शान्तिपाठ

शान्तिपाठ

ॐ शं नो मित्रः शं वरुणः ।
शं नो भवत्वर्यमा ।
शं न इन्द्रो बृहस्पतिः ।
शं नो विष्णुरुरुक्रमः ।
नमो ब्रह्मणे ।
नमस्ते वायो ।
त्वमेव प्रत्यक्षं ब्रह्मासि ।
त्वामेव प्रत्यक्षं ब्रह्म वदिष्यामि ।
ऋतं वदिष्यामि ।
सत्यं वदिष्यामि ।
तन्मामवतु तद्वक्तारमवतु ।
अवतु माम् ।
अवतु वक्तारम् ॥
ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥

oṃ śaṃ no mitraḥ śaṃ varuṇaḥ .
śaṃ no bhavatvaryamā .
śaṃ na indro bṛhaspatiḥ .
śaṃ no viṣṇururukramaḥ .
namo brahmaṇe .
namaste vāyo .
tvameva pratyakṣaṃ brahmāsi .
tvāmeva pratyakṣaṃ brahma vadiṣyāmi .
ṛtaṃ vadiṣyāmi .
satyaṃ vadiṣyāmi .
tanmāmavatu tadvaktāramavatu .
avatu mām .
avatu vaktāram ..
oṃ śāntiḥ śāntiḥ śāntiḥ ..



शीक्षावल्ली का शान्तिपाठ

ॐ शं नो मित्रः शं वरुणः ।
शं नो भवत्वर्यमा ।
शं न इन्द्रो बृहस्पतिः ।
शं नो विष्णुरुरुक्रमः ।
नमो ब्रह्मणे ।
नमस्ते वायो ।
त्वमेव प्रत्यक्षं ब्रह्मासि ।
त्वामेव प्रत्यक्षं ब्रह्म वदिष्यामि ।
ऋतं वदिष्यामि ।
सत्यं वदिष्यामि ।
तन्मामवतु तद्वक्तारमवतु ।
अवतु माम् ।
अवतु वक्तारम् ॥
ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥ १ ॥

oṃ śaṃ no mitraḥ śaṃ varuṇaḥ .
śaṃ no bhavatvaryamā .
śaṃ na indro bṛhaspatiḥ .
śaṃ no viṣṇururukramaḥ .
namo brahmaṇe .
namaste vāyo .
tvameva pratyakṣaṃ brahmāsi .
tvāmeva pratyakṣaṃ brahma vadiṣyāmi .
ṛtaṃ vadiṣyāmi .
satyaṃ vadiṣyāmi .
tanmāmavatu tadvaktāramavatu .
avatu mām .
avatu vaktāram ..
oṃ śāntiḥ śāntiḥ śāntiḥ .. 1 ..


[प्राणवृत्ति और दिन का अभिमानी देवता] मित्र (सूर्यदेव) हमारे लिये सुखकर हो । [अपानवृत्ति और रात्रि का अभिमानी] वरुण हमारे लिये सुखावह हो । [नेत्र और सूर्य का अभिमानी देवता] अर्यमा हमारे लिये सुखप्रद हो । बल का अभिमानी इन्द्र तथा [वाक् और बुद्धि का अभिमानी देवता] बृहस्पति हमारे लिये शान्तिदायक हो । तथा जिसका पादविक्षेप (डग) बहुत विस्तृत है वह [पादाभिमानी देवता] विष्णु हमारे लिये सुखदायक हो । ब्रह्म [रूप वायु]- को नमस्कार है । हे वायो! तुम्हें नमस्कार है । तुम ही प्रत्यक्ष ब्रह्म हो । अतः तुम्हींको मैं प्रत्यक्ष ब्रह्म कहूँगा । तुम्हींको ऋत (शास्त्रोक्त निश्चित अर्थ) कहूँगा और [क्योंकि वाक् और शरीर से सम्पन्न होनेवाले कार्य भी तुम्हारे ही अधीन हैं इसलिये] तुम्हींको मैं सत्य कहूँगा । अतः तुम [विद्यादान के द्वारा] मेरी रक्षा करो तथा ब्रह्म का निरूपण करनेवाले आचार्य की भी [उन्हें वक्तृत्व-सामर्थ्य देकर] रक्षा करो । मेरी रक्षा करो और वक्ता की रक्षा करो । आधिभौतिक, आध्यात्मिक और आधिदैविक तीनों प्रकार के तापों की शान्ति हो ॥ १ ॥

प्राणवृत्ति और दिन का अभिमानी देवता मित्र हमारे लिये शं—सुखरूप हो । इसी प्रकार अपानवृत्ति और रात्रि का अभिमानी देवता वरुण, नेत्र और सूर्य में अभिमान करनेवाला अर्यमा, बल में अभिमान करनेवाला इन्द्र, वाणी और बुद्धि का अभिमानी बृहस्पति तथा उरुक्रम अर्थात् विस्तीर्ण पादविक्षेपवाला पादाभिमानी देवता विष्णु—इत्यादि सभी अध्यात्मदेवता हमारे लिये सुखदायक हों । ‘भवतु’ (हों) इस क्रिया का सभी वाक्यों के साथ सम्बन्ध है ।

उनके सुखप्रद होने पर ही ज्ञान के श्रवण, धारण और उपयोग निर्विघ्नता से हो सकेंगे—इसलिये ही ‘शं नो भवतु’ आदि मन्त्रद्वारा उनकी सुखावहता के लिये प्रार्थना की जाती है ।

अब ब्रह्म के जिज्ञासुद्वारा ब्रह्मविद्या के विघ्नों की शान्ति के लिये वायुसम्बन्धी नमस्कार और वन्दन किये जाते हैं । समस्त कर्मों का फल वायु के ही अधीन होने के कारण ब्रह्म वायु है । उस ब्रह्म को मैं नमस्कार अर्थात् प्रह्वीभाव (विनीतभाव) करता हूँ । यहाँ ‘करोमि’ यह क्रिया वाक्यशेष है । हे वायो! तुम्हें नमस्कार है—मैं तुम्हें नमस्कार करता हूँ—इस प्रकार यहाँ परोक्ष और प्रत्यक्षरूप से वायु ही कहा गया है ।

इसके सिवा क्योंकि बाह्य चक्षु आदि की अपेक्षा तुम्हीं समीपवर्ती— अव्यवहित अर्थात् प्रत्यक्ष ब्रह्म हो इसलिये तुम्हींको मैं प्रत्यक्ष ब्रह्म कहूँगा । तुम्हींको ऋत अर्थात् शास्त्र और अपने कर्त्तव्यानुसार बुद्धि में सम्यक्रूप से निश्चित किया हुआ अर्थ कहूँगा, क्योंकि वह [ऋत] तुम्हारे ही अधीन है । वाक् और शरीर से सम्पादन किया जानेवाला वह अर्थ ही सत्य कहलाता है, वह भी तुम्हारे ही अधीन सम्पादन किया जाता है; अतः तुम्हींको मैं सत्य कहूँगा ।

वह वायुसंज्ञक सर्वात्मक ब्रह्म मेरे द्वारा इस प्रकार स्तुति किये जानेपर मुझ विद्यार्थीको विद्यासे युक्त करके रक्षा करे । वही ब्रह्म वक्ता आचार्यको वक्तृत्वसामर्थ्यसे युक्त करके उसकी रक्षा करे । मेरी रक्षा करे और वक्ताकी रक्षा करे—इस प्रकार दो बार कहना आदरके लिये है । ‘ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः’—ऐसा तीन बार कहना विद्याप्राप्तिके आध्यात्मिक, आधिभौतिक और आधिदैविक विघ्नोंकी शान्तिके लिये है ॥ १ ॥

संस्कृत भाष्य पढ़ें

शं सुखं प्राणवृत्तेरहश्चाभिमानी देवतात्मा मित्रो नोऽस्माकं भवतु । तथैवापानवृत्ते रात्रेश्चाभिमानी देवतात्मा वरुणः । चक्षुष्यादित्ये चाभिमान्यर्यमा । बल इन्द्रः । वाचि बुद्धौ च बृहस्पतिः । विष्णुरुरुक्रमो विस्तीर्णक्रमः पादयोरभिमानी । एवमाद्याध्यात्मदेवताः शं नः । भवत्विति सर्वत्रानुषङ्गः ।

तासु हि सुखकृत्सु विद्याश्रवणधारणोपयोगा अप्रतिबन्धेन भविष्यन्तीति तत्सुखकर्तृत्वं प्रार्थ्यते शं नो भवत्विति ।

ब्रह्म विविदिषुणा नमस्कारवन्दनक्रिये वायुविषये ब्रह्मविद्योपसर्गशान्त्यर्थं क्रियेते । सर्वक्रियाफलानां तदधीनत्वाद् ब्रह्म वायुस्तस्मै ब्रह्मणे नमः । प्रह्वीभावं करोमीति वाक्यशेषः । नमस्ते तुभ्यं हे वायो नमस्करोमीति । परोक्षप्रत्यक्षाभ्यां वायुरेवाभिधीयते ।

किं च त्वमेव चक्षुराद्यपेक्ष्य बाह्यं संनिकृष्टमव्यवहितं प्रत्यक्षं ब्रह्मासि यस्मात्तस्मात्त्वामेव प्रत्यक्षं ब्रह्म वदिष्यामि । ऋतं यथाशास्त्रं यथाकर्तव्यं बुद्धौ सुपरिनिश्चितमर्थं तदपि त्वदधीनत्वात्त्वामेव वदिष्यामि । सत्यमिति स एव वाक्कायाभ्यां संपाद्यमानः, सोऽपि त्वदधीन एव संपाद्य इति त्वामेव सत्यं वदिष्यामि ।

तत्सर्वात्मकं वाय्वाख्यं ब्रह्म मयैवं स्तुतं सन्मां विद्यार्थिनमवतु विद्यासंयोजनेन । तदेव ब्रह्म वक्तारमाचार्यं वक्तृत्वसामर्थ्यसंयोजनेनावतु । अवतु मामवतु वक्तारमिति पुनर्वचनमादरार्थम् । ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिरिति त्रिवचनमाध्यात्मिकाधिभौतिकाधिदैविकानां विद्याप्राप्त्युपसर्गाणां प्रशमार्थम् ॥ १ ॥

ब्रह्मानन्दवल्ली का शान्तिपाठ

ॐ सह नाववतु ।
सह नौ भुनक्तु ।
सह वीर्यं करवावहै तेजस्वि नावधीतमस्तु मा विद्विषावहै ॥
ॐ शान्तिः! शान्तिः!! शान्तिः!!!

oṃ saha nāvavatu .
saha nau bhunaktu .
saha vīryaṃ karavāvahai tejasvi nāvadhītamastu mā vidviṣāvahai ..
oṃ śāntiḥ! śāntiḥ!! śāntiḥ!!!


[वह परमात्मा] हम [आचार्य और शिष्य] दोनों की साथ-साथ रक्षा करे, हम दोनों का साथ-साथ पालन करे, हम साथ-साथ वीर्यलाभ करें, हमारा अध्ययन किया हुआ तेजस्वी हो और हम परस्पर द्वेष न करें । तीनों प्रकार के प्रतिबन्धों की शान्ति हो ।

पूर्वकथित विद्या की प्राप्ति के प्रतिबन्धों की शान्ति के लिये शान्तिपाठ कर दिया गया । अब आगे कही जानेवाली विद्या की प्राप्ति के प्रतिबन्धों की शान्ति के लिये शान्तिपाठ किया जाता है—

‘सह नाववतु’—[वह ब्रह्म] हम आचार्य और शिष्य दोनों की साथ-साथ ही रक्षा करे और हमारा साथ-साथ भरण अर्थात् पालन करे । हम साथ-साथ वीर्य यानी विद्याजनित सामर्थ्य सम्पादन करें; हम दोनों तेजस्वियों का अध्ययन किया हुआ तेजस्वी—सम्यक् प्रकार से अध्ययन किया हुआ अर्थात् अर्थ-ज्ञान के योग्य हो तथा हम विद्वेष न करें । विद्याग्रहण के कारण शिष्य अथवा आचार्य का प्रमादकृत अन्याय से द्वेष हो सकता है; उसकी शान्ति के लिये ‘मा विद्विषावहै’ ऐसी कामना की गयी है । तात्पर्य यह है कि हम एक-दूसरे के विद्वेष को प्राप्त न हों ।

‘शान्तिः शान्तिः शान्तिः’ इस प्रकार तीन बार ‘शान्ति’ शब्द उच्चारण करने का प्रयोजन पहले कहा जा चुका है । यह शान्तिपाठ आगे कही जानेवाली विद्या के विघ्नों की शान्ति के लिये है । इसके द्वारा निर्विघ्नतापूर्वक आत्मविद्या की प्राप्ति की कामना की गयी है, क्योंकि वही परम श्रेय का भी मूल कारण है ।

संस्कृत भाष्य पढ़ें

अतीतविद्याप्राप्त्युपसर्गप्रशमनार्था शान्तिः पठिता । इदानीं तु वक्ष्यमाणब्रह्मविद्याप्राप्त्युपसर्गोपशमनार्था शान्तिः पठ्यते—

सह नाववतु—नौ शिष्याचार्यौ सहैवावतु रक्षतु । सह नौ भुनक्तु भोजयतु । सह वीर्यं विद्यादिनिमित्तं सामर्थ्यं करवावहै निर्वर्तयावहै । तेजस्वि नावावयोस्तेजस्विनोरधीतं स्वधीतमस्तु, अर्थज्ञानयोग्यमस्त्वित्यर्थः । मा विद्विषावहै; विद्याग्रहणनिमित्तं शिष्यस्याचार्यस्य वा प्रमादकृतादन्यायाद्विद्वेषः प्राप्तस्तच्छमनाय इयमाशीर्मा विद्विषावहा इति । मैवेतरेतरं विद्वेषमापद्यावहै ।

शान्तिः शान्तिः शान्तिरिति त्रिर्वचनमुक्तार्थम् । वक्ष्यमाणविद्याविघ्नप्रशमनार्था चेयं शान्तिः । अविघ्नेनात्मविद्याप्राप्तिराशास्यते तन्मूलं हि परं श्रेय इति ।