वल्ली 2 अनुवाक 8 - मन्त्र 5

विज्ञानमयमात्मानमुपसंक्रामति ।
एतमानन्दमयमात्मानमुपसंक्रामति ।
तदप्येष श्लोको भवति ॥ ५ ॥

vijñānamayamātmānamupasaṃkrāmati .
etamānandamayamātmānamupasaṃkrāmati .
tadapyeṣa śloko bhavati .. 5 ..


वह, जो कि इस पुरुष (पञ्चकोशात्मक देह)-में है और जो यह आदित्य के अन्तर्गत है, एक है । वह, जो इस प्रकार जाननेवाला है, इस लोक (दृष्ट और अदृष्ट विषयसमूह)-से निवृत्त होकर इस अन्नमय आत्मा को प्राप्त होता है [अर्थात् विषयसमूह को अन्नमय कोश से पृथक् नहीं देखता] । इसी प्रकार वह इस प्राणमय आत्मा को प्राप्त होता है, इस मनोमय आत्मा को प्राप्त होता है, इस विज्ञानमय आत्मा को प्राप्त होता है एवं इस आनन्दमय आत्मा को प्राप्त होता है । उसीके विषय में यह श्लोक है ॥ ५ ॥

जो आकाश से लेकर अन्नमय कोशपर्यन्त कार्य की रचना करके उसमें अनुप्रविष्ट हुआ परमाकाश के भीतर बुद्धिरूप गुहा में स्थित है उसी का ‘स यः’ (वह जो) इन पदों द्वारा निर्देश किया जाता है । वह कौन है? जो इस पुरुष में है और जो श्रोत्रिय के लिये प्रत्यक्ष बतलाया हुआ परमानन्द आदित्य में है; जिसके एक देश के आश्रय से ही सुख के पात्रीभूत ब्रह्मा आदि जीव जीवन धारण करते हैं उसी आनन्द को ‘स यश्चासावादित्ये’ इन पदों द्वारा निर्दिष्ट किया जाता है । भिन्नप्रदेशस्थ घटाकाश और महाकाश के एकत्व के समान [उन दोनों उपाधियों में स्थित] वह आनन्द एक है ।

शंका—किन्तु उस आनन्द का निर्देश करने में ‘वह जो इस पुरुष में है’ इस प्रकार सामान्यरूप से अध्यात्म पुरुष का निर्देश करना उचित नहीं है, बल्कि ‘जो इस दक्षिण नेत्र में है’ इस प्रकार कहना ही उचित है, क्योंकि ऐसा ही प्रसिद्ध है ।

समाधान—नहीं, क्योंकि यहाँ पर आत्मा का अधिकरण है । ‘अदृश्येऽनात्म्ये’ ‘भीषास्माद्वातः पवते’ तथा ‘सैषानन्दस्य मीमांसा’ आदि वाक्यों के अनुसार यहाँ परमात्मा का ही प्रकरण है । अतः जिसका कोई प्रसंग नहीं है उस [दक्षिणनेत्रस्थ पुरुष] - का अकस्मात् निर्देश करना उचित नहीं है । यहाँ परमात्मा का विज्ञान वर्णन करना ही अभीष्ट है; इसलिये ‘वह एक है’ इस वाक्य से परमात्मा का ही निर्देश किया जाता है ।

शंका—यहाँ तो आनन्द की मीमांसा का प्रकरण है, इसलिये उसके फल का उपसंहार भी करना ही चाहिये, क्योंकि अखण्ड और स्वाभाविक आनन्द परमात्मा ही है, वह विषय और विषयी के सम्बन्ध से होनेवाला आनन्द नहीं है ।

मध्यस्थ—‘जो आनन्द इस पुरुष में है और जो इस आदित्य में है वह एक है’ इस प्रकार भिन्न आश्रयोंमें स्थित विशेषका निराकरण करके जो निर्देश किया गया है वह तो इस प्रसंगके अनुरूप ही है ।

शंका—किन्तु, इस प्रकार भी ‘आदित्य’ इस विशेष पदार्थका ग्रहण करना व्यर्थ ही है ।

समाधान—उत्कर्ष और अपकर्षका निषेध करनेके लिये होनेके कारण यह व्यर्थ नहीं है । मूर्त और अमूर्तरूप द्वैतका परम उत्कर्ष सूर्यके अन्तर्गत है; वह यदि पुरुषगत विशेषके बाधद्वारा परमानन्दकी अपेक्षा उसके तुल्य ही सिद्ध होता है तो उस गतिको प्राप्त हुए पुरुषका कोई उत्कर्ष या अपकर्ष नहीं रहता और वह निर्भय स्थितिको प्राप्त कर लेता है; अतः यह कथन उचित ही है ।

ब्रह्म है या नहीं—इस अनुप्रश्नकी व्याख्या कर दी गयी । कार्यरूप रसकी प्राप्ति, प्राणन, अभय-प्रतिष्ठा और भयदर्शन आदि युक्तियोंसे वह आकाशादिका कारणरूप ब्रह्म है ही—इस प्रकार एक अनुप्रश्नका निराकरण किया गया । दूसरे दो अनुप्रश्न विद्वान् और अविद्वान्की ब्रह्मप्राप्ति और ब्रह्मकी अप्राप्तिके विषयमें हैं । उनमें अन्तिम अनुप्रश्न यही है कि ‘विद्वान् ब्रह्मको प्राप्त होता है या नहीं? '

उसका निराकरण करनेके लिये कहा जाता है । मध्यम अनुप्रश्नका निराकरण तो अन्तिमके निराकरणसे ही हो जायगा; इसलिये उसके निराकरणका यत्न नहीं किया जाता ।

इस प्रकार जो कोई उत्कर्ष और अपकर्षको त्यागकर ‘मैं ही उपर्युक्त सत्य ज्ञान और अनन्तरूप अद्वैत ब्रह्म हूँ’ ऐसा जानता है वह एवंवित् (इस प्रकार जाननेवाला) है, क्योंकि ‘एवम्’ शब्द प्रसंगमें आये हुए पदार्थका परामर्श (निर्देश) करनेके लिये हुआ करता है । वह एवंवित् क्या [करता है? ] इस लोकसे जाकर—दृष्ट और अदृष्ट इष्ट विषयोंका समुदाय ही यह लोक है, उस इस लोकसे प्रेत्य—प्रत्यावर्तन करके (लौटकर) अर्थात् उससे निरपेक्ष होकर इस ऊपर व्याख्या किये हुए अन्नमय आत्माको प्राप्त होता है । अर्थात् वह विषयसमूहको अन्नमय शरीरसे भिन्न नहीं देखता; तात्पर्य यह है कि सम्पूर्ण स्थूल भूतवर्गको अन्नमय शरीर ही समझता है ।

उसके भीतर वह सम्पूर्ण अन्नमय कोशोंमें स्थित विभागहीन प्राणमय आत्माको देखता है और फिर क्रमशः इस मनोमय, विज्ञानमय और आनन्दमय आत्माको प्राप्त होता है । तत्पश्चात् वह इस अदृश्य, अशरीर, अनिर्वचनीय और अनाश्रय आत्मामें अभयस्थिति प्राप्त कर लेता है ।

अब यहाँ यह विचारना है कि यह इस प्रकार जाननेवाला है कौन? और यह किस प्रकार संक्रमण करता है? वह संक्रमणकर्ता परमात्मासे भिन्न है अथवा स्वयं वही है ।

पूर्व०—इस विचारसे लाभ क्या है?

सिद्धान्ती—यदि वह उससे भिन्न है तो “उसे रचकर उसीमें अनुप्रविष्ट हो गया” “यह अन्य है और मैं अन्य हूँ—इस प्रकार जो कहता है वह नहीं जानता” “एक ही अद्वितीय” “तू वह है” इत्यादि श्रुतियोंसे विरोध होगा । और यदि वह स्वयं ही आनन्दमय आत्माको प्राप्त होता है तो उस [एक ही]-में कर्म और कर्तापन दोनोंका होना असम्भव है, तथा परमात्माको ही संसारित्वकी प्राप्ति अथवा उसके परमात्मत्वका अभाव सिद्ध होता है ।

पूर्व०—यदि दोनों ही अवस्थाओंमें प्राप्त होनेवाले दोषका परिहार नहीं किया जा सकता तो उसका विचार करना व्यर्थ है और यदि किसी एक पक्षको स्वीकार कर लेनेसे दोषकी प्राप्ति नहीं होती अथवा कोई तीसरा निर्दोष पक्ष हो तो उसे ही शास्त्रका आशय समझना चाहिये । ऐसी अवस्थामें भी विचार करना व्यर्थ ही होगा ।

सिद्धान्ती—नहीं, क्योंकि यह उसका निश्चय करनेके लिये है । यह ठीक है कि इस प्रकार प्राप्त होनेवाला दोष निवृत्त नहीं किया जा सकता तथा उपर्युक्त दोनों पक्षोंमेंसे किसी एकका अथवा किसी तीसरे निर्दोष पक्षका निश्चय हो जानेपर भी यह विचार व्यर्थ ही होगा । किन्तु उस पक्षका निश्चय तो नहीं हुआ है; अतः उसका निश्चय करनेके लिये होनेके कारण यह विचार सार्थक ही है ।

पूर्व०—शास्त्रके तात्पर्यका निश्चय करनेके लिये होनेसे तो सचमुच यह विचार सार्थक है, परन्तु तू तो केवल विचार ही करता है, निर्णय तो कुछ करेगा नहीं ।

सिद्धान्ती—निर्णय नहीं करना चाहिये—ऐसा क्या कोई वेदवाक्य है?

पूर्व०—नहीं ।

सिद्धान्ती—तो फिर निर्णय क्यों नहीं होगा?

पूर्व०—क्योंकि तेरा प्रतिपक्ष बहुत है । वेदार्थपरायण होनेके कारण तू तो एकत्ववादी है किन्तु तेरे प्रतिपक्षी वेदबाह्य नानात्ववादी बहुत हैं । इसलिये मुझे सन्देह है कि तू मेरी शङ्काका निर्णय नहीं कर सकेगा ।

सिद्धान्ती—तूने जो मुझे बहुत-से अनेकत्ववादी प्रतिपक्षियोंसे युक्त एकत्ववादी बतलाया है—यही बड़े मंगलकी बात है । अतः अब मैं सबको जीत लूँगा; ले, मैं विचार आरम्भ करता हूँ ।

वह संक्रमणकर्ता परमात्मा ही है, क्योंकि यहाँ जीवको परमात्मभावकी प्राप्ति बतलानी अभीष्ट है । ‘ब्रह्मवेत्ता परमात्माको प्राप्त कर लेता है’ इस वाक्यके अनुसार यहाँ ब्रह्मविज्ञानसे परमात्मभावकी प्राप्ति होती है—यही प्रतिपादन करना इष्ट है । किसी अन्य पदार्थका अन्य पदार्थभावको प्राप्त होना सम्भव नहीं है । यदि कहो कि उसका स्वयं अपने स्वरूपको प्राप्त होना भी असम्भव ही है, तो ऐसी बात नहीं है; क्योंकि यह कथन केवल अविद्यासे आरोपित अनात्म पदार्थोंका निषेध करनेके लिये ही है । [तात्पर्य यह है कि] ब्रह्मविद्याके द्वारा जो अपने आत्मस्वरूपकी प्राप्तिका उपदेश किया जाता है वह अविद्याकृत अन्नमयादि कोशरूप विशेषात्माका अर्थात् आत्मभावसे आरोपित किये हुए अनात्माका निषेध करनेके लिये ही है ।

पूर्व०—उसका इस प्रयोजनके लिये होना कैसे जाना जाता है?

सिद्धान्ती—केवल ज्ञानका ही उपदेश किया जानेके कारण । अज्ञानकी निवृत्ति—यह ज्ञानका प्रत्यक्ष कार्य है, और यहाँ आत्माकी प्राप्तिमें वह ज्ञान ही साधन बतलाया गया है ।

पूर्व०—यदि वह मार्गविज्ञानके उपदेशके समान हो तो? [अब इसीकी व्याख्या करते हैं—] केवल ज्ञानका ही साधनरूपसे उपदेश किया जाना उसकी परमात्मरूपतामें कारण नहीं हो सकता । ऐसा क्यों है? क्योंकि देशान्तरकी प्राप्तिके लिये भी मार्गविज्ञानका उपदेश होता देखा गया है । ऐसी अवस्थामें ग्राम ही गमन करनेवाला नहीं हुआ करता—ऐसा माने तो?

सिद्धान्ती—ऐसा कहना ठीक नहीं क्योंकि वे दोनों समान धर्मवाले नहीं हैं । [तुमने जो दृष्टान्त दिया है] उसमें ग्रामविषयक विज्ञानका उपदेश नहीं दिया जाता, केवल उसकी प्राप्तिके मार्गसे सम्बन्धित विज्ञानका ही उपदेश किया जाता है । उसके समान इस प्रसङ्गमें ब्रह्मविज्ञानसे भिन्न किसी अन्य साधनसम्बन्धी विज्ञानका उपदेश नहीं किया जाता ।

यदि कहो कि [पूर्वकाण्डमें] कहे हुए कर्मकी अपेक्षावाला ब्रह्मज्ञान परमात्माकी प्राप्तिमें साधनरूपसे उपदेश किया जाता है, तो ऐसी बात भी नहीं है, क्योंकि मोक्ष नित्य है—इत्यादि हेतुओंसे इसका पहले ही निराकरण किया जा चुका है । ‘उसे रचकर वह उसीमें अनुप्रविष्ट हो गया’ यह श्रुति भी कार्यमें स्थित आत्माका परमात्मत्व प्रदर्शित करती है । अभय-प्रतिष्ठाकी उपपत्तिके कारण भी [उनका अभेद ही मानना चाहिये] । यदि ज्ञानी अपनेसे भिन्न किसी औरको नहीं देखता तो वह अभयस्थितिको प्राप्त कर लेता है—ऐसा कहा जा सकता है, क्योंकि उस अवस्थामें भयके हेतुभूत अन्य पदार्थकी सत्ता नहीं रहती । अन्य पदार्थ [अर्थात् द्वैत]-के अविद्याकृत होनेपर ही विद्याके द्वारा उसके अवस्तुत्व दर्शनकी उपपत्ति हो सकती है । [भ्रान्तिवश प्रतीत होनेवाले] द्वितीय चन्द्रमाकी वास्तविकता यही है कि वह तिमिररोगरहित नेत्रोंवाले पुरुषद्वारा ग्रहण नहीं किया जाता ।

पूर्व०—परन्तु द्वैतका ग्रहण न होता हो—ऐसी बात तो है नहीं ।

सिद्धान्ती—ऐसा मत कहो, क्योंकि सोये हुए और समाधिस्थ पुरुषको उसका ग्रहण नहीं होता ।

पूर्व०—किन्तु सुषुप्तिमें जो द्वैतका अग्रहण है वह तो विषयान्तरमें आसक्तचित्त पुरुषके अग्रहणके समान है?

सिद्धान्ती—नहीं, क्योंकि उस समय तो सभी पदार्थोंका अग्रहण है [फिर वह अन्यासक्तचित्त कैसे कहा जा सकता है? ] यदि कहो कि जाग्रत् और स्वप्नावस्थामें अन्य पदार्थोंका ग्रहण होनेसे उनकी सत्ता है ही, तो ऐसा कहना भी ठीक नहीं; क्योंकि जाग्रत् और स्वप्न अविद्याकृत हैं । जाग्रत् और स्वप्नमें जो अन्य पदार्थका ग्रहण है वह अविद्याके कारण है, क्योंकि अविद्याकी निवृत्ति होनेपर उसका अभाव हो जाता है?

पूर्व०—सुषुप्तिमें जो अग्रहण है वह भी तो अविद्याके ही कारण है ।

सिद्धान्ती—नहीं, क्योंकि वह तो स्वाभाविक है । द्रव्यका तात्त्विक स्वरूप तो विकार न होना ही है, क्योंकि उसे दूसरेकी अपेक्षा नहीं होती । दूसरेकी अपेक्षावाला होनेके कारण विकार तत्त्व नहीं है । जो कर्ता, कर्म, करण आदि कारकोंकी अपेक्षावाला होता है वह वस्तुका तत्त्व नहीं होता । विद्यमान वस्तुका विशेष रूप कारकोंकी अपेक्षावाला होता है, और विशेष ही विकार होता है । जाग्रत् और स्वप्नका जो ग्रहण है वह भी विशेष ही है । जिसका जो रूप अन्यकी अपेक्षासे रहित होता है वही उसका तत्त्व होता है और जो अन्यकी अपेक्षावाला होता है वह तत्त्व नहीं होता, क्योंकि उस अन्यका अभाव होनेपर उसका भी अभाव हो जाता है । अतः [सुषुप्तावस्था] स्वाभाविक होनेके कारण उस समय जाग्रत् और स्वप्नके समान विशेषकी सत्ता नहीं है ।

किन्तु जिनके मतमें ईश्वर आत्मासे भिन्न है और उसका कार्यरूप यह जगत् भी भिन्न है उनके भयकी निवृत्ति नहीं हो सकती, क्योंकि भय दूसरेके ही कारण हुआ करता है । अन्य पदार्थ यदि सत् होगा तब तो उसके स्वरूपका अभाव नहीं हो सकता और यदि असत् होगा तो उसके स्वरूपकी सिद्धि ही नहीं हो सकती । यदि कहो कि दूसरा (ईश्वर) तो [हमारे धर्माधर्म आदिकी] अपेक्षासे ही भयका कारण है, तो ऐसा कहना भी ठीक नहीं, क्योंकि वह [सापेक्ष ईश्वर] भी वैसा ही है । जो कोई [ईश्वरादि] दूसरा पदार्थ नित्य या अनित्य अधर्मादिरूप सहायक निमित्तकी अपेक्षासे भयका कारण होता है, यथार्थ होनेके कारण उसके स्वरूपका भी अभाव न होनेसे उसके भयकी निवृत्ति नहीं हो सकती; और यदि उसके स्वरूपका अभाव माना जाय तो सत् और असत्को इतरेतरत्व [अर्थात् सत्को असत्त्व और असत्को सत्त्व]-की प्राप्ति होनेसे कहीं विश्वास ही नहीं किया जा सकता ।

परन्तु एकत्व-पक्ष स्वीकार करनेपर तो सारा संसार अपने कारणके सहित अविद्याकल्पित होनेके कारण कोई दोष ही नहीं आता । तिमिर रोगके कारण देखे गये द्वितीय चन्द्रमाके स्वरूपकी न तो प्राप्ति ही होती है और न नाश ही । यदि कहो कि ज्ञान और अज्ञान तो आत्माके ही धर्म हैं [इसलिये उनके कारण आत्माका विकार होता होगा] तो ऐसा कहना ठीक नहीं क्योंकि वे तो प्रत्यक्ष (आत्माके दृश्य) हैं । रूप आदि विषयोंके समान अन्तःकरणमें स्थित विवेक और अविवेक प्रत्यक्ष उपलब्ध होते हैं । प्रत्यक्ष उपलब्ध होनेवाला रूप द्रष्टाका धर्म नहीं हो सकता । ‘मैं मूढ़ हूँ, मेरी बुद्धि मलिन है’ इस प्रकार अविद्या भी अपने अनुभवके द्वारा निरूपण की जाती है ।

इसी प्रकार विद्या का पार्थक्य भी अनुभव किया जाता है । बुद्धिमान् लोग दूसरों को अपने ज्ञान का उपदेश किया करते हैं । तथा दूसरे लोग भी उसका निश्चय करते हैं । अतः विद्या और अविद्या नाम-रूप पक्ष के ही हैं, तथा नाम और रूप आत्मा के धर्म नहीं हैं, जैसा कि “जो नाम और रूप का निर्वाह करनेवाला है तथा जिसके भीतर वे (नाम और रूप) रहते हैं” वह ब्रह्म है, इस अन्य श्रुति से सिद्ध होता है । वे नाम-रूप भी सूर्य में दिन और रात्रि के समान कल्पित ही हैं, वस्तुतः विद्यमान नहीं हैं ।

पूर्व०—किन्तु [ईश्वर और जीव का] अभेद मानने पर तो “वह इस आनन्दमय आत्मा को प्राप्त होता है” इस श्रुति में जो [पुरुष का] कर्तृत्व और [आनन्दमय आत्मा का] कर्मत्व बताया है वह उपपन्न नहीं होता?

सिद्धान्ती—नहीं, क्योंकि पुरुष का संक्रमण तो केवल विज्ञानमात्र है । यहाँ जोंक आदि के संक्रमण के समान पुरुष के संक्रमण का उपदेश नहीं किया जाता । तो कैसा? इस संक्रमण-श्रुति का अर्थ तो केवल विज्ञानमात्र है । पूर्व०—‘उपसंक्रामति’ इस पद से यहाँ मुख्य संक्रमण (समीप जाना) ही अभिप्रेत हो तो?

सिद्धान्ती—नहीं, क्योंकि अन्नमय में मुख्य संक्रमण देखा नहीं जाता—अन्नमय को उपसंक्रमण करनेवाले का जोंक के समान इस बाह्य जगत् से अथवा किसी और प्रकार से संक्रमण नहीं देखा जाता ।

पूर्व०—बाहर [निकलकर विषयों में] गये हुए मनोमय अथवा विज्ञानमय कोशों का तो वहाँ से पुनः लौटने पर अपनी ओर होना संक्रमण हो ही सकता है?

सिद्धान्ती—नहीं, क्योंकि इससे अपने में ही अपनी क्रिया होना—यह विरोध उपस्थित होता है । अन्नमय से भिन्न पुरुष अपने से भिन्न अन्नमय को प्राप्त होता है—इस प्रकार प्रकरण का आरम्भ करके अब ‘मनोमय अथवा विज्ञानमय अपने को ही प्राप्त होता है’ ऐसा कहने में उससे विरोध आता है । इसी प्रकार आनन्दमय का भी अपने को प्राप्त होना सम्भव नहीं है; अतः प्राप्ति का नाम संक्रमण नहीं है और न वह अन्नमयादि में से किसी के द्वारा किया जाता है । फलतः आत्मा से भिन्न अन्नमय से लेकर आनन्दमयकोशपर्यन्त जिसका कर्ता है वह ज्ञानमात्र ही संक्रमण होना सम्भव है ।

इस प्रकार ‘संक्रमण’ शब्द का अर्थ ज्ञानमात्र होने पर ही आनन्दमय कोश के भीतर स्थित सर्वान्तर तथा आकाश से लेकर अन्नमयकोशपर्यन्त कार्यवर्ग को रचकर उसमें अनुप्रविष्ट हुए आत्मा का जो हृदयगुहा के सम्बन्ध से अन्नमय आदि अनात्माओं में आत्मत्व का भ्रम है वह संक्रमणस्वरूप विवेक ज्ञान की उत्पत्ति से नष्ट हो जाता है । अतः इस अविद्यारूप भ्रम के नाश में ही संक्रमण शब्द का उपचार (गौणरूप)-से प्रयोग किया गया है; इसके सिवा किसी और प्रकार सर्वगत आत्मा का संक्रमण होना सम्भव नहीं है ।

आत्मा से भिन्न अन्य वस्तु का अभाव होने से भी [उसका किसी के प्रति जानारूप संक्रमण नहीं हो सकता] । अपना अपने को ही प्राप्त होना तो सम्भव नहीं है । जोंक अपने प्रति ही संक्रमण (गमन) नहीं करती । अतः ‘ब्रह्म सत्यस्वरूप, ज्ञानस्वरूप और अनन्त है’ इस पूर्वोक्त लक्षणवाले आत्मा के ज्ञान के लिये ही सम्पूर्ण व्यवहार के आधारभूत ब्रह्म में अनेक होना, सृष्टि में अनुप्रवेश करना, आनन्द की प्राप्ति, अभय और संक्रमणादि की कल्पना की गयी है; परमार्थतः तो निर्विकल्प ब्रह्म में कोई विकल्प होना सम्भव है नहीं ।

इस प्रकार क्रमशः उस इस निर्विकल्प आत्मा के प्रति उपसंक्रमणकर अर्थात् उसे जानकर साधक किसी से भयभीत नहीं होता । वह अभयस्थिति प्राप्त कर लेता है । इसी अर्थ में यह श्लोक भी है । इस सम्पूर्ण प्रकरण के अर्थात् आनन्दवल्ली के अर्थ को संक्षेप से प्रकाशित करने के लिये ही यह मन्त्र है ॥ ५ ॥

संस्कृत भाष्य पढ़ें

यो गुहायां निहितः परमे व्योम्न्याकाशादिब्रह्मात्मैक्योप- कार्यं सृष्ट्वान्नमयान्तं संहारः तदेवानुप्रविष्टः स य इति निर्दिश्यते । कोऽसौ? अयं पुरुषे, यश्चासावादित्ये यः परमानन्दः श्रोत्रियप्रत्यक्षो निर्दिष्टो यस्यैकदेशं ब्रह्मादीनि भूतानि सुखार्हाण्युपजीवन्ति स यश्चासावादित्य इति निर्दिश्यते । स एको भिन्नप्रदेशस्थघटाकाशैकत्ववत् ।

ननु तन्निर्देशे स यश्चायं पुरुष इत्यविशेषतोऽध्यात्मं न युक्तो निर्देशः, यश्चायं दक्षिणेऽक्षन्निति तु युक्तः, प्रसिद्धत्वात् ।

न, पराधिकारात् । परो ह्यात्मात्राधिकृतोऽदृश्येऽनात्म्ये भीषास्माद्वातः पवते सैषानन्दस्य मीमांसेति । न ह्यकस्मादप्रकृतो युक्तो निर्देष्टुम् । परमात्मविज्ञानं च विवक्षितम् । तस्मात्पर एव निर्दिश्यते ‘स एकः’ इति ।

नन्वानन्दस्य मीमांसा प्रकृता तस्या अपि फलमुपसंहर्तव्यम् । अभिन्नः स्वाभाविक आनन्दः परमात्मैव न विषयविषयिसम्बन्धजनित इति ।

ननु तदनुरूप एवायं निर्देशः ‘स यश्चायं पुरुषे यश्चासावादित्ये स एकः’ इति भिन्नाधिकरणस्थविशेषोपमर्देन ।

नन्वेवमप्यादित्यविशेषग्रहणमनर्थकम् ।

नानर्थकम्, उत्कर्षापकर्षापोहार्थत्वात् । द्वैतस्य हि मूर्तामूर्तलक्षणस्य पर उत्कर्षः सवित्रभ्यन्तर्गतः स चेत्पुरुषगतविशेषोपमर्देन परमानन्दमपेक्ष्य समो भवति न कश्चिदुत्कर्षोऽपकर्षो वा तां गतिं गतस्येत्यभयं प्रतिष्ठां विन्दत इत्युपपन्नम् ।

अस्ति नास्तीत्यनुप्रश्नो व्याख्यातः ।

द्वितीयानुप्रश्न- कार्यरसलाभविचारः प्राणनाभयप्रतिष्ठाभयदर्शनोपपत्तिभ्योऽस्त्येव तदाकाशादिकारणं ब्रह्मेत्यपाकृतोऽनुप्रश्न एकः । द्वावन्यावनुप्रश्नौ विद्वदविदुषोर्ब्रह्मप्राप्त्यप्राप्तिविषयौ तत्र विद्वान्समश्नुते न समश्नुत इत्यनुप्रश्नोऽन्त्यस्त- दपाकरणायोच्यते । मध्यमोऽनुप्रश्नोऽन्त्यापाकरणादेवापाकृत इति तदपाकरणाय न यत्यते ।

स यः कश्चिदेवं यथोक्तं ब्रह्म उत्सृज्योत्कर्षापकर्षमद्वैतं सत्यं ज्ञानमनन्तमस्मीत्येवं वेत्तीत्येवंवित् । एवंशब्दस्य प्रकृतपरामर्शार्थत्वात् । स किम्? अस्माल्लोकात्प्रेत्य दृष्टादृष्टेष्टविषयसमुदायो ह्ययं लोकस्तस्माल्लोकात्प्रेत्य प्रत्यावृत्य निरपेक्षो भूत्वैतं यथाव्याख्यातमन्नमयमात्मानमुपसंक्रामति । विषयजातमन्नमयात्पिण्डात्मनो व्यतिरिक्तं न पश्यति । सर्वं स्थूलभूतमन्नमयमात्मानं पश्यतीत्यर्थः ।

ततोऽभ्यन्तरमेतं प्राणमयं सर्वान्नंमयात्मस्थमविभक्तम् । अथैतं मनोमयं विज्ञानमय- मानन्दमयमात्मानमुपसंक्रामति । अथादृश्येऽनात्म्येऽनिरुक्तेऽनिलयनेऽभयं प्रतिष्ठां विन्दते ।

तत्रैतच्चिन्त्यम् । कोऽयमेवंतृतीयानुप्रश्न- वित्कथं वा संक्रामविचारः तीति । किं परस्मादात्मनोऽन्यः संक्रमणकर्ता प्रविभक्त उत स एवेति ।

किं ततः?

यद्यन्यः स्याच्छ्रुतिविरोधः । “तत्सृष्ट्वा तदेवानुप्राविशत्” (तै० उ० २ । ६ । १) “अन्योऽसावन्योऽहमस्मीति । न स वेद” (बृ० उ० १ । ४ । १०) “एकमेवाद्वितीयम्” (छा० उ० ६ । २ । १) “तत्त्वमसि” (छा० उ० ६ । ८—१६) इति । अथ स एव, आनन्दमयमात्मानमुपसंक्रामतीति कर्मकर्तृत्वानुपपत्तिः, परस्यैव च संसारित्वं पराभावो वा ।

यद्युभयथा प्राप्तो दोषो न परिहर्तुं शक्यत इति व्यर्था चिन्ता । अथान्यतरस्मिन्पक्षे दोषाप्राप्तिस्तृतीये वा पक्षेऽदुष्टे स एव शास्त्रार्थ इति व्यर्थैव चिन्ता ।

न; तन्निर्धारणार्थत्वात् । सत्यं प्राप्तो दोषो न शक्यः परिहर्तुमन्यतरस्मिंस्तृतीये वा पक्षेऽदुष्टेऽवधृते व्यर्था चिन्ता स्यान्न तु सोऽवधृत इति तदवधारणार्थत्वादर्थवत्येवैषा चिन्ता ।

सत्यमर्थवती चिन्ता शास्त्रार्थावधारणार्थत्वात् । चिन्तयसि च त्वं न तु निर्णेष्यसि ।

किं न निर्णेतव्यमिति वेदवचनम्?

न ।

कथं तर्हि?

बहुप्रतिपक्षत्वात् । एकत्ववादी त्वम्, वेदार्थपरत्वाद्, बहवो हि नानात्ववादिनो वेदबाह्यास्त्वत्प्रतिपक्षाः । अतो ममाशङ्कां न निर्णेष्यसीति ।

एतदेव मे स्वस्त्ययनं यन्मामेकयोगिनमनेकयोगिबहुप्रतिपक्षमात्थ । अतो जेष्यामि सर्वान्; आरभे च चिन्ताम् ।

स एव तु स्यात्तद्भावस्य विवक्षितत्वात् । तद्विज्ञानेन परमात्मभावो ह्यत्र विवक्षितो ब्रह्मविदाप्नोति परमिति । न ह्यन्यस्यान्यभावापत्तिरुपपद्यते । ननु तस्यापि तद्भावापत्तिरनुपपन्नैव? न; अविद्याकृततादात्म्यापोहार्थत्वात् । या हि ब्रह्मविद्यया स्वात्मप्राप्तिरुपदिश्यते साविद्याकृतस्यान्नादिविशेषात्मन आत्मत्वेनाध्यारोपितस्यानात्मनोऽपोहार्था ।

कथमेवमर्थतावगम्यते?

विद्यामात्रोपदेशात् । विद्यायाश्च दृष्टं कार्यमविद्यानिवृत्तिस्तच्चेह विद्यामात्रमात्मप्राप्तौ साधनमुपदिश्यते ।

मार्गविज्ञानोपदेशवदिति चेत्तदात्मत्वे विद्यामात्रसाधनोपदेशोऽहेतुः । कस्मात्? देशान्तरप्राप्तौ मार्गविज्ञानोपदेशदर्शनात् । न हि ग्राम एव गन्तेति चेत्?

न, वैधर्म्यात् । तत्र हि ग्रामविषयं विज्ञानं नोपदिश्यते । तत्प्राप्तिमार्गविषयमेवोपदिश्यते ।

विज्ञानम् । न तथेह ब्रह्मविज्ञानं व्यतिरेकेण साधनान्तरविषयं विज्ञानमुपदिश्यते ।

उक्तकर्मादिसाधनापेक्षं ब्रह्मविज्ञानं परप्राप्तौ साधनमुपदिश्यत इति चेन्न; नित्यत्वान्मोक्षस्येत्यादिना प्रत्युक्तत्वात् । श्रुतिश्च तत्सृष्ट्वा तदेवानुप्राविशदिति कार्यस्थस्य तदात्मत्वं दर्शयति । अभयप्रतिष्ठोपपत्तेश्च । यदि हि विद्यावान्स्वात्मनोऽन्यन्न पश्यति ततोऽभयं प्रतिष्ठां विन्दत इति स्याद्भयहेतोः परस्यान्यस्याभावात् । अन्यस्य चाविद्याकृतत्वे विद्ययावस्तुत्वदर्शनोपपत्तिस्तद्धि द्वितीयस्य चन्द्रस्य सत्त्वं यदतैमिरिकेण चक्षुष्मता न गृह्यते ।

नैवं न गृह्यत इति चेत्?

न, सुषुप्तसमाहितयोरग्रहणात् ।

सुषुप्तेऽग्रहणमन्यासक्तवदिति चेत्?

न, सर्वाग्रहणात् । जाग्रत्स्वप्नयोरन्यस्य ग्रहणात्सत्त्वमेवेति चेन्न; अविद्याकृतत्वाज्जाग्रत्स्वप्नयोः; यदन्यग्रहणं जाग्रत्स्वप्नयोस्तदविद्याकृतमविद्याभावेऽभावात् ।

सुषुप्तेऽग्रहणमप्यविद्याकृतमिति चेत्?

न, स्वाभाविकत्वात् । द्रव्यस्य वस्तुनस्तात्त्विक- हि तत्त्वमविक्रिया विशेषरूपयो- परानपेक्षत्वात् । र्निर्वचनम् विक्रिया न तत्त्वं परापेक्षत्वात् । न हि कारकापेक्षं वस्तुनस्तत्त्वम् । सतो विशेषः कारकापेक्षः, विशेषश्च विक्रिया । जाग्रत्स्वप्नयोश्च ग्रहणं विशेषः । यद्धि यस्य नान्यापेक्षं स्वरूपं तत्तस्य तत्त्वम्, यदन्यापेक्षं न तत्तत्त्वम्; अन्याभावेऽभावात् । तस्मात्स्वाभाविकत्वाज्जाग्रत्स्वप्नवन्न सुषुप्ते विशेषः ।

येषां पुनरीश्वरोऽन्य आत्मनः भेददृष्टे- कार्यं चान्यत्तेषां भयहेतुत्वम् भयानिवृत्तिर्भयस्यान्यनिमित्तत्वात् । सतश्चान्यस्यात्महानानुपपत्तिः । न चासत आत्मलाभः । सापेक्षस्यान्यस्य भयहेतुत्वमिति चेन्न, तस्यापि तुल्यत्वात् । यदधर्माद्यनुसहायीभूतं नित्यमनित्यं वा निमित्तमपेक्ष्यान्यद्भयकारणं स्यात्तस्यापि तथाभूतस्यात्महानाभावान्द्भयानिवृत्तिः आत्महाने वा सदसतोरितरेतरापत्तौ सर्वत्रानाश्वास एव ।

एकत्वपक्षे पुनः सनिमित्तस्य ज्ञानाज्ञानयो- संसारस्य अविद्यार्नात्मधर्मत्वम् कल्पितत्वाददोषः तैमिरिकदृष्टस्य हि द्वितीयचन्द्रस्य नात्मलाभो नाशो वास्ति । विद्याविद्ययोस्तद्धर्मत्वमिति चेन्न प्रत्यक्षत्वात् । विवेकाविवेको रूपादिवत्प्रत्यक्षावुपलभ्येते अन्तःकरणस्थौ । न हि रूपस्य प्रत्यक्षस्य सतो द्रष्टृधर्मत्वम् । अविद्या च स्वानुभवेन रूप्यते मूढोऽहमविविक्तं मम विज्ञानमिति ।

तथा विद्याविवेकोऽनुभूयते । उपदिशन्ति चान्येभ्य आत्मनो विद्याम् । तथा चान्येऽवधारयन्ति । तस्मान्नामरूपपक्षस्यैव विद्याविद्ये नामरूपे च नात्मधर्मौ । “नामरूपयोर्निर्वहिता ते यदन्तरा तद्ब्रह्म” (छा० उ० ८ । १४ । १) इति श्रुत्यन्तरात् । ते च पुनर्नामरूपे सवितर्यहोरात्रे इव कल्पिते न परमार्थतो विद्यमाने ।

अभेदे “एतमानन्दमयमात्मानमुपसंक्रामति” (तै० उ० २ । ८ । ५) इति कर्मकर्तृत्वानुपपत्तिरिति चेत्?

न; विज्ञानमात्रत्वात्संक्रमणस्य ।

न जलूकादिवसंक्रमणशब्द- त्संक्रमणमिहोपतात्पर्यम् दिश्यते, किं तर्हि? विज्ञानमात्रं संक्रमणश्रुतेरर्थः ।

ननु मुख्यमेव संक्रमणं श्रूयत उपसंक्रामतीति चेत्?

न; अन्नमयेऽदर्शनात् । न ह्यन्नमयमुपसंक्रामतो बाह्यादस्माल्लोकाज्जलूकावत्संक्रमणं दृश्यतेऽन्यथा वा ।

मनोमयस्य बहिर्निर्गतस्य विज्ञानमयस्य वा पुनः प्रत्यावृत्त्यात्मसंक्रमणमिति चेत्?

न; स्वात्मनि क्रियाविरोधादन्योऽन्नमयमन्यमुपसंक्रामतीति प्रकृत्य मनोमयो विज्ञानमयो वा स्वात्मानमेवोपसंक्रामतीति विरोधः स्यात् । तथा नानन्दमयस्यात्मसंक्रमणमुपपद्यते । तस्मान्न प्राप्तिः संक्रमणं नाप्यन्नमयादीनामन्यतमकर्तृकम् । पारिशेष्यादन्नमयाद्यानन्दमयान्तात्मव्यतिरिक्त- कर्तृकं ज्ञानमात्रं च संक्रमणमुपपद्यते ।

ज्ञानमात्रत्वे चानन्दमयान्तःस्थस्यैव सर्वान्तरस्याकाशाद्यन्नमयान्तं कार्यं सृष्ट्वानुप्रविष्टस्य हृदयगुहाभिसम्बन्धादन्नमयादिष्वनात्मस्वात्मविभ्रमः संक्रमणेनात्मविवेकविज्ञानोत्पत्त्या विनश्यति । तदेतस्मिन्नविद्याविभ्रमनाशे संक्रमणशब्द उपचर्यते न ह्यन्यथा सर्वगतस्यात्मनः संक्रमणमुपपद्यते ।

वस्त्वन्तराभावाच्च । न च स्वात्मन एव संक्रमणम् । न हि जलूकात्मानमेव संक्रामति । तस्मात्सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्मेति यथोक्तलक्षणात्मप्रतिपत्त्यर्थमेव बहुभवनसर्गप्रवेशरसलाभाभयसंक्रमणादि परिकल्प्यते ब्रह्मणि सर्वव्यवहार- विषये; न तु परमार्थतो निर्विकल्पे ब्रह्मणि कश्चिदपि विकल्प उपपद्यते ।

तमेतं निर्विकल्पमात्मानमेवंक्रमेणोपसंक्रम्य विदित्वा न बिभेति कुतश्चनाभयं प्रतिष्ठां विन्दत इत्येतस्मिन्नर्थेऽप्येष श्लोको भवति । सर्वस्यैवास्य प्रकरणस्यानन्दवल्ल्यर्थस्य संक्षेपतः प्रकाशनायैष मन्त्रो भवति ॥ ५ ॥

इति ब्रह्मानन्दवल्ल्यामष्टमोऽनुवाकः ॥ ८ ॥


नवम अनुवाक