नम्यन्तेऽस्मै कामाः ।
तद्ब्रह्मेत्युपासीत ।
ब्रह्मवान् भवति ।
तद्ब्रह्मणः परिमर इत्युपासीत ।
पर्येणं म्रियन्ते द्विषन्तः सपत्नाः ।
परि येऽप्रिया भ्रातृव्याः ।
स यश्चायं पुरुषे यश्चासावादित्ये स एकः ॥ ४ ॥
tannama ityupāsīta .
namyante’smai kāmāḥ .
tadbrahmetyupāsīta .
brahmavān bhavati .
tadbrahmaṇaḥ parimara ityupāsīta .
paryeṇaṃ mriyante dviṣantaḥ sapatnāḥ .
pari ye’priyā bhrātṛvyāḥ .
sa yaścāyaṃ puruṣe yaścāsāvāditye sa ekaḥ .. 4 ..
तथा पृथिवी और आकाश की [अन्न एवं अन्नादरूप से] उपासना करनेवाले के यहाँ रहने के लिये कोई भी आवे उसे उसका परित्याग नहीं करना चाहिये । अर्थात् अपने यहाँ निवास करने के लिये आये हुए किसी भी व्यक्ति का वह निवारण न करे । जब किसी को रहने का स्थान दिया जाय तो उसे भोजन भी अवश्य देना चाहिये । अतः जिस किसी भी विधि से यानी किसी-न-किसी प्रकार बहुत-सा अन्न प्राप्त करे; अर्थात् खूब अन्न-संग्रह करे ।
क्योंकि अन्नवान् उपासकगण अपने यहाँ आये हुए अन्नार्थी से ‘अन्न तैयार है’ ऐसा कहते हैं—‘अन्न नहीं है’ ऐसा कहकर उसका परित्याग नहीं करते । इसलिये भी बहुत-सा अन्न उपार्जन करे—इस प्रकार इसका पूर्ववाक्य से सम्बन्ध है । अब अन्नदान का माहात्म्य कहा जाता है—जो पुरुष जिस प्रकार और जिस समय अन्न-दान करता है उसे उसी प्रकार और उसी समय उसकी प्राप्ति होती है । ऐसा किस प्रकार होता है? सो बतलाते हैं—
जो पुरुष मुखतः—मुख्य—प्रथम अवस्था में अथवा मुख्य वृत्ति से यानी सत्कारपूर्वक राद्ध अर्थात् सिद्ध (पक्व) अन्न को अपने यहाँ आये हुए अन्नार्थी अतिथि को देता है—यहाँ प्रयच्छति (देता है) यह क्रियापद वाक्यशेष (अनुक्त अंश) है—उसे क्या फल मिलता है, सो बतलाया जाता है—इस अन्नदाता को मुखतः—प्रथम अवस्था में अथवा मुख्य वृत्ति से अन्न प्राप्त होता है; अर्थात् जिस प्रकार दिया जाता है उसी प्रकार प्राप्त होता है । इसी प्रकार मध्यतः—मध्यम आयु में अथवा मध्यम वृत्ति से तथा अन्ततः—अन्तिम आयु में अथवा निकृष्ट वृत्ति से यानी तिरस्कारपूर्वक देने से इसे उसी प्रकार अन्न की प्राप्ति होती है ॥ १ ॥
जो इस प्रकार जानता है—जो इस प्रकार अन्न का पूर्वोक्त माहात्म्य और उसके दान का फल जानता है उसे पूर्वोक्त फल की प्राप्ति होती है ।
अब ब्रह्म की उपासना का [एक और] प्रकार बतलाया जाता है—‘क्षेम है’ इस प्रकार वाणी में । प्राप्त पदार्थ की रक्षा करने का नाम ‘क्षेम’ है । वाणी में ब्रह्म क्षेमरूप से स्थित है—इस प्रकार उसकी उपासना करनी चाहिये । ‘योगक्षेम’—अप्राप्त वस्तु का प्राप्त करना ‘योग’ कहलाता है । वे योग और क्षेम यद्यपि बलवान् प्राण और अपान के रहते हुए ही होते हैं, तो भी उनका कारण प्राण एवं अपान ही नहीं है । तो उनका कारण क्या है? वे ब्रह्म के कारण ही होते हैं । अतः योगक्षेमरूप से ब्रह्म प्राण और अपान में स्थित है—इस प्रकार उसकी उपासना करनी चाहिये ।
इसी प्रकार आगे के अन्य पर्यायों में भी उन-उनके रूप से ब्रह्म की ही उपासना करनी चाहिये । कर्म ब्रह्म की ही प्रेरणा से निष्पन्न होता है; अतः हाथों में ब्रह्म कर्मरूप से स्थित है—इस प्रकार उसकी उपासना करनी चाहिये । चरणों में गतिरूप से और पायु में विसर्जनरूप से [प्रतिष्ठित समझकर उसकी उपासना करे] । इस प्रकार यह मानुषी—मनुष्यों में रहनेवाली समाज्ञा है, अर्थात् यह आध्यात्मिक समाज्ञा—ज्ञान-विज्ञान यानी उपासना है—यह इसका तात्पर्य है ।
अब इसके पश्चात् दैवी—देव-सम्बन्धिनी अर्थात् देवताओं में होनेवाली समाज्ञा कही जाती है । तृप्ति इस भाव से वृष्टि में [ब्रह्म की उपासना करे] । अन्नादि के द्वारा वृष्टि तृप्ति का कारण है । अतः तृप्तिरूप से ब्रह्म ही वृष्टि में स्थित है—इस प्रकार उसकी उपासना करनी चाहिये । इसी प्रकार अन्य पर्यायों में भी उन-उनके रूप से ब्रह्म की ही उपासना करनी चाहिये । अर्थात् बलरूप से विद्युत् में ॥ २ ॥ यशरूप से पशुओं में, ज्योतीरूप से नक्षत्रों में, प्रजाति (पुत्रादि प्रजा) अमृत—अर्थात् पुत्रद्वारा पितृऋण से मुक्त होने के द्वारा अमृतत्व की प्राप्ति और आनन्द—सुख ये सब उपस्थ के निमित्त से ही होनेवाले हैं; अतः इनके रूप से ब्रह्म ही उपस्थ में स्थित है—इस प्रकार उसकी उपासना करनी चाहिये ।
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तथा पृथिव्याकाशोपासकस्य आतिथ्योपदेशः वसतौ वसतिनिमित्तं कञ्चन कञ्चिदपि न प्रत्याचक्षीत वसत्यर्थमागतं न निवारयेदित्यर्थः । वासे च दत्तेऽवश्यं ह्यशनं दातव्यम् । तस्माद्यया कया च विधया येन केन च प्रकारेण बह्वन्नं प्राप्नुयाद्बह्वन्नसंग्रहं कुर्यादित्यर्थः ।
यस्मादन्नवन्तो विद्वांसोऽभ्यागतायान्नार्थिनेऽराधि संसिद्धमस्मा अन्नमित्याचक्षते न नास्तीति प्रत्याख्यानं कुर्वन्ति । तस्माच्च हेतोर्बह्वन्नं प्राप्नुयादिति पूर्वेण सम्बन्धः । अपि चान्नदानस्य माहात्म्यमुच्यते । यथा यत्कालं प्रयच्छत्यन्नं तथा तत्कालमेव प्रत्युपनमते । कथमिति तदेतदाह—
एतद्वा अन्नं मुखतो मुख्ये वृत्तिभेदेनान्नप्रथमे वयसि दानस्य फलभेदः मुख्यया वा वृत्त्या पूजापुरःसरमभ्यागतायान्नार्थिने राद्धं संसिद्धं प्रयच्छतीति वाक्यशेषः । तस्य किं फलं स्यादित्युच्यते— मुखतः पूर्वे वयसि मुख्यया वा वृत्त्यास्मा अन्नादायान्नं राध्यते यथादत्तमुपतिष्ठत इत्यर्थः । एवं मध्यतो मध्यमे वयसि मध्यमेन चोपचारेण । तथाऽन्ततोऽन्ते वयसि जघन्येन चोपचारेण परिभवेन तथैवास्मै राध्यते संसिध्यत्यन्नम् ॥ १ ॥
य एवं वेद य एवमन्नस्य यथोक्तं माहात्म्यं वेद तद्दानस्य च फलम्, तस्य यथोक्तं फलमुपनमते ।
इदानीं ब्रह्मण उपासनप्रकार उच्यते—क्षेम इति ब्रह्मोपासनवाचि । क्षेमो नाप्रकारान्तराणि मोपात्तपरिरक्षणम् । ‘मानुषी समाज्ञा’ ब्रह्म वाचि क्षेमरूपेण प्रतिष्ठितमित्युपास्यम् । योगक्षेम इति, योगोऽनुपात्तस्योपादानम्, तौ हि योगक्षेमौ प्राणापानयोः सतोर्भवतो यद्यपि तथापि न प्राणापाननिमित्तावेव किं तर्हि ब्रह्मनिमित्तौ; तस्माद्ब्रह्म योगक्षेमात्मना प्राणापानयोः प्रतिष्ठितमित्युपास्यम् ।
एवमुत्तरेष्वन्येषु तेन तेनात्मना ब्रह्मैवोपास्यम् । कर्मणो ब्रह्मनिर्वर्त्यत्वाद्धस्तयोः कर्मात्मना ब्रह्म प्रतिष्ठितमित्युपास्यम् । गतिरिति पादयोः । विमुक्तिरिति पायौ । इत्येता मानुषीर्मनुष्येषु भवा मानुष्यः समाज्ञा; आध्यात्मिक्यः समाज्ञा ज्ञानानि विज्ञानान्युपासनानीत्यर्थः ।
अथानन्तरं दैवीर्देव्यो देवेषु भवाः समाज्ञा ‘दैवी समाज्ञा’ उच्यन्ते । तृप्तिरिति वृष्टौ । वृष्टेरन्नादिद्वारेण तृप्तिहेतुत्वाद्ब्रह्मैव तृप्त्यात्मना वृष्टौ व्यवस्थितमित्युपास्यम् । तथान्येषु तेन तेनात्मना ब्रह्मैवोपास्यम् ।
सब कुछ आकाश में ही स्थित है । अतः आकाश में जो कुछ है वह सब ब्रह्म ही है—इस प्रकार उसकी उपासना करनी चाहिये । तथा वह आकाश भी ब्रह्म ही है । अतः वह सबकी प्रतिष्ठा (आश्रय) है—इस प्रकार उसकी उपासना करे । प्रतिष्ठा गुणवान् ब्रह्म की उपासना करने से उपासक प्रतिष्ठावान् होता है । ऐसा ही पूर्व सब पर्यायों में समझना चाहिये ।
जो-जो उसके अधीन फल है वह ब्रह्म ही है । उसकी उपासना से पुरुष उसी फल से युक्त होता है—ऐसा जानना चाहिये । यही बात “जिस-जिस प्रकार उसकी उपासना करता है वह (उपासक) वही हो जाता है” इस एक-दूसरी श्रुति से प्रमाणित होती है ।
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तथा बलरूपेण विद्युति ॥ २ ॥ यशोरूपेण पशुषु । ज्योतीरूपेण नक्षत्रेषु । प्रजातिरमृतममृतत्वप्राप्तिः पुत्रेण ऋणविमोक्षद्वारेणानन्दः सुखमित्येतत्सर्वमुपस्थनिमित्तं ब्रह्मैवानेनात्मनोपस्थे प्रतिष्ठितमित्युपास्यम् ।
सर्वं ह्याकाशे प्रतिष्ठितमतो यत्सर्वमाकाशे तद्ब्रह्मैवेत्युपास्यम् । तच्चाकाशं ब्रह्मैव । तस्मात्तत् सर्वस्य प्रतिष्ठेत्युपासीत । प्रतिष्ठागुणोपासनात्प्रतिष्ठावान्भवति ।
एवं पूर्वेष्वपि यद्यत्तदधीनं फलं तद्ब्रह्मैव तदुपासनात्तद्वान्भवतीति द्रष्टव्यम् । श्रुत्यन्तराच्च—“तं यथा यथोपासते तदेव भवति” इति ।
वह महः है—इस प्रकार उसकी उपासना करे । महः अर्थात् महत्त्व गुणवाला है—ऐसे भाव से उसकी उपासना करे । इससे उपासक महान् हो जाता है । वह मन है—इस प्रकार उसकी उपासना करे । मनन का नाम मन है । इससे वह मानवान्—मनन में समर्थ हो जाता है ॥ ३ ॥ वह नमः है—इस प्रकार उसकी उपासना करे । नमन का नाम ‘नमः’ है अर्थात् उसे नमन-गुणवान् समझकर उपासना करे । इससे उस उपासक के प्रति सम्पूर्ण काम—जिनकी कामना की जाय वे भोग्य विषय नत अर्थात् विनम्र हो जाते हैं ।
वह ब्रह्म है—इस प्रकार उसकी उपासना करे । ब्रह्म यानी सबसे बढ़ा हुआ है—इस प्रकार उपासना करे । इससे वह ब्रह्मवान्—ब्रह्म के-से गुणवाला हो जाता है । वह ब्रह्म का परिमर है—इस प्रकार उसकी उपासना करे । ब्रह्म का परिमर—जिसमें विद्युत्, वृष्टि, चन्द्रमा, आदित्य और अग्नि—ये पाँच देवता मृत्यु को प्राप्त होते हैं उसे परिमर कहते हैं; अतः वायु ही परिमर है, जैसे कि [“वायुर्वाव संवर्गः” इस] एक अन्य श्रुति से सिद्ध होता है । वही यह वायु आकाश से अभिन्न है, इसलिये आकाश ही ब्रह्म का परिमर है । अतः वायुरूप आकाश की ‘यह ब्रह्म का परिमर है’ इस भाव से उपासना करे ।
इस प्रकार जाननेवाले इस उपासक के द्वेष करनेवाले प्रतिपक्षी—क्योंकि प्रतिपक्षी द्वेष न करनेवाले भी होते हैं इसलिये यहाँ ‘द्वेष करनेवाले’ यह विशेषण दिया गया है—मर जाते हैं अर्थात् प्राण त्याग देते हैं । तथा इसके जो अप्रिय भ्रातृव्य होते हैं वे द्वेष करनेवाले न होने पर भी मर जाते हैं ।
‘प्राण ही अन्न है और शरीर अन्नाद है’ यहाँ से लेकर आकाशपर्यन्त कार्यवर्ग का ही अन्न और अन्नादत्व प्रतिपादन किया गया है ।
पूर्व०—कहा गया है—सो इससे क्या हुआ?
सिद्धान्ती—इससे यह सिद्ध होता है कि भोज्य और भोक्ता के कारण होनेवाला संसार कार्यवर्ग से ही सम्बन्धित है, वह आत्मा में नहीं है; आत्मा में तो भ्रान्तिवश उसका उपचार किया जाता है ।
पूर्व०—परन्तु आत्मा भी तो परमात्मा का कार्य है । इसलिये उसे संसार की प्राप्ति होना उचित ही है?
सिद्धान्ती—नहीं, क्योंकि प्रवेशश्रुति असंसारी का ही प्रवेश प्रतिपादन करती है । “उसे रचकर वह पीछे से उसी में प्रविष्ट हो गया’’ इस श्रुतिद्वारा आकाशादि के कारणरूप असंसारी परमात्मा का ही कार्यों में अनुप्रवेश सुना गया है । अतः कार्य में अनुप्रविष्ट जीवात्मा असंसारी परमात्मा ही है । ‘रचकर पीछे से प्रविष्ट हो गया’ इस वाक्य से एक ही कर्ता होना सिद्ध होता है । यदि सृष्टि और प्रवेशक्रिया का एक ही कर्ता होगा तभी ‘क्त्वा’ प्रत्यय होना युक्त होगा ।
पूर्व०—प्रवेश कर लेने पर उसे दूसरे भाव की प्राप्ति हो जाती है—ऐसा माने तो?
सिद्धान्ती—नहीं, क्योंकि प्रवेश का प्रयोजन दूसरा ही है—ऐसा कहकर हम इसका पहले ही निराकरण कर चुके हैं । यदि कहो कि “अनेन जीवेन आत्मना’’ इत्यादि विशेष श्रुति होने के कारण उसका धर्मान्तररूप से ही प्रवेश होता है—तो ऐसा कहना ठीक नहीं, क्योंकि “वह तू है’’ इस श्रुतिद्वारा पुनः उसकी तद्रूपता का वर्णन किया गया है । और यदि कहो कि भावान्तर को प्राप्त हुए ब्रह्म के उस भाव का निषेध करने के लिये ही वह केवल दृष्टिमात्र कही गयी है तो ऐसी बात भी नहीं है, क्योंकि “वह सत्य है, वह आत्मा है, वह तू है’’ इत्यादि श्रुति से उसका परमात्मा के साथ सामानाधिकरण्य सिद्ध होता है ।
पूर्व०—जीव का संसारित्व तो स्पष्ट देखा है ।
सिद्धान्ती—नहीं, क्योंकि जो (जीव) सबका द्रष्टा है वह देखा नहीं जा सकता ।
पूर्व०—सांसारिक धर्मों से युक्त आत्मा तो उपलब्ध होता ही है?
सिद्धान्ती—ऐसी बात नहीं है; क्योंकि धर्म अपने धर्मी से अभिन्न होते हैं अतः वे उसके कर्म नहीं हो सकते, जिस प्रकार कि [सूर्य के धर्म] उष्ण और प्रकाश का दाह्यत्व और प्रकाश्यत्व सम्भव नहीं है । यदि कहो कि भय आदि देखने से आत्मा के दुःखित्व आदि का अनुमान होता ही है—तो ऐसा कहना भी ठीक नहीं, क्योंकि भय आदि दुःख उपलब्ध होनेवाले होने के कारण उपलब्ध करनेवाले [आत्मा]-के धर्म नहीं हो सकते ।
पूर्व०—परन्तु ऐसा मानने से तो कपिल और कणाद आदि के तर्कशास्त्र से विरोध आता है ।
सिद्धान्ती—ऐसा कहना ठीक नहीं, क्योंकि उनका कोई आधार न होने से और वेद से विरोध होने से भ्रान्तिमय होना उचित ही है । श्रुति और युक्ति से आत्मा का असंसारित्व सिद्ध होता है तथा एक होने के कारण भी ऐसा ही जान पड़ता है ।
उसका एकत्व कैसे है? सो सबका सब पूर्ववत् ‘वह जो कि इस पुरुष में है और जो यह आदित्य में है एक है’ इस वाक्य द्वारा बतलाया गया है ॥ ४ ॥
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तन्मह इत्युपासीत । महो महत्त्वगुणवत्तदुपासीत । महान् भवति । तन्मन इत्युपासीत । मननं मनः । मानवान्भवति मननसमर्थो भवति ॥ ३ ॥ तन्नम इत्युपासीत । नमनं नमो नमनगुणवत्तदुपासीत । नम्यन्ते प्रह्वीभवन्त्यस्मा उपासित्रे कामाः काम्यन्त इति भोग्या विषया इत्यर्थः ।
तद्ब्रह्मेत्युपासीत । ब्रह्म परिवृढतममित्युपासीत । ब्रह्मवांस्तद्गुणो भवति । तद्ब्रह्मणः परिमर इत्युपासीत । ब्रह्मणः परिमरः परिम्रियन्तेऽस्मिन्पञ्च देवता विद्युद्वृष्टिश्चन्द्रमा आदित्योऽग्निरित्येताः । अतो वायुः परिमरः श्रुत्यन्तरप्रसिद्धेः । स एष एवायं वायुराकाशेनानन्य इत्याकाशो ब्रह्मणः परिमरः, तमाकाशं वाय्वात्मानं ब्रह्मणः परिमर इत्युपासीत ।
एनमेवंविदं प्रतिस्पर्धिनो द्विषन्तोऽद्विषन्तोऽपि सपत्ना यतो भवन्त्यतो विशिष्यन्ते द्विषन्तः सपत्ना इति, एनं द्विषन्तः सपत्नास्ते परिम्रियन्ते प्राणाञ्जहति । किं च ये चाप्रिया अस्य भ्रातृव्या अद्विषन्तोऽपि ते च परिम्रियन्ते ।
‘प्राणो वा अन्नं शरीरमन्नात्मनोऽसंसारित्व- दम्’ इत्यारभ्यास्थापनम् काशान्तस्य कार्यस्यैवान्नान्नादत्वमुक्तम् ।
उक्तं नाम किं तेन?
तेनैतत्सिद्धं भवति—कार्यविषय एव भोज्यभोक्तृत्वकृतः संसारो न त्वात्मनीति । आत्मनि तु भ्रान्त्योपचर्यते ।
नन्वात्मापि परमात्मनः कार्यं ततो युक्तस्तस्य संसार इति ।
न; असंसारिण एव प्रवेशश्रुतेः । “तत्सृष्ट्वा तदेवानुप्राविशत्’’ (तै० उ० २ । ६ । १) इत्याकाशादिकारणस्य ह्यसंसारिण एव परमात्मनः कार्येष्वनुप्रवेशः श्रूयते । तस्मात्कार्यानुप्रविष्टो जीव आत्मा पर एव असंसारी । सृष्ट्वानुप्राविशदिति समानकर्तृत्वोपपत्तेश्च । सर्गप्रवेशक्रिययोश्चैकश्चेत्कर्ता ततः क्त्वाप्रत्ययो युक्तः ।
प्रविष्टस्य तु भावान्तरापत्तिरिति चेत्?
न; प्रवेशस्यान्यार्थत्वेन प्रत्याख्यातत्वात् । “अनेन जीवेनात्मना’’ (छा० उ० ६ । ३ । २) इति विशेषश्रुतेर्धर्मान्तरेणानुप्रवेश इति चेत्? न; “तत्त्वमसि’’ इति पुनस्तद्भावोक्तेः । भावान्तरापन्नस्यैव तदपोहार्था संपदिति चेत्? न; “तत्सत्यं स आत्मा तत्त्वमसि’’ (छा० उ० ६ । ८—१६) इति सामानाधिकरण्यात् ।
दृष्टं जीवस्य संसारित्वमिति चेत्?
न; उपलब्धुरनुपलभ्यत्वात् ।
संसारधर्मविशिष्ट आत्मोपलभ्यत इति चेत्?
न; धर्माणां धर्मिणोऽव्यतिरेकात्कर्मत्वानुपपत्तेः, उष्णप्रकाशयोर्दाह्यप्रकाश्यत्वानुपपत्तिवत् । त्रासादिदर्शनाद्दुःखित्वाद्यनुमीयत इति चेत्? न; त्रासादेर्दुःखस्य चोपलभ्यमानत्वान्नोपलब्धृधर्मत्वम् ।
कापिलकाणादादितर्कशास्त्रविरोध इति चेत्?
न, तेषां मूलाभावे वेदविरोधे च भ्रान्तत्वोपपत्तेः । श्रुत्युपपत्तिभ्यां च सिद्धमात्मनोऽसंसारित्वमेकत्वाच्च । कथ मेकत्वमित्युच्यते—स यश्चायं पुरुषे यश्चासावादित्ये स एक इत्येवमादि पूर्ववत् सर्वम् ॥ ४ ॥