वल्ली 3 अनुवाक 6 - मन्त्र 1

पशुभिर्ब्रह्मवर्चसेन ।
महान् कीर्त्या ॥ १ ॥

paśubhirbrahmavarcasena .
mahān kīrtyā .. 1 ..


आनन्द ब्रह्म है—ऐसा जाना; क्योंकि आनन्द से ही ये सब प्राणी उत्पन्न होते हैं, उत्पन्न होने पर आनन्द के द्वारा ही जीवित रहते हैं और प्रयाण करते समय आनन्द में ही समा जाते हैं । वह यह भृगु की जानी हुई और वरुण की उपदेश की हुई विद्या परमाकाश में स्थित है । जो ऐसा जानता है वह ब्रह्म में स्थित होता है; वह अन्नवान् और अन्न का भोक्ता होता है; प्रजा, पशु और ब्रह्मतेज के कारण महान् होता है तथा कीर्ति के कारण भी महान् होता है ॥ १ ॥

इस प्रकार तप से शुद्धचित्त हुए भृगु ने प्राणादि में पूर्णतया ब्रह्म का लक्षण न देखकर धीरे-धीरे भीतर की ओर प्रवेश कर तपरूप साधन के द्वारा ही सबकी अपेक्षा अन्तरतम आनन्द को ब्रह्म जाना । अतः जो ब्रह्म को जानने की इच्छावाला हो उसे साधनरूप से बाह्य इन्द्रिय और अन्तःकरण का समाधानरूप परम तप ही करना चाहिये—यह इस प्रकरण का तात्पर्य है ।

अब आख्यायिका से निवृत्त होकर श्रुति अपने ही वाक्य से आख्यायिका से निष्पन्न होनेवाला अर्थ बतलाती है— अन्नमय आत्मा से प्रारम्भ हुई यह भार्गवी—भृगु की जानी हुई और वारुणी— वरुण की कही हुई विद्या परमाकाश में— हृदयाकाशस्थित गुहा के भीतर अद्वैत परमानन्द में प्रतिष्ठित है अर्थात् वहीं इसका पर्यवसान होता है । इसी प्रकार जो कोई दूसरा पुरुष भी इसी क्रम से तपरूप साधन के द्वारा क्रमशः अनुप्रवेश करके आनन्द को ब्रह्मरूप से जानता है वह इस प्रकार विद्या में स्थिति लाभ करने से आनन्द अर्थात् परब्रह्म में स्थिति प्राप्त करता है, यानी ब्रह्म ही हो जाता है ।

अब उसका दृष्ट (इस लोक में प्राप्त होनेवाला) फल बतलाया जाता है—अन्नवान्—जिसके पास बहुत-सा अन्न हो उसे अन्नवान् कहते हैं ।[ * ] अन्न की सत्तामात्र से तो सभी अन्नवान् हैं, अतः [यदि उस प्रकार अर्थ किया जाय तो] विद्या की कोई विशेषता नहीं रहती । इसी प्रकार वह अन्नाद—जो अन्नभक्षण करे यानी दीप्ताग्नि हो जाता है । वह महान् हो जाता है । उसका महत्त्व किस कारण से होता है? इसपर कहते हैं—पुत्रादि प्रजा, गौ, अश्व आदि पशु तथा ब्रह्मतेज यानी शम, दम एवं ज्ञानादि के कारण होनेवाले तेज से तथा कीर्ति यानी शुभाचरण के कारण होनेवाली ख्याति से वह महान् हो जाता है ॥ १ ॥

संस्कृत भाष्य पढ़ें

एवं तपसा विशुद्धात्मा प्राणादिषु साकल्येन ब्रह्मलक्षणमपश्यञ्शनैः शनैरन्तरनुप्रविश्यान्तरतममानन्दं ब्रह्म विज्ञातवांस्तपसैव साधनेन भृगुः । तस्माद्ब्रह्मविजिज्ञासुना बाह्यान्तःकरणसमाधानलक्षणं परमं तपःसाधनमनुष्ठेयमिति प्रकरणार्थः ।

अधुनाख्यायिकातोऽपसृत्य श्रुतिः स्वेन वचनेनाख्यायिकानिर्वर्त्यमर्थमाचष्टे—सैषा भार्गवी भृगुणा विदिता वरुणेन प्रोक्ता वारुणी विद्या परमे व्योमन्हृदयाकाशगुहायां परम आनन्देऽद्वैते प्रतिष्ठिता परिसमाप्तान्नमयादात्मनोऽधिप्रवृत्ता । य एवमन्योऽपि तपसैव साधनेनानेनैव क्रमेणानुप्रविश्यानन्दं ब्रह्म वेद स एवं विद्याप्रतिष्ठानात्प्रतितिष्ठत्यानन्दे परमे ब्रह्मणि, ब्रह्मैव भवतीत्यर्थः ।

दृष्टं च फलं तस्योच्यते— अन्नवान्प्रभूतमन्नमस्य विद्यत इत्यन्नवान् । सत्तामात्रेण तु सर्वो ह्यन्नवानिति विद्याया विशेषो न स्यात् । एवमन्नमत्तीत्यन्नादो दीप्ताग्निर्भवतीत्यर्थः । महान्भवति । केन महत्त्वमित्यत आह—प्रजया पुत्रादिना पशुभिर्गवाश्वादिभिर्ब्रह्मवर्चसेन शमदमज्ञानादिनिमित्तेन तेजसा । महान्भवति कीर्त्या ख्यात्या शुभप्रचारनिमित्तया ॥ १ ॥

इति भृगुवल्ल्यां षष्ठोऽनुवाकः ॥ ६ ॥

सप्तम अनुवाक

अन्न की निन्दा न करनारूप व्रत तथा शरीर और प्राणरूप

अन्नब्रह्म के उपासक को प्राप्त होनेवाले फल का वर्णन

[ * ]: मूल में केवल ‘अन्नवान्’ है, भाष्य में उसका अर्थ ‘प्रभूत (बहुत-से) अन्नवाला’ किया गया है । इससे यह शंका होती है कि ‘प्रभूत’ विशेषण का प्रयोग क्यों किया गया । इसी का समाधान करने के लिये आगे का वाक्य है ।