आनन्दं ब्रह्मणो विद्वान् न बिभेति कुतश्चनेति ।
एतग्ँह वाव न तपति ।
किमहग्ँसाधु नाकरवम् ।
किमहं पापमकरवमिति ।
स य एवं विद्वानते आत्मानग्ँ स्पृणुते ।
उभे ह्येवैष एते आत्मानग्ँस्पृणुते ।
य एवं वेद ।
इत्युपनिषत् ॥ १ ॥
yato vāco nivartante aprāpya manasā saha .
ānandaṃ brahmaṇo vidvān na bibheti kutaścaneti .
etag̐ha vāva na tapati .
kimahag̐sādhu nākaravam .
kimahaṃ pāpamakaravamiti .
sa ya evaṃ vidvānate ātmānag̐ spṛṇute .
ubhe hyevaiṣa ete ātmānag̐spṛṇute .
ya evaṃ veda .
ityupaniṣat .. 1 ..
जिस पूर्वोक्त लक्षणोंवाले निर्विकल्प अद्वयानन्दरूप आत्मा के पास से द्रव्यादि सविकल्प वस्तुओं को प्रकाशित करनेवाला वाक्य—अभिधान, जो वस्तुत्व में [ब्रह्म को अन्य सविकल्प वस्तुओं के] समान समझने के कारण वक्ताओं द्वारा, ब्रह्म के निर्विकल्प और अद्वैत होने पर भी उसका निर्देश करने के लिये प्रयोग किया जाता है, उसे न पाकर अर्थात् उसे प्रकाशित किये बिना ही लौट आता है—अपनी सामर्थ्य से च्युत हो जाता है—
[‘मनसा सह’ (मन के सहित) इस पदसमूह में] ‘मन’ शब्द प्रत्यय अर्थात् विज्ञान का वाचक है । वह, जहाँ-कहीं अतीन्द्रिय पदार्थों में भी शब्द की प्रवृत्ति होती है वहीं उसे प्रकाशित करने के लिये प्रवृत्त हुआ करता है । जहाँ-कहीं भी विज्ञान है वहीं वाणी की भी प्रवृत्ति है । अतः अभिधान और प्रत्ययरूप वाणी और मन की सर्वत्र साथ-साथ ही प्रवृत्ति होती है ।
इसलिये वक्ताओं द्वारा सर्वथा ब्रह्म का प्रकाशन करने के लिये ही प्रयोग की हुई वाणी, जिस प्रतीति के अविषयभूत, अकथनीय, अदृश्य और निर्विशेष ब्रह्म के पास से मन अर्थात् सबको प्रकाशित करने में समर्थ विज्ञान के सहित लौट आती है उस ब्रह्म के आनन्द को—श्रोत्रिय निष्पाप अकामहत और सब प्रकार की एषणाओं से मुक्त साधक के आत्मभूत, विषय-विषयी सम्बन्ध से रहित, स्वाभाविक, नित्य और अविभक्त ऐसे ब्रह्म के उत्कृष्ट आनन्द को पूर्वोक्त विधि से जाननेवाला पुरुष कोई भय का निमित्त न रहने के कारण किसी से भयभीत नहीं होता ।
उस विद्वान् से भिन्न कोई दूसरी वस्तु ही नहीं है जिससे कि उसे भय हो । अविद्यावश जब थोड़ा-सा भी अन्तर करता है तभी जीव को भय होता है—ऐसा कहा ही गया है । अतः तिमिररोगी के देखे हुए द्वितीय चन्द्रमा के समान विद्वान् के अविद्या के कार्यभूत भय के निमित्त का नाश हो जाने के कारण वह किसी से नहीं डरता—ऐसा कहना ठीक ही है ।
मनोमय कोश के प्रकरण में यह मन्त्र उदाहरण के लिये दिया गया था, क्योंकि मन ब्रह्मविज्ञान का साधन है । उसमें ब्रह्मत्व का आरोप करके उसकी स्तुति के लिये ही ‘वह कभी नहीं डरता’ इस वाक्य से उसके भयमात्र का प्रतिषेध किया गया था । यहाँ अद्वैतप्रकरण में वह किसी से नहीं डरता—इस प्रकार भय के निमित्त का ही प्रतिषेध किया जाता है ।
शंका—किन्तु शुभ कर्म का न करना और पापकर्म करना यह तो भय का कारण है ही?
समाधान—ऐसी बात नहीं है । किस प्रकार नहीं है सो बतलाया जाता है—इस पूर्वोक्त को अर्थात् इस प्रकार जाननेवाले को वह तप्त—उद्विग्न अर्थात् सन्तप्त नहीं करता । मूल में ‘ह’ और ‘वाव’ ये निश्चयार्थक निपात हैं । वह पुण्य का न करना और पापक्रिया उसे किस प्रकार ताप नहीं देते? इस पर कहते हैं—‘मैंने शुभ कर्म क्यों नहीं किया’ ऐसा पश्चात्ताप मरणकाल समीप आने पर हुआ करता है तथा ‘मैंने पाप यानी प्रतिषिद्ध कर्म क्यों किया’ ऐसा दुःख नरकपात आदि के भय से होता है । ये पुण्य का न करना और पाप का करना इस विद्वान् को इस प्रकार सन्तप्त नहीं करते जैसे कि वे अविद्वान् को किया करते हैं ।
वे विद्वान् को क्यों सन्तप्त नहीं करते? सो बतलाया जाता है—ये पाप-पुण्य ही ताप के हेतु हैं—इस प्रकार जाननेवाला जो विद्वान् आत्मा को प्रसन्न अथवा सबल करता है अर्थात् इन दोनों को परमात्मभाव से देखता है [उसे ये पाप-पुण्य सन्तप्त नहीं करते] । क्योंकि ये पाप-पुण्य दोनों ऐसे हैं [अर्थात् आत्मस्वरूप हैं] अतः यह विद्वान् इस पाप-पुण्यरूप आत्मा को आत्मभावना से ही अपने विशेषरूप से शून्य कर आत्मा को ही तृप्त करता है । वह विद्वान् कौन है? जो इस प्रकार जानता है अर्थात् पूर्वोक्त अद्वैत एवं आनन्दस्वरूप ब्रह्म को जानता है । उसके आत्मभाव से देखे हुए पुण्य-पाप निर्वीर्य और ताप पहुँचानेवाले न होने से जन्मान्तर के आरम्भक नहीं होते ।
इस प्रकार इस वल्ली में, जैसी कि ऊपर कही गयी है, यह ब्रह्मविद्यारूप उपनिषद् है । अर्थात् इसमें अन्य सब विद्याओं की अपेक्षा परम रहस्य प्रदर्शित किया गया है । इस विद्या में ही परम श्रेय निहित है ॥ १ ॥
संस्कृत भाष्य पढ़ें
यतो यस्मान्निर्विकल्पाद्यथोक्तलक्षणादद्वयानन्दादात्मनो वाचोऽभिधानानि द्रव्यादिसविकल्पवस्तुविषयाणि वस्तुसामान्यान्निर्विकल्पेऽद्वयेऽपि ब्रह्मणि प्रयोक्तृभिः प्रकाशनाय प्रयुज्यमानान्यप्राप्याप्रकाश्यैव निवर्तन्ते स्वसामर्थ्याद्धीयन्ते—
मन इति प्रत्ययो विज्ञानम् । तच्च यत्राभिधानं प्रवृत्तमतीन्द्रियेऽप्यर्थे तदर्थे च प्रवर्तते प्रकाशनाय । यत्र च विज्ञानं तत्र वाचः प्रवृत्तिः । तस्मात्सहैव वाङ्मनसयोरभिधानप्रत्यययोः प्रवृत्तिः सर्वत्र ।
तस्माद्ब्रह्मप्रकाशनाय सर्वथा प्रयोक्तृभिः प्रयुज्यमाना अपि वाचो यस्मादप्रत्ययविषयादनभिधेयाददृश्यादिविशेषणात्सहैव मनसा विज्ञानेन सर्वप्रकाशनसमर्थेन निवर्तन्ते तं ब्रह्मण आनन्दं श्रोत्रियस्यावृजिनस्याकामहतस्य सर्वैषणाविनिर्मुक्तस्यात्मभूतं विषयविषयिसम्बन्धविनिर्मुक्तं स्वाभाविकं नित्यमविभक्तं परमानन्दं ब्रह्मणो विद्वान्यथोक्तेन विधिना न बिभेति कुतश्चन निमित्ताभावात् ।
न हि तस्माद्विदुषोऽन्यद्वस्त्वन्तरमस्ति भिन्नं यतो बिभेति । अविद्यया यदोदरमन्तरं कुरुते, अथ तस्य भयं भवतीति ह्युक्तम् । विदुषश्चाविद्याकार्यस्य तैमिरिकदृष्टद्वितीयचन्द्रवन्नाशाद्भयनिमित्तस्य न बिभेति कुतश्चनेति युज्यते ।
मनोमये चोदाहृतो मन्त्रो मनसो ब्रह्मविज्ञानसाधनत्वात् । तत्र ब्रह्मत्वमध्यारोप्य तत्स्तुत्यर्थं न बिभेति कदाचनेति भयमात्रं प्रतिषिद्धमिहाद्वैतविषये न बिभेति कुतश्चनेति भयनिमित्तमेव प्रतिषिध्यते ।
नन्वस्ति भयनिमित्तं साध्वकरणं पापक्रिया च?
नैवम्; कथमित्युच्यते—एतं यथोक्तमेवंविदम्, ह वावेत्यवधारणार्थौ, न तपति नोद्वेजयति न संतापयति । कथं पुनः साध्वकरणं पापक्रिया च न तपतीत्युच्यते । किं कस्मात्साधु शोभनं कर्म नाकरवं न कृतवानस्मीति पश्चात्तापो भवत्यासन्ने मरणकाले । तथा किं कस्मात्पापं प्रतिषिद्धं कर्माकरवं कृतवानस्मीति च नरकपतनादिदुःखभयात्तापो भवति । ते एते साध्वकरणपापक्रिये एवमेनं न तपतो यथाविद्वांसं तपतः ।
कस्मात्पुनर्विद्वांसं न तपत इत्युच्यते—स य एवंविद्वानेते साध्वसाधुनी तापहेतू इत्यात्मानं स्पृणुते प्रीणयति बलयति वा परमात्मभावेनोभे पश्यतीत्यर्थः । उभे पुण्यपापे हि यस्मादेवमेष विद्वानेते आत्मानमात्मरूपेणैव पुण्यपापे स्वेन विशेषरूपेण शून्ये कृत्वात्मानं स्पृणुत एव । को य एवं वेद यथोक्तमद्वैतमानन्दं ब्रह्म वेद तस्यात्मभावेन दृष्टे पुण्यपापे निर्वीर्ये अतापके जन्मान्तरारम्भके न भवतः ।
इतीयमेवं यथोक्तास्यां वल्ल्यां ब्रह्मविद्योपनिषत्सर्वाभ्यो विद्याभ्यः परमरहस्यं दर्शितमित्यर्थः । परं श्रेयोऽस्यां निषण्णमिति ॥ १ ॥
इति ब्रह्मानन्दवल्ल्यां नवमोऽनुवाकः ॥ ९ ॥
इति श्रीमत्परमहंसपरिव्राजकाचार्यगोविन्दभगवत्पूज्यपादशिष्यश्रीमच्छङ्करभगवतः कृतौ तैत्तिरीयोपनिषद्भाष्ये ब्रह्मानन्दवल्ली समाप्ता ।