वल्ली 3 अनुवाक 10 - मन्त्र 5

स य एवंवित् ।
अस्माल्लोकात्प्रेत्य ।
एतमन्नमयमात्मानमुपसंक्रम्य ।
एतं प्राणमयमात्मानमुपसंक्रम्य ।
एतं मनोमयमात्मानमुपसंक्रम्य ।
एतं विज्ञानमयमात्मानमुपसंक्रम्य ।
एतमानन्दमयमात्मानमुपसंक्रम्य ।
इमाँल्लोकान्कामान्नी कामरूप्यनुसंचरन् ।
एतत्साम गायन्नास्ते ।
हा ३ वु हा ३ वु हा ३ वु ॥ ५ ॥

sa ya evaṃvit .
asmāllokātpretya .
etamannamayamātmānamupasaṃkramya .
etaṃ prāṇamayamātmānamupasaṃkramya .
etaṃ manomayamātmānamupasaṃkramya .
etaṃ vijñānamayamātmānamupasaṃkramya .
etamānandamayamātmānamupasaṃkramya .
imā~llokānkāmānnī kāmarūpyanusaṃcaran .
etatsāma gāyannāste .
hā 3 vu hā 3 vu hā 3 vu .. 5 ..


वह जो इस प्रकार जाननेवाला है इस लोक (दृष्ट और अदृष्ट विषयसमूह) से निवृत्त होकर इस अन्नमय आत्मा के प्रति संक्रमण कर, इस प्राणमय आत्मा के प्रति संक्रमण कर, इस मनोमय आत्मा के प्रति संक्रमण कर, इस विज्ञानमय आत्मा के प्रति संक्रमण कर तथा इस आनन्दमय आत्मा के प्रति संक्रमण कर इन लोकों में कामान्नी (इच्छानुसार भोग भोगता हुआ) और कामरूपी होकर (इच्छानुसार रूप धारण कर) विचरता हुआ यह सामगान करता रहता है—हा ३ वु हा ३ वु हा ३ वु ॥ ५ ॥

अन्नमय आदि के क्रम से आनन्दमय आत्मा के प्रति संक्रमण कर वह यह सामगान करता रहता है ।

‘सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म’ इस ऋचा के अर्थ की, इसकी विवरणभूता ब्रह्मानन्दवल्ली के द्वारा विस्तारपूर्वक व्याख्या कर दी गयी थी ।

संस्कृत भाष्य पढ़ें

अन्नमयादिक्रमेणानन्दमयमात्मानमुपसंक्रम्यैतत्साम गायन्नास्ते ।

सत्यं ज्ञानमित्यस्या ऋचोऽर्थो सोऽश्नुते व्याख्यातो विस्तरेण सर्वान्कामानिति तद्विवरणभूतमीमांस्यते यानन्दवल्लया ।