोऽपि ब्रह्मप्राप्तिराशङ्क्यते—उत अपि अविद्वानमुं लोकं परमात्मानमितः प्रेत्य कश्चन, चनशब्दोऽप्यर्थे, अविद्वानपि गच्छति प्राप्नोति किं वा न गच्छतीति द्वितीयोऽपि प्रश्नो द्रष्टव्योऽनुप्रश्ना इति बहुवचनात् ।

विद्वांसं प्रत्यन्यौ प्रश्नौ । यद्यविद्वान्सामान्यं कारणमपि ब्रह्म न गच्छति ततो विदुषोऽपि ब्रह्मागमनमाशङ्क्यते । अतस्तं प्रति प्रश्न आहो विद्वानिति । उकारं च वक्ष्यमाणमधस्तादपकृष्य तकारं च पूर्वस्मादुतशब्दाद्व्यासज्याहो इत्येतस्मात्पूर्वमुतशब्दं संयोज्य पृच्छति—उताहो विद्वानिति । विद्वान्ब्रह्मविदपि कश्चिदितः प्रेत्यामुं लोकं समश्नुते प्राप्नोति समश्नुते उ इत्येवंस्थिते, अयादेशे यलोपे च कृतेऽकारस्य प्लुतिः समश्नुता ३ उ इति । विद्वान्समश्नुतेऽमुं लोकम् । किं वा यथाविद्वानेवं विद्वानपि न समश्नुत इत्यपरः प्रश्नः ।

द्वावेव वा प्रश्नौ विद्वदविद्वद्विषयौ । बहुवचनं तु सामर्थ्यप्राप्तप्रश्नान्तरापेक्षया घटते । ‘असद्ब्रह्मेति वेद चेत् । अस्ति ब्रह्मेति चेद्वेद’ इति श्रवणादस्ति नास्तीति संशयस्ततोऽर्थप्राप्तः किमस्ति नास्तीति प्रथमोऽनुप्रश्नः । ब्रह्मणोऽपक्षपातित्वादविद्वान् गच्छति न गच्छतीति द्वितीयः । ब्रह्मणः समत्वेऽप्यविदुष इव विदुषोऽप्यगमनमाशङ्क्यते किं विद्वान्समश्नुते न समश्नुत इति तृतीयोऽनुप्रश्नः ।

एतेषां प्रतिवचनार्थमुत्तरग्रन्थ ब्रह्मणःसत्स्व- आरभ्यते । तत्रास्तिरूपत्वस्थापनम् त्वमेव तावदुच्यते । यच्चोक्तं ‘सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म’ इति, तच्च कथं सत्यत्वमित्येतद्वक्तव्यमितीदमुच्यते । सत्त्वोक्त्यैव सत्यत्वमुच्यते । उक्तं हि “सदेव सत्यम्” इति । तस्मात्सत्त्वोक्त्यैव सत्यत्वमुच्यते । कथमेवमर्थतावगम्यतेऽस्य ग्रन्थस्य शब्दानुगमात् । अनेनैव ह्यर्थेनान्वितान्युत्तराणि वाक्यानि “तत्सत्यमित्याचक्षते” (तै० उ० २ । ६ । १) “यदेष आकाश आनन्दो न स्यात्” (तै० उ० २ । ७ । १) इत्यादीनि ।

तत्रासदेव ब्रह्मेत्याशङ्क्यते । कस्मात्? यदस्ति तद्विशेषतो गृह्यते यथा घटादि । यन्नास्ति तन्नोपलभ्यते यथा शशविषाणादि । तथा नोपलभ्यते ब्रह्म । तस्माद्विशेषतोऽग्रहणान्नास्तीति ।

तन्न; आकाशादिकारणत्वाद्ब्रह्मणः । न नास्ति ब्रह्म । कस्मादाकाशादि हि सर्वं कार्यं ब्रह्मणो जातं गृह्यते । यस्माच्च जायते किंचित्तदस्तीति दृष्टं लोके; यथा घटाङ्कुरादिकारणं मृद्बीजादि । तस्मादाकाशादिकारणत्वादस्ति ब्रह्म ।

न चासतो जातं किंचिद्गृह्यते लोके कार्यम् । असतश्चेन्नामरूपादि कार्यं निरात्मकत्वान्नोपलभ्येत । उपलभ्यते तु; तस्मादस्ति ब्रह्म । असतश्चेत्कार्यं गृह्यमाणमप्यसदन्वितमेव तत् स्यात् । न चैवम्; तस्मादस्ति ब्रह्म तत्र । “कथमसतःसज्जायेत” (छा० उ० ६ । २ । २) इति श्रुत्यन्तरमसतः सज्जन्मासम्भवमन्वाचष्टे न्यायतः । तस्मात्सदेव ब्रह्मेति युक्तम् ।

तद्यदि मृद्बीजादिवत्कारणं स्यादचेतनं तर्हि?

न, कामयितृत्वात् । न हि ब्रह्मणश्चित्स्व- कामयित्रचेतनमस्ति रूपत्वविवेचनम् लोके । सर्वज्ञं हि ब्रह्मेत्यवोचाम । अतः कामयितृत्वोपपत्तिः ।

कामयितृत्वादस्मदादिवदनाप्तकाममिति चेत्?

न, स्वातन्त्र्यात् । यथान्यान् परवशीकृत्य कामादिदोषाः प्रवर्तयन्ति न तथा ब्रह्मणः प्रवर्तकाः कामाः । कथं तर्हि सत्यज्ञानलक्षणाः स्वात्मभूतत्वाद्विशुद्धा न तैर्ब्रह्म प्रवर्त्यते । तेषां तु तत्प्रवर्तकं ब्रह्म प्राणिकर्मापेक्षया । तस्मात्स्वातन्त्र्यं कामेषु ब्रह्मणः । अतो नानाप्तकामं ब्रह्म ।

साधनान्तरानपेक्षत्वाच्च । किं च यथान्येषामनात्मभूता धर्मादिनिमित्तापेक्षाः कामाः स्वात्मव्यतिरिक्तकार्यकरणसाधनान्तरापेक्षाश्च न तथा ब्रह्मणो निमित्ताद्यपेक्षत्वम् । किं तर्हि स्वात्मनोऽनन्याः ।

तदेतदाह सोऽकामयत स ब्रह्मणो आत्मा यस्मादाकाशः बहुभवनसङ्कल्पः संभूतोऽकामयत कामितवान् । कथम्? बहु स्यां बहु प्रभूतं स्यां भवेयम् । कथमेकस्यार्थान्तराननुप्रवेशे बहुत्वं स्यादित्युच्यते । प्रजायेयोत्पद्येय ।

न हि पुत्रोत्पत्त्येवार्थान्तरविषयं बहुभवनम्, कथं तर्हि? आत्मस्थानाभिव्यक्तनामरूपाभिव्यक्त्या ।

यदात्मस्थे अनभिव्यक्ते नामरूपे व्याक्रियेते तदा नामरूपे आत्मस्वरूपापरित्यागेनैव ब्रह्मणाप्रविभक्तदेशकाले सर्वावस्थासु व्याक्रियेते तदा तन्नामरूपव्याकरणं ब्रह्मणो बहुभवनम् । नान्यथा निरवयवस्य ब्रह्मणो बहुत्वापत्तिरुपपद्यतेऽल्पत्वं वा । यथाकाशस्याल्पत्वं बहुत्वं च वस्त्वन्तरकृतमेव । अतस्तद्वारेणैवात्मा बहु भवति ।

न ह्यात्मनोऽन्यदनात्मभूतं तत्प्रविभक्तदेशकालं सूक्ष्मं व्यवहितं विप्रकृष्टं भूतं भवद्भविष्यद्वा वस्तु विद्यते । अतो नामरूपे सर्वावस्थे ब्रह्मणैवात्मवती, न ब्रह्म तदात्मकम् । ते तत्प्रत्याख्याने न स्त एवेति तदात्मके उच्येते । ताभ्यां चोपाधिभ्यां ज्ञातृज्ञेयज्ञानशब्दार्थादिसर्वसंव्यवहारभाग्ब्रह्म ।

स आत्मैवंकामः संस्तपोऽतप्यत । तप इति ज्ञानमुच्यते । “यस्य ज्ञानमयं तपः” (मु० उ० १ । १ । ९) इति श्रुत्यन्तरात् । आप्तकामत्वाच्चेतरस्यासंभव एव तपसः । तत्तपोऽतप्यत तप्तवान् । सृज्यमानजगद्रचनादिविषयामालोचनामकरोदात्मेत्यर्थः ।

स एवमालोच्य तपस्तप्त्वा प्राणिकर्मादिनिमित्तानुरूपमिदं सर्वं जगद्देशतः कालतो नाम्ना रूपेण च यथानुभवं सर्वैः प्राणिभिः सर्वावस्थैरनुभूयमानमसृजत सृष्टवान् । यदिदं किं च यत्किं चेदमविशिष्टम् । तदिदं जगत्सृष्ट्वा किमकरोदित्युच्यते—तदेव सृष्टं जगदनुप्राविशदिति ।

तत्रैतच्चिन्त्यं कथमनुप्राविशतस्य जगदनु- दिति । किं यः प्रवेशः स्रष्टा स तेनैवात्मनानु- प्राविशदुतान्येनेति, किं तावद्युक्तम्? क्त्वाप्रत्ययश्रवणाद्यः स्रष्टा स एवानुप्राविशदिति ।

ननु न युक्तं मृद्वच्चेत्कारणं ब्रह्म तदात्मकत्वात्कार्यस्य । कारणमेव हि कार्यात्मना परिणतमित्यतोऽप्रविष्ट इव कार्योत्पत्तेरूर्ध्वं पृथक्कारणस्य पुनः प्रवेशोऽनुपपन्नः । न हि घटपरिणामव्यतिरेकेण मृदो घटे प्रवेशोऽस्ति । यथा घटे चूर्णात्मना मृदोऽनुप्रवेश एवमन्येनात्मना नामरूपकार्येऽनुप्रवेश आत्मन इति चेच्छ्रुत्यन्तराच्च “अनेन जीवेनात्मनानुप्रविश्य” (छा० उ० ६ । ३ । २) इति ।

नैवं युक्तमेकत्वाद्ब्रह्मणः । मृदात्मनस्त्वनेकत्वात्सावयवत्वाच्च युक्तो घटे मृदश्चूर्णात्मनानुप्रवेशः । मृदश्चूर्णस्याप्रविष्टदेशवत्त्वाच्च । न त्वात्मन एकत्वे सति निरवयवत्वादप्रविष्टदेशाभावाच्च प्रवेश उपपद्यते । कथं तर्हि प्रवेशः स्यात् । युक्तश्च प्रवेशः श्रुतत्वात्तदेवानुप्राविशदिति ।

सावयवमेवास्तु तर्हि । सावयवत्वान्मुखे हस्तप्रवेशवन्नामरूपकार्ये जीवात्मनानुप्रवेशो युक्त एवेति चेत्?

नाशून्यदेशत्वात् । न हि कार्यात्मना परिणतस्य नामरूपकार्यदेशव्यतिरेकेणात्मशून्यः प्रदेशोऽस्ति यं प्रविशेज्जीवात्मना । कारणमेव चेत्प्रविशेज्जीवात्मत्वं जह्याद्यथा घटो मृत्प्रवेशे घटत्वं जहाति । तदेवानुप्राविशदिति च श्रुतेर्न कारणानुप्रवेशो युक्तः ।

कार्यान्तरमेव स्यादिति चेत्? तदेवानुप्राविशदिति जीवात्मरूपं कार्यं नामरूपपरिणतं कार्यान्तरमेवापद्यत इति चेत्?

न; विरोधात् । न हि घटो घटान्तरमापद्यते । व्यतिरेकश्रुतिविरोधाच्च । जीवस्य नामरूपकार्यव्यतिरेकानुवादिन्यः श्रुतयो विरुध्येरन् । तदापत्तौ मोक्षासंभवाच्च । न हि यतो मुच्यमानस्तदेवापद्यते । न हि शृङ्खलापत्तिर्बद्धस्य तस्करादेः ।

बाह्यान्तर्भेदेन परिणतमिति चेत्तदेव कारणं ब्रह्म शरीराद्याधारत्वेन तदन्तर्जीवात्मनाधेयत्वेन च परिणतमिति चेत्?

न; बहिःष्ठस्य प्रवेशोपपत्तेः । न हि यो यस्यान्तःस्थः स एव तत्प्रविष्ट उच्यते । बहिःष्ठस्यानुप्रवेशः स्यात्प्रवेशशब्दार्थस्यैवं दृष्टत्वात् । यथा गृहं कृत्वा प्राविशदिति ।

जलसूर्यकादिप्रतिविम्बवत्प्रवेशः स्यादिति चेन्न; अपरिच्छिन्नत्वादमूर्तत्वाच्च । परिच्छिन्नस्य मूर्तस्यान्यस्यान्यत्र प्रसादस्वभावके जलादौ सूर्यकादिप्रतिविम्बोदयः स्यात् । न त्वात्मनः, अमूर्तत्वादाकाशादिकारणस्यात्मनो व्यापकत्वात् । तद्विप्रकृष्टदेशप्रतिविम्बाधारवस्त्वन्तराभावाच्च प्रतिविम्बवत्प्रवेशो न युक्तः ।

एवं तर्हि नैवास्ति प्रवेशो न च गत्यन्तरमुपलभामहे ‘तदेवानुप्राविशत्’ इति श्रुतेः । श्रुतिश्च नोऽतीन्द्रियविषये विज्ञानोत्पत्तौ निमित्तम् । न चास्माद्वाक्याद्यत्नवतामपि विज्ञानमुत्पद्यते । हन्त तर्ह्यनर्थकत्वादपोह्यमेतद्वाक्यम् ‘तत्सृष्ट्वा तदेवानुप्राविशत्’ इति ।

न, अन्यार्थत्वात् । किमर्थमस्थाने चर्चा । प्रकृतो ह्यन्यो विवक्षितोऽस्य वाक्यस्यार्थोऽस्ति स स्मर्तव्यः । “ब्रह्मविदाप्नोति परम्” (तै० उ० २ । १ । १) “सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म” (तै० उ० २ । १ । १) “यो वेद निहितं गुहायाम्” (तै० उ० २ । १ । १) इति तद्विज्ञानं च विवक्षितं प्रकृतं च तत् । ब्रह्मस्वरूपानुगमाय चाकाशाद्यन्नमयान्तं कार्यं प्रदर्शितं ब्रह्मानुगमश्चारब्धः । तत्रान्नमयादात्मनोऽन्योऽन्तर आत्मा प्राणमयस्तदन्तर्मनोमयो विज्ञानमय इति विज्ञानगुहायां प्रवेशितस्तत्र चानन्दमयो विशिष्ट आत्मा प्रदर्शितः ।

अतः परमानन्दमयलिङ्गाधिगमद्वारेणानन्दविवृद्ध्यवसान आत्मा ब्रह्म पुच्छं प्रतिष्ठा सर्वविकल्पास्पदो निर्विकल्पोऽस्यामेव गुहायामधिगन्तव्य इति तत्प्रवेशः प्रकल्प्यते । न ह्यन्यत्रोपलभ्यते ब्रह्म निर्विशेषत्वात् । विशेषसम्बन्धो ह्युपलब्धिहेतुर्दृष्टः, यथा राहोश्चन्द्रार्कविशिष्टसम्बन्धः । एवमन्तःकरणगुहात्मसम्बन्धो ब्रह्मण उपलब्धिहेतुः । संनिकर्षादवभासात्मकत्वाच्चान्तःकरणस्य ।

यथा चालोकविशिष्टा घटाद्युपलब्धिरेवं बुद्धिप्रत्ययालोकविशिष्टात्मोपलब्धिः स्यात्तस्मादुपलब्धिहेतौ गुहायां निहितमिति प्रकृतमेव । तद्वृत्तिस्थानीये त्विह पुनस्तत्सृष्ट्वा तदेवानुप्राविशदित्युच्यते ।

तदेवेदमाकाशादिकारणं कार्यं सृष्ट्वा तदनुप्रविष्टमिवान्तर्गुहायां बुद्धौ द्रष्टृ श्रोतृ मन्तृ विज्ञात्रित्येवं विशेषवदुपलभ्यते । स एव तस्य प्रवेशस्तस्मादस्ति तत्कारणं ब्रह्म । अतोऽस्तित्वादस्तीत्येवोपलब्धव्यं तत् ।

तत्कार्यमनुप्रविश्य, किम्? तस्य सच्च मूर्तं त्यच्चामूर्तसार्वात्म्यम् मभवत् । मूर्तामूर्ते ह्यव्याकृतनामरूपे आत्मस्थे अन्तर्गतेनात्मना व्याक्रियेते व्याकृते मूर्तामूर्तशब्दवाच्ये । ते आत्मना त्वप्रविभक्तदेशकाले इति कृत्वात्मा ते अभवदित्युच्यते ।

किं च निरुक्तं चानिरुक्तं च । निरुक्तं नाम निष्कृष्य समानासमानजातीयेभ्यो देशकालविशिष्टतयेदं तदित्युक्तमनिरुक्तं तद्विपरीतं निरुक्तानिरुक्ते अपि मूर्तामूर्तयोरेव विशेषणे । यथा सच्च त्यच्च प्रत्यक्षपरोक्षे, तथा निलयनं चानिलयनं च । निलयनं नीडमाश्रयो मूर्तस्यैव धर्मः । अनिलयनं तद्विपरीतममूर्तस्यैव धर्मः ।

त्यदनिरुक्तानिलयनान्यमूर्तधर्मत्वेऽपि व्याकृतविषयाण्येव । सर्गोत्तरकालभावश्रवणात् । त्यदिति प्राणाद्यनिरुक्तं तदेवानिलयनं च । अतो विशेषणान्यमूर्तस्य व्याकृतविषयाण्येवैतानि ।

विज्ञानं चेतनमविज्ञानं तद्रहितमचेतनं पाषाणादि सत्यं च व्यवहारविषयमधिकारान्न परमार्थसत्यम् । एकमेव हि परमार्थसत्यं ब्रह्म । इह पुन- र्व्यवहारविषयमापेक्षिकं सत्यम्, मृगतृष्णिकाद्यनृतापेक्षयोदकादि सत्यमुच्यते । अनृतं च तद्विपरीतम् । किं पुनः? एतत्सर्वमभवत्, सत्यं परमार्थसत्यम् । किं पुनस्तत्? ब्रह्म, सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्मेति प्रकृतत्वात् ।

यस्मात्सत्यत्यादिकं मूर्तामूर्तधर्मजातं यत्किंचेदं सर्वमविशिष्टं विकारजातमेकमेव सच्छब्दवाच्यं ब्रह्माभवत्तद्व्यतिरेकेणाभावान्नामरूपविकारस्य, तस्मात्तद्ब्रह्म सत्यमित्याचक्षते ब्रह्मविदः ।

अस्ति नास्तीत्यनुप्रश्नः प्रकृतस्तस्य प्रतिवचनविषय एतदुक्तमात्माकामयत बहु स्यामिति । स यथाकामं चाकाशादिकार्यं सत्यत्यादिलक्षणं सृष्ट्वा तदनु प्रविश्य पश्यञ्शृण्वन्मन्वानो विजानन् बह्वभवत्तस्मात्तदेवेदमाकाशादिकारणं कार्यस्थं परमे व्योमन् हृदयगुहायां निहितं तत्प्रत्ययावभासविशेषेणोपलभ्यमानमस्ति इत्येवं विजानीयादित्युक्तं भवति ।

तदेतस्मिन्नर्थे ब्राह्मणोक्त एष श्लोको मन्त्रो भवति । यथा पूर्वेषु अन्नमयाद्यात्मप्रकाशकाः पञ्चस्वप्येवं सर्वान्तरतमात्मास्तित्वप्रकाशकोऽपि मन्त्रः कार्यद्वारेण भवति ॥ १ ॥

इति ब्रह्मानन्दवल्ल्यां षष्ठोऽनुवाकः ॥ ६ ॥


सप्तम अनुवाक