अन्नाद्ध्येव खल्विमानि भूतानि जायन्ते ।
अन्नेन जातानि जीवन्ति ।
अन्नं प्रयन्त्यभिसंविशन्तीति ।
तद्विज्ञाय पुनरेव वरुणं पितरमुपससार ।
अधीहि भगवो ब्रह्मेति ।
तग्ँहोवाच ।
तपसा ब्रह्म विजिज्ञासस्व ।
तपो ब्रह्मेति ।
स तपोऽतप्यत ।
स तपस्तप्त्वा ॥ १ ॥
annaṃ brahmeti vyajānāt .
annāddhyeva khalvimāni bhūtāni jāyante .
annena jātāni jīvanti .
annaṃ prayantyabhisaṃviśantīti .
tadvijñāya punareva varuṇaṃ pitaramupasasāra .
adhīhi bhagavo brahmeti .
tag̐hovāca .
tapasā brahma vijijñāsasva .
tapo brahmeti .
sa tapo’tapyata .
sa tapastaptvā .. 1 ..
अन्न ब्रह्म है—ऐसा जाना । वही उपर्युक्त लक्षण से युक्त है । सो कैसे? क्योंकि निश्चय अन्न से ही ये सब प्राणी उत्पन्न होते हैं, उत्पन्न होने पर अन्न से ही जीवित रहते हैं तथा मरणोन्मुख होने पर अन्न में ही लीन हो जाते हैं । अतः तात्पर्य यह है कि अन्न का ब्रह्मरूप होना ठीक ही है । वह इस प्रकार तप करके तथा अन्न के लक्षण और युक्ति के द्वारा ‘अन्न ही ब्रह्म है’ ऐसा जानकर फिर भी संशयग्रस्त हो पिता वरुण के पास आया [और बोला—] ‘भगवन्! मुझे ब्रह्म का उपदेश कीजिये ।’
परन्तु इसमें उसके संशय का कारण क्या था? सो बतलाया जाता है । अन्न की उत्पत्ति देखने से [उसे ऐसा सन्देह हुआ] । यहाँ तप का जो बारम्बार उपदेश किया गया है वह उसका प्रधान साधनत्व प्रदर्शित करने के लिये है । अर्थात् जबतक ब्रह्म का लक्षण निरतिशय न हो जाय और जबतक तेरी जिज्ञासा शान्त न हो तबतक तप ही तेरे लिये साधन है । तात्पर्य यह है कि तू तप से ही ब्रह्म को जानने की इच्छा कर । शेष अर्थ सरल है ॥ १ ॥
संस्कृत भाष्य पढ़ें
अन्नं ब्रह्मेति व्यजानाद्विज्ञातवान् तद्धि यथोक्तलक्षणोपेतम् । कथम्? अन्नाद्ध्येव खल्विमानि भूतानि जायन्ते; अन्नेन जातानि जीवन्ति अन्नं प्रयन्त्यभिसंविशन्तीति तस्माद्युक्तमन्नस्य ब्रह्मत्वमित्यभिप्रायः । स एवं तपस्तप्त्वान्नं ब्रह्मेति विज्ञायान्नलक्षणेनोपपत्त्या च पुनरेव संशयमापन्नो वरुणं पितरमुपससार अधीहि भगवो ब्रह्मेति ।
कः पुनः संशयहेतुरस्येत्युच्यते— अन्नस्योत्पत्तिदर्शनात् । तपसः पुनः पुनरुपदेशः साधनातिशयत्वावधारणार्थः । यावद्ब्रह्मणो लक्षणं निरतिशयं न भवति यावच्च जिज्ञासा न निवर्तते तावत्तप एव ते साधनम् । तपसैव ब्रह्म विजिज्ञासस्वेत्यर्थः । ऋज्वन्यत् ॥ १ ॥
इति भृगुवल्ल्यां द्वितीयोऽनुवाकः ॥ २ ॥