अन्नं न परिचक्षीत ।
तद्व्रतम् ।
आपो वा अन्नम् ।
ज्योतिरन्नादम् ।
अप्सु ज्योतिः प्रतिष्ठितम् ।
ज्योतिष्यापः प्रतिष्ठिताः ।
तदेतदन्नमन्ने प्रतिष्ठितम् ।
स य एतदन्नमन्ने प्रतिष्ठितं वेद प्रतितिष्ठति ।
अन्नवानन्नादो भवति ।
महान्भवति प्रजया पशुभिर्ब्रह्मवर्चसेन ।
महान्कीर्त्या ॥ १ ॥
तद्व्रतम् ।
आपो वा अन्नम् ।
ज्योतिरन्नादम् ।
अप्सु ज्योतिः प्रतिष्ठितम् ।
ज्योतिष्यापः प्रतिष्ठिताः ।
तदेतदन्नमन्ने प्रतिष्ठितम् ।
स य एतदन्नमन्ने प्रतिष्ठितं वेद प्रतितिष्ठति ।
अन्नवानन्नादो भवति ।
महान्भवति प्रजया पशुभिर्ब्रह्मवर्चसेन ।
महान्कीर्त्या ॥ १ ॥
annaṃ na paricakṣīta .
tadvratam .
āpo vā annam .
jyotirannādam .
apsu jyotiḥ pratiṣṭhitam .
jyotiṣyāpaḥ pratiṣṭhitāḥ .
tadetadannamanne pratiṣṭhitam .
sa ya etadannamanne pratiṣṭhitaṃ veda pratitiṣṭhati .
annavānannādo bhavati .
mahānbhavati prajayā paśubhirbrahmavarcasena .
mahānkīrtyā .. 1 ..
अन्न का त्याग न करे । यह व्रत है । जल ही अन्न है । ज्योति अन्नाद है । जल में ज्योति प्रतिष्ठित है और ज्योति में जल स्थित है । इस प्रकार ये दोनों अन्न ही अन्न में प्रतिष्ठित हैं । जो इस प्रकार अन्न को अन्न में स्थित जानता है वह प्रतिष्ठित होता है, अन्नवान् और अन्नाद होता है, प्रजा, पशु और ब्रह्मतेज के कारण महान् होता है तथा कीर्ति के कारण भी महान् होता है ॥ १ ॥
अन्न का प्रत्याख्यान अर्थात् त्याग न करे, यह व्रत है —यह कथन पूर्ववत् स्तुति के लिये है । इस प्रकार शुभाशुभ की कल्पनासे उपेक्षा न किया हुआ अन्न ही यहाँ स्तुत एवं महिमान्वित किया जाता है । तथा आगे के ‘आपो वा अन्नम्’ इत्यादि वाक्यों में भी पूर्वोक्त अर्थ की ही योजना करनी चाहिये ॥ १ ॥
संस्कृत भाष्य पढ़ें
अन्नं न परिचक्षीत न परिहरेत् । तद्व्रतं पूर्ववत्स्तुत्यर्थम् । तदेवं शुभाशुभकल्पनया अपरिह्रियमाणं स्तुतं महीकृतमन्नं स्यात् । एवं यथोक्तमुत्तरेष्वप्यापो वा अन्नमित्यादिषु योजयेत् ॥ १ ॥
नवम अनुवाक
अन्नसञ्चयरूप व्रत तथा पृथिवी और आकाशरूप अन्नब्रह्म के उपासक को
प्राप्त होनेवाले फल का वर्णन