वल्ली 3 अनुवाक 7 - मन्त्र 1

अन्नं न निन्द्यात् ।
तद्व्रतम् ।
प्राणो वा अन्नम् ।
शरीरमन्नादम् ।
प्राणे शरीरं प्रतिष्ठितम् ।
शरीरे प्राणः प्रतिष्ठितः ।
तदेतदन्नमन्ने प्रतिष्ठितम् ।
स य एतदन्नमन्ने प्रतिष्ठितं वेद प्रतितिष्ठति ।
अन्नवानन्नादो भवति ।
महान् भवति प्रजया पशुभिर्ब्रह्मवर्चसेन ।
महान् कीर्त्या ॥ १ ॥

annaṃ na nindyāt .
tadvratam .
prāṇo vā annam .
śarīramannādam .
prāṇe śarīraṃ pratiṣṭhitam .
śarīre prāṇaḥ pratiṣṭhitaḥ .
tadetadannamanne pratiṣṭhitam .
sa ya etadannamanne pratiṣṭhitaṃ veda pratitiṣṭhati .
annavānannādo bhavati .
mahān bhavati prajayā paśubhirbrahmavarcasena .
mahān kīrtyā .. 1 ..


अन्न की निन्दा न करे । यह ब्रह्मज्ञ का व्रत है । प्राण ही अन्न है और शरीर अन्नाद है । प्राण में शरीर स्थित है और शरीर में प्राण स्थित है । इस प्रकार [एक-दूसरे के आश्रित होनेसे वे एक-दूसरे के अन्न हैं; [अतः] ये दोनों अन्न ही अन्न में प्रतिष्ठित हैं । जो इस प्रकार अन्न को अन्न में स्थित जानता है वह प्रतिष्ठित (प्रख्यात) होता है, अन्नवान् और अन्नभोक्ता होता है । प्रजा, पशु और ब्रह्मतेज के कारण महान् होता है तथा कीर्ति के कारण भी महान् होता है ॥ १ ॥

इसके सिवा क्योंकि द्वारभूत अन्न के द्वारा ही ब्रह्म को जाना है, इसलिये गुरु के समान अन्न की भी निन्दा न करे । इस प्रकार ब्रह्मवेत्ता के लिये यह व्रत उपदेश किया जाता है । यह व्रत का उपदेश अन्न की स्तुति के लिये है और अन्न की स्तुतिपात्रता ब्रह्मोपलब्धि का साधन होने के कारण है ।

प्राण ही अन्न है, क्योंकि प्राण शरीर के भीतर रहनेवाला है । जो जिसके भीतर स्थित रहता है वह उसका अन्न हुआ करता है । प्राण शरीर में स्थित है, इसलिये प्राण अन्न है और शरीर अन्नाद है । इसी प्रकार शरीर भी अन्न है और प्राण अन्नाद है; कैसे? —प्राण में शरीर स्थित है, क्योंकि शरीर की स्थिति प्राण के ही कारण है । अतः ये दोनों शरीर और प्राण अन्न और अन्नाद हैं । क्योंकि वे एक-दूसरे में स्थित हैं इसलिये अन्न हैं और क्योंकि एक-दूसरे के आधार हैं इसलिये अन्नाद हैं । अतएव प्राण और शरीर दोनों ही अन्न और अन्नाद हैं ।

वह जो इस प्रकार अन्न को अन्न में स्थित जानता है, अन्न और अन्नादरूप से ही स्थित होता है तथा अन्नवान् और अन्नाद होता है —इत्यादि शेष अर्थ पूर्ववत् है ॥ १ ॥

संस्कृत भाष्य पढ़ें

किं चान्नेन द्वारभूतेन ब्रह्म विज्ञातं यस्मात्तस्माद्गुरुमिव अन्नं न निन्द्यात्तदस्यैवं ब्रह्मविदो व्रतमुपदिश्यते । व्रतोपदेशोऽन्नस्तुतये, स्तुतिभाक्त्वं चान्नस्य ब्रह्मोपलब्ध्युपायत्वात् ।

प्राणो वा अन्नम्, शरीरान्तर्भावात्प्राणस्य । यद्यस्यान्तःप्रतिष्ठितं भवति तत्तस्यान्नं भवतीति । शरीरे च प्राणः प्रतिष्ठितस्तस्मात्प्राणोऽन्नं शरीरमन्नादम् ।

तथा शरीरमप्यन्नं प्राणोऽन्नादः । कस्मात्? प्राणे शरीरं प्रतिष्ठितम्; तन्निमित्तत्वाच्छरीरस्थितेः । तस्मात्तदेतदुभयं शरीरं प्राणश्चान्नमान्नादश्च । येनान्योन्यस्मिन्प्रतिष्ठितं तेनान्नम् । येनान्योन्यस्य प्रतिष्ठा तेनान्नादः । तस्मात्प्राणः शरीरं चोभयमन्नमन्नादं च ।

स य एवमेतदन्नमन्ने प्रतिष्ठितं वेद प्रतितिष्ठत्यन्नान्नादात्मनैव । किं चान्नवानन्नादो भवतीत्यादि पूर्ववत् ॥ १ ॥


अष्टम अनुवाक

अन्न का त्याग न करनारूप व्रत तथा जल और ज्योतिरूप अन्नब्रह्म के

उपासक को प्राप्त होनेवाले फल का वर्णन