ते ये शतमिन्द्रस्यानन्दाः ।
स एको बृहस्पतेरानन्दः ।
श्रोत्रियस्य चाकामहतस्य ।
ते ये शतं बृहस्पतेरानन्दाः ।
स एकः प्रजापतेरानन्दः ।
श्रोत्रियस्य चाकामहतस्य ।
ते ये शतं प्रजापतेरानन्दाः ।
स एको ब्रह्मण आनन्दः ।
श्रोत्रियस्य चाकामहतस्य ॥ ४ ॥
śrotriyasya cākāmahatasya .
te ye śatamindrasyānandāḥ .
sa eko bṛhaspaterānandaḥ .
śrotriyasya cākāmahatasya .
te ye śataṃ bṛhaspaterānandāḥ .
sa ekaḥ prajāpaterānandaḥ .
śrotriyasya cākāmahatasya .
te ye śataṃ prajāpaterānandāḥ .
sa eko brahmaṇa ānandaḥ .
śrotriyasya cākāmahatasya .. 4 ..
इसकी भीति अर्थात् भय से वायु चलता है, इसीकी भीति से सूर्य उदित होता है और इसके भय से ही अग्नि, इन्द्र तथा पाँचवाँ मृत्यु दौड़ता है ।
वायु आदि देवगण परमपूजनीय और स्वयं समर्थ होने पर भी अत्यन्त श्रमसाध्य चलने आदि के कार्य में नियमानुसार प्रवृत्त हो रहे हैं । यह बात उनका कोई शासक होने पर ही सम्भव है । क्योंकि उनकी नियम से प्रवृत्ति होती है, इसलिये उनके भय का कारण और उन पर शासन करनेवाला ब्रह्म है । जिस प्रकार राजा के भय से सेवक लोग अपने-अपने कामों में लगे रहते हैं उसी प्रकार वे इस ब्रह्म के भय से प्रवृत्त होते हैं, वह उनके भय का कारण ब्रह्म आनन्दस्वरूप है ।
उस इस ब्रह्म के आनन्द की यह मीमांसा—विचारणा है । उस आनन्द की क्या बात विचारणीय है, इस पर कहते हैं—‘क्या वह आनन्द लौकिक सुख की भाँति विषय और विषय को ग्रहण करनेवाले के सम्बन्ध से होनेवाला है अथवा स्वाभाविक ही है? ’ इस प्रकार यही उस आनन्द की मीमांसा है ।
उसमें जो लौकिक आनन्द बाह्य और शारीरिक साधन-सम्पत्ति के कारण उत्कृष्ट गिना जाता है ब्रह्मानन्द के ज्ञान के लिये यहाँ उसी का निर्देश किया जाता है । इस प्रसिद्ध आनन्द के द्वारा ही जिसकी बुद्धि विषयों से हटी हुई है उस ब्रह्मवेत्ता को अनुभव होनेवाले आनन्द का ज्ञान हो सकता है ।
लौकिक आनन्द भी ब्रह्मानन्द का ही अंश है । अविद्या से विज्ञान के तिरस्कृत हो जाने पर और अविद्या का उत्कर्ष होने पर प्राक्तन कर्मवश विषयादि साधनों के सम्बन्ध से ब्रह्मा आदि जीवों द्वारा अपने-अपने विज्ञानानुसार भावना किया जाने के कारण ही वह लोक में अस्थिर और लौकिक आनन्द हो जाता है । कामनाओं से पराभूत न होनेवाले विद्वान् श्रोत्रिय को प्रत्यक्ष अनुभव होनेवाला वह ब्रह्मानन्द ही मनुष्य-गन्धर्व आदि आगे-आगे की भूमियों में हिरण्यगर्भपर्यन्त अविद्या, कामना और कर्म का ह्रास होने से उत्तरोत्तर सौ-सौ गुने उत्कर्ष से आविर्भूत होता है । तथा विद्या द्वारा अविद्याजनित विषय-विषयि-विभाग के निवृत्त हो जाने पर वह स्वाभाविक परिपूर्ण एक और अद्वैत आनन्द हो जाता है—इसी अर्थ को समझाने के लिये श्रुति कहती है—
जो युवा अर्थात् पूर्ववयस्क, साधुयुवा अर्थात् जो साधु भी हो और युवा भी—इस प्रकार साधुयुवा शब्द ‘युवा’ का विशेषण है; लोक में युवा भी असाधु हो सकता है और साधु भी अयुवा हो सकता है, इसीलिये ‘जो युवा हो—साधुयुवा हो’ इस प्रकार विशेषणरूप से कहा है । तथा अध्यायक—वेद पढ़ा हुआ, आशिष्ठः—अत्यन्त आशावान्, दृढिष्ठः—अत्यन्त दृढ़ और बलिष्ठ— अति बलवान् हो; इस प्रकार जो इन आध्यात्मिक साधनों से सम्पन्न हो; और उसीकी, यह धन से अर्थात् उपभोग के साधन से तथा लौकिक और पारलौकिक कर्म के साधन से सम्पन्न सम्पूर्ण पृथिवी हो—अर्थात् जो राजा यानी पृथिवीपति हो; उसका जो आनन्द है वह एक मानुष आनन्द यानी मनुष्यों का एक प्रकृष्ट आनन्द है ।
ऐसे जो सौ मानुष आनन्द हैं वही मनुष्य-गन्धर्वों का एक आनन्द है । मानुष आनन्द से मनुष्यगन्धर्वों का आनन्द सौ गुना उत्कृष्ट होता है । जो पहले मनुष्य होकर फिर कर्म और उपासना की विशेषता से गन्धर्वत्व को प्राप्त हुए हैं वे मनुष्यगन्धर्व कहलाते हैं । वे अन्तर्धानादि की शक्ति से सम्पन्न तथा सूक्ष्म शरीर और इन्द्रियों से युक्त होते हैं, इसलिये उन्हें [शीतोष्णादि द्वन्द्वों का] थोड़ा प्रतिघात होता है तथा वे द्वन्द्वों का सामना करनेवाले सामर्थ्य और साधन से सम्पन्न होते हैं । अतः उस शीतोष्णादि द्वन्द्व से प्रतिहत न होनेवाले तथा [उसका आघात होने पर] उसका प्रतीकार करने में समर्थ मनुष्यगन्धर्व को चित्तप्रसाद प्राप्त होता है और उस प्रसादविशेष से उसके सुखविशेष की अभिव्यक्ति होती है । इस प्रकार पूर्व-पूर्व भूमि की अपेक्षा आगे-आगे की भूमि में प्रसाद की विशेषता होने से सौ-सौ गुने आनन्द का उत्कर्ष होना सम्भव ही है ।
[आगे के सब वाक्यों के साथ रहनेवाला] ‘श्रोत्रियस्य चाकामहतस्य’ यह वाक्य पहले [मानुष आनन्द के साथ] इसलिये ग्रहण नहीं किया गया कि विषय-भोग और कामनाओं से व्याकुल न रहनेवाले श्रोत्रिय के आनन्द का उत्कर्ष मानुष आनन्द की अपेक्षा सौ गुना अर्थात् मनुष्यगन्धर्व के आनन्द के तुल्य बतलाना है । श्रुति में ‘साधुयुवा’ और ‘अध्यायक’ ये दो विशेषण [सार्वभौम राजा का] श्रोत्रियत्व और निष्पापत्व प्रदर्शित करने के लिये ग्रहण किये जाते हैं । इन्हें आगे भी सबके साथ समानभाव से समझना चाहिये । विषय के उत्कर्ष और अपकर्ष से सुख का भी उत्कर्ष और अपकर्ष होता है [किन्तु कामनारहित पुरुष के लिये सुख का उत्कर्ष या अपकर्ष हुआ नहीं करता] इसीलिये अकामहतत्व की विशेषता है, और इसीसे ‘अकामहत’ पद ग्रहण किया गया है । अतः उससे विशिष्ट पुरुष के सुख का सौगुना उत्कर्ष देखा जाता है; अतः अकामहतत्व को परमानन्द की प्राप्ति का साधन बतलाने के लिये ‘अकामहत’ विशेषण ग्रहण किया है, और सबकी व्याख्या पहले की जा चुकी है ।
देवगन्धर्व—जो जन्म से ही गन्धर्व हों ‘चिरलोकलोकानाम्’ (चिरस्थायी लोक में रहनेवाले) यह पितृगण का विशेषण है । जिन पितृगण का चिरस्थायी लोक है वे चिरलोक-लोक कहे जाते हैं । ‘आजान’ देवलोक का नाम है, उस आजान में जो उत्पन्न हुए हैं वे देवगण ‘आजानज’ हैं, जो कि स्मार्तकर्मविशेष के कारण देवस्थान में उत्पन्न हुए हैं ।
जो केवल अग्निहोत्रादि वैदिक कर्म से देवभाव को प्राप्त हुए हैं वे ‘कर्मदेव’ कहलाते हैं । जो तैंतीस देवगण यज्ञ में हविर्भाग लेनेवाले हैं वे ही यहाँ ‘देव’ शब्द से कहे गये हैं । उनका स्वामी इन्द्र है और इन्द्र का गुरु बृहस्पति है । ‘प्रजापति’ का अर्थ विराट् है, तथा त्रैलोक्यशरीरधारी ब्रह्मा है जो समष्टि-व्यष्टिरूप और समस्त संसारमण्डल में व्याप्त है ।
जहाँ ये आनन्द के भेद एकता को प्राप्त होते हैं [अर्थात् एक ही गिने जाते हैं] तथा जहाँ उससे होनेवाले धर्म एवं ज्ञान तथा तद्विषयक अकामहतत्व सबसे बढ़े हुए हैं वह यह हिरण्यगर्भ ही ब्रह्मा है । उसका यह आनन्द श्रोत्रिय, निष्पाप और अकामहत पुरुष द्वारा सर्वत्र प्रत्यक्ष उपलब्ध किया जाता है । इससे यह जाना जाता है कि [निष्पापत्व, अकामहतत्व और श्रोत्रियत्व] ये तीन उसके साधन हैं । इनमें श्रोत्रियत्व और निष्पापत्व तो नियत (न्यूनाधिक न होनेवाले) धर्म हैं किन्तु अकामहतत्व का उत्तरोत्तर उत्कर्ष होता है; इसलिये यह प्रकृष्ट-साधनरूप से जाना जाता है ।
उस अकामहतत्व के प्रकर्ष से उपलब्ध होनेवाला तथा श्रोत्रिय को प्रत्यक्ष अनुभव होनेवाला वह ब्रह्मा का आनन्द जिस परमानन्द की मात्रा अर्थात् केवल एकदेशमात्र है, जैसा कि “इस आनन्द के लेश से ही अन्य प्राणी जीवित रहते हैं” इस अन्य श्रुति से सिद्ध होता है, वह यह हिरण्यगर्भ का आनन्द, जिसकी मात्राएँ (लेशमात्र आनन्द) समुद्र के जल की बूँदों के समान विभक्त हो पुनः उसमें एकत्व को प्राप्त हुई हैं वही अद्वैतरूप होने से स्वाभाविक परमानन्द है । इसमें आनन्द और आनन्दी का अभेद है ॥ १—४ ॥
संस्कृत भाष्य पढ़ें
भीषा भयेनास्माद्वातः पवते । ब्रह्मानुशासनम् भीषोदेति सूर्यः भीषास्मादग्निश्चेन्द्रश्च मृत्युर्धावति पञ्चम इति ।
वातादयो हि महार्हाः स्वयमीश्वराः सन्तः पवनादिकार्येष्वायासबहुलेषु नियताः प्रवर्तन्ते । तद्युक्तं प्रशास्तरि सति; यस्मान्नियमेन तेषां प्रवर्तनम् । तस्मादस्ति भयकारणं तेषां प्रशास्तृ ब्रह्म । यतस्ते भृत्या इव राज्ञोऽस्माद्ब्रह्मणो भयेन प्रवर्तन्ते । तच्च भयकारणमानन्दं ब्रह्म ।
तस्यास्य ब्रह्मण आनन्दस्यैषा ब्रह्मानन्दा- मीमांसा विचारणा लोचनम् भवति । किमानन्दस्य मीमांस्यमित्युच्यते । किमानन्दो विषयविषयिसम्बन्धजनितो लौकिकानन्दवदाहोस्वित् स्वाभाविक इत्येवमेषानन्दस्य मीमांसा ।
तत्र लौकिक आनन्दो बाह्याध्यात्मिकसाधनसम्पत्तिनिमित्त उत्कृष्टः । स य एष निर्दिश्यते ब्रह्मानन्दानुगमार्थम् । अनेन हि प्रसिद्धेनानन्देन व्यावृत्तविषयबुद्धिगम्य आनन्दोऽनुगन्तुं शक्यते ।
लौकिकोऽप्यानन्दो ब्रह्मानन्दस्यैव मात्रा अविद्यया तिरस्क्रियमाणे विज्ञान उत्कृष्यमाणायां चाविद्यायां ब्रह्मादिभिः कर्मवशाद्यथाविज्ञानं विषयादिसाधनसम्बन्धवशाच्च विभाव्यमानश्च लोकेऽनवस्थितो लौकिकः सम्पद्यते । स एवाविद्याकामकर्मापकर्षेण मनुष्यगन्धर्वाद्युत्तरोत्तरभूमिष्वकामहतविद्वच्छ्रोत्रियप्रत्यक्षो विभाव्यते शतगुणोत्तरोत्तरोत्कर्षेण यावद्धिरण्यगर्भस्य ब्रह्मण आनन्द इति । निरस्ते त्वविद्याकृते विषयविषयिविभागे विद्यया स्वाभाविकः परिपूर्ण एक आनन्दोऽद्वैतो भवतीत्येतमर्थं विभावयिष्यन्नाह ।
युवा प्रथमवयाः । साधुयुवेति साधुश्चासौ युवा चेति यूनो विशेषणम् । युवाप्यसाधुर्भवति साधुरप्ययुवातो विशेषणं युवा स्यात्साधुयुवेति । अध्यायकोऽधीतवेदः । आशिष्ठ आशास्तृतमः ।
दृढिष्ठो दृढतमः । बलिष्ठो बलवत्तमः । एवमाध्यात्मिकसाधनसम्पन्नः । तस्येयं पृथिव्युर्वी सर्वा वित्तस्य वित्तेनोपभोगसाधनेन दृष्टार्थेनादृष्टार्थेन च कर्मसाधनेन सम्पन्ना पूर्णा राजा पृथिवीपतिरित्यर्थः । तस्य च य आनन्दः स एको मानुषो मनुष्याणां प्रकृष्ट एक आनन्दः ।
ते ये शतं मानुषा आनन्दाः स एको मनुष्यगन्धर्वाणामानन्दः । मानुषानन्दाच्छतगुणेनोत्कृष्टो मनुष्यगन्धर्वाणामानन्दो भवति । मनुष्याः सन्तः कर्मविद्याविशेषाद्गन्धर्वत्वं प्राप्ता मनुष्यगन्धर्वाः । ते ह्यन्तर्धानादिशक्तिसम्पन्नाः सूक्ष्मकार्यकरणाः । तस्मात्प्रतिघाताल्पत्वं तेषां द्वन्द्वप्रतिघातशक्तिसाधनसम्पत्तिश्च । ततोऽप्रतिहन्यमानस्य प्रतीकारवतो मनुष्यगन्धर्वस्य स्याच्चित्तप्रसादः । तत्प्रसादविशेषात्सुखविशेषाभिव्यक्तिः । एवं पूर्वस्याः पूर्वस्या भूमेरुत्तरस्यामुत्तरस्यां भूमौ प्रसादविशेषतः शतगुणेनानन्दोत्कर्ष उपपद्यते ।
प्रथमं त्वकामहताग्रहणं मनुष्यविषयभोगकामानभिहतस्य श्रोत्रियस्य मनुष्यानन्दाच्छतगुणेनानन्दोत्कर्षो मनुष्यगन्धर्वेण तुल्यो वक्तव्य इत्येवमर्थम् । साधुयुवाध्यायक इति श्रोत्रियत्वावृजिनत्वे गृह्येते । ते ह्यविशिष्टे सर्वत्र । अकामहतत्वं तु विषयोत्कर्षापकर्षतः सुखोत्कर्षापकर्षाय विशेष्यते । अतोऽकामहतग्रहणम्, तद्विशेषतः शतगुणसुखोत्कर्षोपलब्धेरकामहतत्वस्य परमानन्दप्राप्तिसाधनत्वविधानार्थम् । व्याख्यातमन्यत् ।
देवगन्धर्वा जातित एव । चिरलोकलोकानामिति पितॄणां विशेषणम् । चिरकालस्थायी लोको येषां पितॄणां ते चिरलोकलोका इति । आजान इति देवलोकस्तस्मिन्नाजाने जाता आजानजा देवाः स्मार्तकर्मविशेषतो देवस्थानेषु जाताः ।
कर्मदेवा ये वैदिकेन कर्मणाग्निहोत्रादिना केवलेन देवानपियन्ति । देवा इति त्रयस्त्रिंशद्धविर्भुजः । इन्द्रस्तेषां स्वामी तस्याचार्यो बृहस्पतिः । प्रजापतिर्विराट् । त्रैलोक्यशरीरो ब्रह्मा समष्टिव्यष्टिरूपः संसारमण्डलव्यापी ।
यत्रैत आनन्दभेदा एकतां गच्छन्ति धर्मश्च तन्निमित्तो ज्ञानं च तद्विषयमकामहतत्वं च निरतिशयं यत्र स एष हिरण्यगर्भो ब्रह्मा, तस्यैष आनन्दः श्रोत्रियेणावृजिनेनाकामहतेन च सर्वतः प्रत्यक्षमुपलभ्यते । तस्मादेतानि त्रीणि साधनानीत्यवगम्यते । तत्र श्रोत्रियत्वावृजिनत्वे नियते अकामहतत्वं तूत्कृष्यत इति प्रकृष्टसाधनतावगम्यते ।
तस्याकामहतत्वप्रकर्षतश्चोपलभ्यमानः श्रोत्रियप्रत्यक्षो ब्रह्मण आनन्दो यस्य परमानन्दस्य मात्रैकदेशः । “एतस्यैवानन्दस्यान्यानि भूतानि मात्रामुपजीवन्ति” (बृ० उ० ४ । ३ । ३२) इति श्रुत्यन्तरात् । स एष आनन्दो यस्य मात्राः समुद्राम्भस इव विप्रुषः प्रविभक्ता यत्रैकतां गताः स एष परमानन्दः स्वाभाविकोऽद्वैतवादानन्दानन्दिनोश्चाविभागोऽत्र ॥ १—४ ॥
ब्रह्मात्मैक्य-दृष्टिका उपसंहार
स य एवंविदस्माल्लोकात्प्रेत्य ।
एतमन्नमयमात्मानमुपसंक्रामति ।
एतं प्राणमयमात्मानमुपसंक्रामति ।
एतं मनोमयमात्मानमुपसंक्रामति ।
एतं
sa yaścāyaṃ puruṣe yaścāsāvāditye sa ekaḥ .
sa ya evaṃvidasmāllokātpretya .
etamannamayamātmānamupasaṃkrāmati .
etaṃ prāṇamayamātmānamupasaṃkrāmati .
etaṃ manomayamātmānamupasaṃkrāmati .
etaṃ