ततो वै सदजायत ।
तदात्मानग्ँस्वयमकुरुत ।
तस्मात्तत्सुकृतमुच्यत इति ।
यद्वै तत्सुकृतं रसो वै सः ।
रसग्ँह्येवायं लब्ध्वानन्दी भवति ।
को ह्येवान्यात्कः प्राण्याद् यदेष आकाश आनन्दो न स्यात् ।
एष ह्येवानन्दयाति ।
यदा ह्येवैष एतस्मिन्नदृश्येऽनात्म्येऽनिरुक्तेऽनिलयनेऽभयं प्रतिष्ठां विन्दते ।
अथ सोऽभयं गतो भवति ।
यदा ह्येवैष एतस्मिन्नुदरमन्तरं कुरुते ।
अथ तस्य भयं भवति ।
तत्त्वेव भयं विदुषो मन्वानस्य ।
तदप्येष श्लोको भवति ॥ १ ॥
asadvā idamagra āsīt .
tato vai sadajāyata .
tadātmānag̐svayamakuruta .
tasmāttatsukṛtamucyata iti .
yadvai tatsukṛtaṃ raso vai saḥ .
rasag̐hyevāyaṃ labdhvānandī bhavati .
ko hyevānyātkaḥ prāṇyād yadeṣa ākāśa ānando na syāt .
eṣa hyevānandayāti .
yadā hyevaiṣa etasminnadṛśye’nātmye’nirukte’nilayane’bhayaṃ pratiṣṭhāṃ vindate .
atha so’bhayaṃ gato bhavati .
yadā hyevaiṣa etasminnudaramantaraṃ kurute .
atha tasya bhayaṃ bhavati .
tattveva bhayaṃ viduṣo manvānasya .
tadapyeṣa śloko bhavati .. 1 ..
पहले यह [जगत्] असत् ही था । ‘असत्’ इस शब्द से, जिनके नाम-रूप व्यक्त हो गये हैं उन विशेष पदार्थों से विपरीत स्वभाववाला अव्याकृत ब्रह्म कहा जाता है । इससे [वन्ध्यापुत्रादि] अत्यन्त असत् पदार्थ बतलाये जाने अभीष्ट नहीं हैं, क्योंकि असत् से सत् का जन्म नहीं हो सकता । ‘इदम्’ अर्थात् नाम-रूप विशेष से युक्त व्याकृत जगत् अग्रे—पहले अर्थात् उत्पत्ति से पूर्व ‘असत्’ शब्दवाच्य ब्रह्म ही था । उस असत् से ही सत् यानी जिसके नाम-रूप का विभाग हो गया है उस विशेष की उत्पत्ति हुई ।
तो क्या पिता से पुत्र के समान यह कार्यवर्ग उस [ब्रह्म]-से विभिन्न है? इसपर श्रुति कहती है—‘नहीं; उस ‘असत्’ शब्दवाच्य ब्रह्म ने स्वयं अपनेको ही रचा । क्योंकि ऐसी बात है इसलिये वह ब्रह्म ही सुकृत अर्थात् स्वयंकर्ता कहा जाता है, सबका कारण होने से ब्रह्म स्वयंकर्ता है—यह बात लोक में प्रसिद्ध है ।
अथवा, क्योंकि सर्वरूप होने से ब्रह्म ने स्वयं ही इस सम्पूर्ण जगत् की रचना की है, इसलिये पुण्यरूप से भी उसका कारणरूप वह ब्रह्म ‘सुकृत’ कहा जाता है । लोक में जो कार्य [पुण्य अथवा पाप] किसी भी प्रकार से फल के सम्बन्धादि का कारण होता है वही ‘सुकृत’ शब्द के वाच्यरूप से प्रसिद्ध होता है । वह प्रसिद्धि चाहे पुण्यरूपा हो और चाहे पापरूपा किसी नित्य और सचेतन कारण के होने पर ही हो सकती है । अतः उस सुकृतरूप प्रसिद्धि की सत्ता होने से यह सिद्ध होता है कि वह ब्रह्म है । ब्रह्म इसलिये भी है; किसलिये? रसस्वरूप होने के कारण । ब्रह्म की रसस्वरूपता की प्रसिद्धि किस कारण से है—इसपर श्रुति कहती है—
जो भी वह प्रसिद्ध सुकृत है वह निश्चय रस ही है । खट्टा-मीठा आदि तृप्तिदायक और आनन्दप्रद पदार्थ लोक में ‘रस’ नाम से प्रसिद्ध है ही । इस रस को ही पाकर पुरुष आनन्दी अर्थात् सुखी हो जाता है । लोक में किसी असत् पदार्थ की आनन्दहेतुता कभी नहीं देखी गयी । ब्रह्मनिष्ठ, निरीह और निरपेक्ष विद्वान् बाह्यसुख के साधन से रहित होने पर भी बाह्य रस के लाभ से आनन्दित होने के समान आनन्दयुक्त देखे जाते हैं । निश्चय उनका रस ब्रह्म ही है । अतः रस के समान उनके आनन्द का कारणरूप वह ब्रह्म है ही ।
इसलिये भी ब्रह्म है; किसलिये? प्राणनादि क्रिया के देखे जाने से । जीवित पुरुष का यह पिण्ड भी प्राण की सहायता से प्राणन करता है और अपान वायु के द्वारा अपानक्रिया करता है । इसी प्रकार संघात को प्राप्त हुए इन शरीर और इन्द्रियों के द्वारा निष्पन्न होती हुई और भी वायु और इन्द्रियसम्बन्धिनी चेष्टाएँ देखी जाती हैं । वह वायु आदि अचेतन पदार्थों का एक ही उद्देश्य की सिद्धि के लिये परस्पर संहत (अनुकूल) होना किसी असंहत (किसी से भी न मिले हुए) चेतन के बिना नहीं हो सकता, क्योंकि और कहीं ऐसा देखा नहीं जाता ।
इसी बात को श्रुति कहती है—यदि आकाश—परमाकाश अर्थात् बुद्धिरूप गुहा में छिपा हुआ यह आनन्द न होता तो लोक में कौन अपान-क्रिया करता और कौन प्राणन कर सकता; इसलिये वह ब्रह्म है ही, जिसके लिये कि शरीर और इन्द्रिय की प्राणन आदि चेष्टाएँ हो रही हैं; और उसी का किया हुआ लोक का आनन्द भी है ।
ऐसा क्यों है? क्योंकि यह परमात्मा ही लोक को उसके धर्मानुसार आनन्दित—सुखी करता है । तात्पर्य यह है कि वह आनन्दरूप आत्मा ही प्राणियों द्वारा अविद्या से परिच्छिन्न भावना किया जाता है । अविद्वान् के भय और विद्वान् के अभय का कारण होने से भी ब्रह्म है, क्योंकि किसी सत्य पदार्थ के आश्रय से ही अभय हुआ करता है, असद्वस्तु के आश्रय से भय की निवृत्ति होनी सम्भव नहीं है ।
ब्रह्म का अभयहेतुत्व किस प्रकार है, सो बतलाया जाता है—क्योंकि जिस समय भी यह साधक इस ब्रह्म में [प्रतिष्ठा—स्थिति अर्थात् आत्मभाव प्राप्त कर लेता है ।] किन विशेषणों से युक्त ब्रह्म में? अदृश्य में—दृश्य देखे जानेवाले अर्थात् विकार का नाम है क्योंकि विकार देखे जाने के ही लिये है; जो दृश्य न हो उसे अदृश्य अर्थात् अविकार कहते हैं । इस अदृश्य—अविकारी अर्थात् अविषयभूत, अनात्म्य—अशरीर में । क्योंकि वह अदृश्य है इसलिये अशरीर भी है और क्योंकि अशरीर है इसलिये अनिरुक्त है । निरूपण विशेष का ही किया जाता है और विशेष विकार ही होता है; किन्तु ब्रह्म सम्पूर्ण विकार का कारण होने से स्वयं अविकार ही है, इसलिये वह अनिरुक्त है । क्योंकि ऐसा है इसलिये वह अनिलयन है; निलयन आश्रय को कहते हैं; जिसका निलयन न हो वह अनिलयन यानी अनाश्रय है । उसे इस अदृश्य, अनात्म्य, अनिरुक्त और अनिलयन अर्थात् सम्पूर्ण कार्यधर्मों से विलक्षण ब्रह्म में अभय प्रतिष्ठा—स्थिति यानी आत्मभाव को प्राप्त करता है । उस समय उसमें भय के हेतुभूत नानात्व को न देखने के कारण अभय को प्राप्त हो जाता है । मूल में ‘अभयम्’ यह क्रियाविशेषण है अथवा इसे ‘अभयाम्’ इस प्रकार अन्य (स्त्री) लिङ्ग के रूप में परिणत कर लेना चाहिये ।
जिस समय यह अपने स्वरूप में स्थित हो जाता है उस समय यह न तो और कुछ देखता है, न और कुछ सुनता है और न और कुछ जानता ही है । अन्य को ही अन्य से भय हुआ करता है, आत्मा से आत्मा को भय होना सम्भव नहीं है । अतः आत्मा ही आत्मा के अभय का कारण है । ब्राह्मण लोग (ब्रह्मनिष्ठ पुरुष) भय के कारणों के रहते हुए भी सब ओर से निर्भय दिखायी देते हैं । किन्तु भय से रक्षा करनेवाले ब्रह्म के न होने पर ऐसा होना असम्भव था । अतः उन्हें निर्भय देखने से यह सिद्ध होता है कि अभय का हेतुभूत ब्रह्म है ही ।
यह साधक कब अभय को प्राप्त होता है? [ऐसा प्रश्न होने पर कहते हैं—] जिस समय यह अन्य कुछ नहीं देखता और अपने आत्मा में किसी प्रकार का अन्तर—भेद नहीं करता उस समय ही यह अभय को प्राप्त होता है—यह इसका तात्पर्य है । किन्तु जिस समय अविद्यावस्था में यह अविद्याग्रस्त जीव तिमिररोगी को दिखायी देनेवाले दूसरे चन्द्रमा के समान अविद्या द्वारा प्रस्तुत किये हुए पदार्थों को देखता है तथा इस आत्मा यानी ब्रह्म में थोड़ा-सा भी अन्तर—छिद्र अर्थात् भेददर्शन करता है—भेददर्शन ही भय का कारण है, अतः तात्पर्य यह है कि यदि यह थोड़ा-सा भी भेद देखता है—तो उस आत्मा के भेददर्शनरूप कारण से उसे भय होता है । अतः अज्ञानी के लिये आत्मा ही आत्मा के भय का कारण है ।
यहाँ श्रुति इसी बात को कहती है—भेददर्शी विद्वान् के लिये वह ब्रह्म ही भयरूप है । मुझसे भिन्न ईश्वर और है तथा मैं संसारी जीव और हूँ इस प्रकार उसमें थोड़ा-सा भी अन्तर करनेवाले उसे एकरूप से न माननेवाले विद्वान् (भेदज्ञानी) के लिये वह भेदरूप से देखा गया ईश्वरसंज्ञक ब्रह्म ही भयरूप हो जाता है । अतः जो पुरुष एक अभिन्न आत्मतत्त्व को नहीं देखता वह विद्वान् होने पर भी अविद्वान् ही है ।
अपने को उच्छेद्य (नाशवान्) माननेवाले को ही उच्छेद का कारण देखने से भय हुआ करता है । उच्छेद का कारण तो अनुच्छेद्य (अविनाशी) ही होता है । अतः यदि कोई उच्छेद का कारण न होता तो उच्छेद्य पदार्थों में उसके देखने से होनेवाला भय सम्भव नहीं था । किन्तु सारा ही संसार भययुक्त देखा जाता है । अतः जगत् को भय होता देखने से जाना जाता है कि उसके भय का कारण उच्छेद का हेतुभूत किन्तु स्वयं अनुच्छेद्यरूप ब्रह्म है, जिससे कि जगत् भय मानता है । इसी अर्थ में यह श्लोक भी है ॥ १ ॥
संस्कृत भाष्य पढ़ें
असद्वा इदमग्र आसीत् ।
असच्छब्द- असदिति व्याकृतवाच्याव्याकृता- नामरूपविशेषजगदुत्पत्तिः विपरीतरूपमव्याकृतं ब्रह्मोच्यते । न पुनरत्यन्तमेवासत् । न ह्यसतः सज्जन्मास्ति । इदमिति नामरूपविशेषवद्व्याकृतं जगदग्रे पूर्वं प्रागुत्पत्तेर्ब्रह्मेवासच्छब्दवाच्यमासीत् । ततोऽसतो वै सत्प्रविभक्तनामरूपविशेषमजायतोत्पन्नम् ।
किं ततः प्रविभक्तं कार्यमिति पितुरिव पुत्रः, नेत्याह । तदसच्छब्दवाच्यं स्वयमेवात्मानमेवाकुरुत कृतवत् । यस्मादेवं तस्माद्ब्रह्मैव सुकृतं स्वयंकर्तृच्यते । स्वयंकर्तृ ब्रह्मेति प्रसिद्धं लोके सर्वकारणत्वात् ।
यस्माद्वा स्वयमकरोत्सर्वं सर्वात्मना तस्मात्पुण्यरूपेणापि तदेव ब्रह्म कारणं सुकृतमुच्यते । सर्वथापि तु फलसम्बन्धादिकारणं सुकृतशब्दवाच्यं प्रसिद्धं लोके । यदि पुण्यं यदि वान्यत्सा प्रसिद्धिर्नित्ये चेतनवत्कारणे सत्युपपद्यते । तस्मादस्ति तद्ब्रह्म सुकृतप्रसिद्धेः । इतश्चास्ति । कुतः? रसत्वात् । कुतो रसत्वप्रसिद्धिर्ब्रह्मण इत्यत आह—
यद्वै तत्सुकृतम् । रसो वै ब्रह्मणो सः । रसो नाम रसस्वरूपत्वम् तृप्तिहेतुरानन्दकरो मधुराम्लादिः प्रसिद्धो लोके । रसमेवायं लब्ध्वा प्राप्यानन्दी सुखी भवति । नासत आनन्दहेतुत्वं दृष्टं लोके । बाह्यानन्दसाधनरहिता अप्यनीहा निरेषणा ब्राह्मणा बाह्यरसलाभादिव सानन्दा दृश्यन्ते विद्वांसः; नूनं ब्रह्मैव रसस्तेषाम् । तस्मादस्ति तत्तेषामानन्दकारणं रसवद्ब्रह्म ।
इतश्चास्ति; कुतः? प्राणनादिक्रियादर्शनात् । अयमपि हि पिण्डो जीवतः प्राणेन प्राणित्यपानेनापानिति । एवं वायवीया ऐन्द्रियकाश्च चेष्टाः संहतैः कार्यकरणैर्निर्वर्त्यमाना दृश्यन्ते । तच्चैकार्थवृत्तित्वेन संहननं नान्तरेण चेतनमसंहतं सम्भवति । अन्यत्रादर्शनात् ।
तदाह—तद्यदि एष आकाशे परमे व्योम्नि गुहायां निहित आनन्दो न स्यान्न भवेत्को ह्येव लोकेऽन्यादपानचेष्टां कुर्यादित्यर्थः । कः प्राण्यात्प्राणनं वा कुर्यात्तस्मादस्ति तद्ब्रह्म । यदर्थाः कार्यकरणप्राणनादिचेष्टास्तत्कृत एव चानन्दो लोकस्य ।
कुतः? एष ह्येव पर आत्मा आनन्दयात्यानन्दयति सुखयति लोकं धर्मानुरूपम् । स एवात्मानन्दरूपोऽविद्यया परिच्छिन्नो विभाव्यते प्राणिभिरित्यर्थः । भयाभयहेतुत्वाद्विद्वदविदुषोरस्ति तद्ब्रह्म । सद्वस्त्वाश्रयणेन ह्यभयं भवति । नासद्वस्त्वाश्रयणेन भयनिवृत्तिरुपपद्यते ।
कथमभयहेतुत्वमित्युच्यते—
ब्रह्मणोऽभय- यदा ह्येव यस्मादेष हेतुत्वम् साधक एतस्मिन्ब्रह्मणि किंविशिष्टेऽदृश्ये दृश्यं नाम द्रष्टव्यं विकारो दर्शनार्थत्वाद्विकारस्य । न दृश्यमदृश्यमविकार इत्यर्थः । एतस्मिन्नदृश्येऽविकारेऽविषयभूते अनात्म्येऽशरीरे । यस्माददृश्यं तस्मादनात्म्यं यस्मादनात्म्यं तस्मादनिरुक्तम् । विशेषो हि निरुच्यते विशेषश्च विकारः । अविकारं च ब्रह्म, सर्वविकारहेतुत्वात्तस्मादनिरुक्तम् । यत एवं तस्मादनिलयनं निलयनं नीड आश्रयो न निलयनमनिलयनमनाधारं तस्मिन्नेतस्मिन्नदृश्येऽनात्म्येऽनिरुक्तेऽनिलयने सर्वकार्यधर्मविलक्षणे ब्रह्मणीति वाक्यार्थः । अभयमिति क्रियाविशेषणम् । अभयामिति वा लिङ्गान्तरं परिणम्यते । प्रतिष्ठां स्थितिमात्मभावं विन्दते लभते । अथ तदा स तस्मिन्नानात्वस्य भयहेतोरविद्याकृतस्यादर्शनादभयं गतो भवति ।
स्वरूपप्रतिष्ठो ह्यसौ यदा भवति तदा नान्यत्पश्यति नान्यच्छृणोति नान्यद्विजानाति । अन्यस्य ह्यन्यतो भयं भवति नात्मन एवात्मनो भयं युक्तम् । तस्मादात्मैवात्मनोऽभयकारणम् । सर्वतो हि निर्भया ब्राह्मणा दृश्यन्ते सत्सु भयहेतुषु तच्चायुक्तमसति भयत्राणे ब्रह्मणि । तस्मात्तेषामभयदर्शनादस्ति तदभयकारणं ब्रह्मेति ।
कदासावभयं गतो भवति भेददर्शनमेव भयहेतुः साधको यदा नान्यत्पश्य- त्यात्मनि चान्तरं भेदं न कुरुते तदाभयं गतो भवतीत्यभिप्रायः । यदा पुनरविद्यावस्थायां हि यस्मादेषोऽविद्यावानविद्यया प्रत्युपस्थापितं वस्तु तैमिरिकद्वितीयचन्द्रवत्पश्यत्यात्मनि चैतस्मिन् ब्रह्मणि उदपि, अरमल्पमप्यन्तरं छिद्रं भेददर्शनं कुरुते । भेददर्शनमेव हि भयकारणमल्पमपि भेदं पश्यतीत्यर्थः । अथ तस्माद्भेददर्शनाद्धेतोरस्य भेददर्शिन आत्मनो भयं भवति । तस्मादात्मैवात्मनो भयकारणमविदुषः ।
तदेतदाह । तद्ब्रह्म त्वेव भयं भेददर्शिनो विदुष ईश्वरोऽन्यो मत्तोऽहमन्यः संसारी इत्येवं विदुषो भेददृष्टमीश्वराख्यं तदेव ब्रह्माल्पमप्यन्तरं कुर्वतो भयं भवत्येकत्वेनामन्वानस्य । तस्माद्विद्वानप्यविद्वानेवासौ योऽयमेकमभिन्नमात्मतत्त्वं न पश्यति ।
उच्छेदहेतुदर्शनाद्ध्युच्छेद्याभिमतस्य भयं भवति । अनुच्छेद्यो ह्युच्छेदहेतुस्तत्रासत्युच्छेदहेतावुच्छेद्ये न तद्दर्शनकार्यं भयं युक्तम् । सर्वं च जगद्भयवद्दृश्यते । तस्माज्जगतो भयदर्शनाद्गम्यते नूनं तदस्ति भयकारणमुच्छेदहेतुरनुच्छेद्यात्मकं यतो जगद्विभेतीति । तदेतस्मिन्नप्यर्थ एष श्लोको भवति ॥ १ ॥
इति ब्रह्मानन्दवल्ल्यां सप्तमोऽनुवाकः ॥ ७ ॥