वल्ली 3 अनुवाक 4 - मन्त्र 1

मनो ब्रह्मेति व्यजानात् ।
मनसो ह्येव खल्विमानि भूतानि जायन्ते ।
मनसा जातानि जीवन्ति ।
मनः प्रयन्त्यभिसंविशन्तीति ।
तद्विज्ञाय पुनरेव वरुणं पितरमुपससार ।
अधीहि भगवो ब्रह्मेति ।
तग्ँहोवाच ।
तपसा ब्रह्म विजिज्ञासस्व ।
तपो ब्रह्मेति ।
स तपोऽतप्यत ।
स तपस्तप्त्वा ॥ १ ॥

mano brahmeti vyajānāt .
manaso hyeva khalvimāni bhūtāni jāyante .
manasā jātāni jīvanti .
manaḥ prayantyabhisaṃviśantīti .
tadvijñāya punareva varuṇaṃ pitaramupasasāra .
adhīhi bhagavo brahmeti .
tag̐hovāca .
tapasā brahma vijijñāsasva .
tapo brahmeti .
sa tapo’tapyata .
sa tapastaptvā .. 1 ..


मन ब्रह्म है—ऐसा जाना; क्योंकि निश्चय मन से ही ये जीव उत्पन्न होते हैं, उत्पन्न होने पर मन के द्वारा ही जीवित रहते हैं और अन्त में प्रयाण करते हुए मन में ही लीन हो जाते हैं । ऐसा जानकर वह फिर पिता वरुण के पास गया [और बोला—] ‘भगवन्! मुझे ब्रह्म का उपदेश कीजिये ।’ वरुण ने उससे कहा— ‘तू तप से ब्रह्म को जानने की इच्छा कर, तप ही ब्रह्म है ।’ तब उसने तप किया और उसने तप करके— ॥ १ ॥

इति भृगुवल्ल्यां चतुर्थोऽनुवाकः ॥ ४ ॥

पञ्चम अनुवाक